विपिन जोशी
उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली कत्यूर घाटी इन दिनों ‘कत्यूर महोत्सव’ के रंग में सराबोर है। हुड़का की थाप, झौड़ा-चांचरी के स्वर और स्थानीय मेलों की चकाचौंध के बीच एक अलग तरह की गूँज सुनाई दे रही है। यह गूँज किसी वाद्य यंत्र की नहीं, बल्कि उन कुदालों और फावड़ों की है जो पहाड़ के बंजर होते खेतों के भाग्य को फिर से लिख रहे हैं।
जहाँ एक ओर उत्तराखंड के गाँव ‘घोस्ट विलेज’ (निर्जन गाँव) में तब्दील हो रहे हैं, वहीं कत्यूर घाटी का लोबांज क्षेत्र एक उम्मीद की मशाल जलाए हुए है। यहाँ की कहानी दो नायकों के इर्द-गिर्द घूमती है—एक अनुभव का हिमालय है, तो दूसरा आधुनिकता की गंगा। शिव दत्त और सुनील कुमार केवल किसान नहीं हैं, वे उस विचारधारा के रक्षक हैं जो कहती है कि ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ अब पहाड़ के ही काम आएगी।
शिव दत्त: 80 की उम्र में स्वरोजगार का जीवंत दस्तावेज
जब हम 80 वर्ष की आयु की बात करते हैं, तो अक्सर मानस पटल पर आराम कुर्सी और सेवानिवृत्ति की छवि उभरती है। लेकिन लोबांज के शिव दत्त इस धारणा को सिरे से खारिज करते हैं। पिछले चार दशकों से, जब पहाड