डॉ विजया सती
डॉक्टर स्नेहलता नेगी दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर हैं. उनके नाम आदिवासी संसार पर रची गई छः गद्य पुस्तकें प्रकाशित हैं. एक सौ बीस पृष्ठों में 63 कविताएँ समेटे, उनका काव्य संकलन है – ‘लिपिबद्ध होना’. इन कविताओं को वे भाषा, संस्कृति, जल-जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्षरत योद्धाओं को समर्पित करती हैं.
‘आदिवासी जनजीवन में अपेक्षाओं का ज्वार है’, विकास ने विस्थापन दिया है. आदिवासी जीवन में जो अतिक्रमण और अधिग्रहण है, इन कविताओं में उसके प्रति विरोध दर्ज हुआ है. इस पुस्तक को आदिवासी साहित्य में पहाड़ की प्रथम समाहिती के रूप में देखा जाना चाहिए…
हम पहाड़ के लोग
पहाड़ से टेढ़ा उतरना तो जानते हैं
पर नहीं जानते जिन्दगी में
आड़ा, टेढ़ा चढ़ना ..
कविताओं में संस्कारों की नैसर्गिकता के समक्ष औपचारिकता की यांत्रिक विडम्बना दिखाई देती है. कविताओं में उस सामूहिकता को टेरा गया है, जिसमें परिवेश और संस्कृति को बचा ले जाने की आकांक्षा और क्षमता है. आदिवासी जीवन, साहित्य, समाज, संस्कृति, परम्परा और मान्यताओं को धरोहर रूप में बचाना है – इसे कविताओं के केन्द्रीय आग्रह की संज्ञा दी जा सकती है.
संग्रह की पहली कविता संकलन के शीर्षक को व्याख्यायित करने का प्रयास है. अपनी अस्मिता को आलोकित करने की चाह में कवयित्री का दुःख यह है कि वह सब जो मौखिक था, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित तो होता था, किन्तु क्योंकि लिपिबद्ध न था इसलिए वह बच न सका. इन कविताओं में लिखित होने, दर्ज करने और व्यक्त करने की जरूरत का एहसास जबरदस्त है.
‘जंगल कूच’ संग्रह की महत्वपूर्ण कविता है. कैसे निष्फल प्रयासों की दुनिया है यह, जो अपनी ही दृष्टि सब पर लादना चाहती है, आदिवासियों पर भी, भले ही इस क्रम में उनकी अपनी पहचान को रौंद डाले ! यह सभ्य दुनिया आकांक्षा करती है कि प्रकृति की नैसर्गिकता में बसे आदिवासियों को अपने रंग में रंग दें, क्योंकि इसी तरह, इसी बहाने वे आदिवासी भी उन्हीं की तरह, संभवत: शोषक हो जाएंगे, या कम से कम उन जैसे हो जाएंगे.
कविताओं में पर्त-दर-पर्त कवि मन के अनेक प्रश्न मुखर होते चले जाते हैं – जो खुद को जितना ज्यादा ढकने के प्रयासों में रत हैं, वे उतने ही निर्लज्ज हैं. लेकिन फिर भी दुस्साहस यह है कि वे ही सीधे-सरल आदिवासियों को एक नया पाठ सिखाना चाहते हैं, उन्हें वह समझाना चाहते हैं जो आदिवासियों के कतई अनुकूल नहीं है. कैसी विडम्बना है कि प्रकृति व पर्यावरण का जो सहज-स्वाभाविक अनिवार्य हिस्सा हैं, उन्हें ही सिखाया जाएगा एक नया पाठ ! कितना बेमानी है, यह वैषम्य, यह विद्रूप ! वे जो प्रकृति और मनुष्य के बीच प्रेम और समरसता के प्रतीक हैं, उन आदिवासियों को बाहरी आवरण और चकाचौंध से सभ्य बनाने की कोशिश कितनी उपहासास्पद है !
कवयित्री का संवेदनशील मन इन विषमताओं से आहत होता जाता है – कि सभ्य हैं शहर, असभ्य हैं दूर-दराज इलाकों में रचे-बसे जीवन ! संघर्ष की पराकाष्ठा यह है कि सहज-सरल जीवन महानगरीय भाग-दौड़ में अपनी नैसर्गिक संपदा को गंवाने चला आता है. शहरियों के अलग मानदंडों के बीच उनकी सहजता-स्वाभाविकता को जैसे ग्रहण लग जाता है. यद्यपि उनका भोला मन पहचान लेता है कि इन शहरों में सब कुछ खोना ही खोना है, पाना कुछ भी नहीं है. किन्तु शहर आजीविका है, संघर्ष है, विवशता भी है. कविताओं में कोरोना काल का संवेदनहीन शहर भी है, जहाँ कई रूपों में शहरी जीवन की अप्राप्ति और यांत्रिक परिणति का दुःख अंकित हुआ है.
जो यांत्रिक और सहज से दूर है, उसकी तुलना में कवि मन वह सहेजता है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे विरासत में मिला. संकलन में उसी की स्मृति, उसी के सम्मान की कविताएं हैं. पूर्वजों से प्राप्त देन को संजोना, दिए गए मूल्यों के अनुरूप जीना ही जैसे वैभव है जीवन का. इस समृद्धि के चलते कवि मन ने आत्मसम्मान से समझौता करना न सीखा. मुक्त-स्वच्छंद जीवन बंधन में तड़पेगा, इसलिए इन कविताओं में अपनी पहचान को बनाए रखने की मुक्त कामना का संघर्ष है. बहुत कुछ मूल्यवान को दांव पर लगा कर जो वैभव मिले, वह किस काम का? आदिवासियत को बचाए रखने का संघर्ष करती इस जुझारू कलम की कोशिश यही है, कि ऐसा न हो.
ये कविताएं इस मूल वृत्ति की पहचान की कविताएं हैं कि आदिवासी होना क्या होना है? वे मनोभाव क्या हैं जो आदिवासी की थाती है? जैसे यह कि आदिवासी के लिए प्रेम मुक्त है, बंधन नहीं. आदिवासी प्रेम में स्त्री को बराबरी का दर्जा देता है.
कवयित्री का मन टूटता है यह देख कर कि वे जो शालीन और अमीर हैं, प्रेम के नाम पर गुलाम बनाते हैं, तथाकथित आकर्षणों में बांध कर दासता देते हैं. सभ्य-समृद्ध लोग बेजुबान निरीह पशुओं के साथ जो आचरण करते हैं, जीते-जागते इंसान के साथ भी वही करना चाहते हैं. दिखावे की नई पनपती संस्कृति में ये निरीह आदिवासी प्रवंचित होते हैं, छले जाते हैं. भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘जाहिल बाने’ याद आती है, जिसमें एक साधारण जीवन को सभ्य समाज के बरक्स बेबाकी से अंकित किया गया है. पेड़-पौधों से सघन जंगल के अँधेरे से न डरने वाले जो आदिवासी जंगल की भाषा से परिचित थे, उन्हें ही सर्वथा असभ्य समझा जाता है.
वह सभ्य समाज जो प्रकृति का पूरा खजाना लूट कर भी कभी तृप्त न हुआ, इन कविताओं में उस वर्चस्व के प्रति विद्रोह का स्वर है – ‘अब हर आदिवासी बिरसा होने वाला है’. विद्रोही नायक बिरसा मुंडा को स्मरण करते हुए यह पंक्ति शोषण के खिलाफ आगाह करती है. संग्रह की प्रश्नमयी कविताओं में कवि मन जनपथ और राजपथ के टकराव के माध्यम से अपने विरुद्ध जाते संसार को रेखांकित करता है,….
जन मार्ग थे तो सब ठीक था
नए नए राज मार्ग निकालने को
पहाड़ खोखले किए जा रहे हैं
स्त्री केन्द्रित कई कविताएं संग्रह में हैं. स्त्री के घोर श्रम की गरिमा के प्रति नतमस्तक संवेदनशील कवि मन का साक्षात्कार इन कविताओं में होता है. ‘कंधे की मुंडेरों’ पर ‘जीवन की हरियाली’ ढोती, जीवन का उत्सव मनाती आदिवासी स्त्रियाँ पहाड़ पर ताज़ी पड़ी बर्फ सी कोमल जरूर हैं, किन्तु प्रशंसा के तमगों के भार से खुद के वजूद को खो देना नहीं चाहती. संग्रह के अंत में नौ छोटी कविताएं उस स्त्री मन की थाह लेती हैं जिसमें दुःख को हराने की, दुःख से पार पाने की, दुःख से बड़ा हो जाने की चाह है.
कविताओं में मन की पीड़ा के सम्बन्ध सूत्र कई हैं, जिनमें से एक है विस्थापन और पलायन.
जंगल के समाज शास्त्र की भाषा पर
हावी होती जा रही है
अर्थ शास्त्र की भाषा
और हम बेदखल होते जा रहे हैं
इस दुःख से छुटकारा पाना है, तो इसे रोकना होगा. लेकिन कैसे? कवयित्री अपनों से अपने मन की बात करती है – धरती के वैभव की चोरी से आगाह करती है, पहाड़ों के व्यापारिक दोहन को संकेतित करती है, आगामी पीढ़ी की राह कंटकाकीर्ण न करने की गुहार लगाती है – यह स्वर कई कविताओं में गूंजता है. ये आदिवासी पहचान की कविताएं हैं.
जीवन में अतिरेक कभी भी, कहीं भी वरेण्य नहीं है, यह सत्य कविता में अति सुरक्षित शहरी बच्चे और मुक्त आदिवासी बच्चे की जीवन पद्धति के तुलनात्मक अंकन के माध्यम से व्यक्त हुआ है, शहर में – ‘सुकून से जीने नहीं देता, गलाकाट प्रतिस्पर्धा का डर’ !
इन कविताओं की व्यथा उस मन की व्यथा भी है, जिसने एक सुख के सपने के लिए अपने नैसर्गिक परिवेश को छोड़ा था. फिर उसी परिवेश की ओर वापसी का आग्रह तो है, पर जाता कौन है? ‘रिवर्स माइग्रेशन’ शब्द अब चलन में है, लेकिन कितने हुए हैं अब तक, यह दूसरी बात है.
समग्रत: इन कविताओं में स्त्री – विशेषत: आदिवासी स्त्री, परिवार और घर, मेहनतकश स्त्री-पुरुष, पर्यावरण, प्रदूषण, जीवन की कठोर वास्तविकताएं, सहजता का खोना, आवरणों का बढ़ना, सांस्कृतिक क्षरण के बावजूद विगत को आगत और वर्तमान से जोड़ने की आकांक्षा जैसी अनुभूतियाँ मुख्य चिंता बन कर उभरती हैं. यह चिंता उस सहज सबल मन की चिंता है, जो ध्वस्त होना नहीं चाहता, जो पुलक के साथ जीना चाहता है और राह के काँटों को अपनी संवेदनशीलता से बुहार देना चाहता है. जिन मानवीय भूलों ने संघर्ष की सृष्टि की है, दुष्परिणाम दिए हैं, उनकी पुनरावृत्ति न हो, हम अपने भीतर झांके और इस चौतरफा लड़ाई को विराम दें – इस चाह का मूर्त रूप हैं ये कविताएं.
इनमें एक भिन्न स्त्री स्वर की लौ दिखाई देती है – जिसमें नियति नहीं, संस्कार और संवेदन से पोषित सहर्ष स्वीकृति का भाव है, रचनात्मक और सृजनात्मक होने की सदिच्छा है, चाहे वह पितृ गृह की प्रेरणाएं और प्रोत्साहन हों, चाहे मातृत्व की जिम्मेदारियां. यद्यपि स्त्री का प्रश्नाकुल मन कहीं ओझल नहीं रह सका है –
मेरे जहां में तुम वक्त बेवक्त दस्तक देते
क्या तुम्हारे जहां में भी मेरी आवाजाही वैसी ही है ?
कवयित्री बहुत सलीके से स्त्री मन को यूं खोलती है
…बताओ तुम्हें क्या चाहिए ?
वह चुपचाप मुस्कुरा कर
कहेगी
कुछ ज्यादा नहीं
तुम्हारा साथ
बराबरी का दर्ज़ा
और थोड़ा सा प्यार, सम्मान
आज भी वह
इस इंतज़ार में है
कि कब उससे पूछा जाएगा
बताओ तुम्हें क्या चाहिए?
कविताओं की संवाद शैली प्रभावी है. सटीक भाषिक प्रयोग साधारण कविता को असाधारण अर्थ दीप्ति देते हैं, व्यंग्य कविताओं की भाषा को पैना बनाता है –
‘बाहर’ शब्द भर नहीं है ..
हम ‘बाहर’ का अर्थ जीते रहे हैं…
…जात से, समाज से, देश से,
भाषा विचार और विमर्श से बाहर रखा गया है हमें
हम भीतर तक समझते हैं
बाहर का अर्थ !
भाषिक संसार में लोक शब्दावली के साथ-साथ उर्दू स्वाभाविक रूप से प्रवहमान है.
लिपिबद्ध होना: कविता संग्रह : संस्करण २०२२ : विकल्प प्रकाशन: स्नेहलता नेगी: पृष्ठ 120: मूल्य 300/-

































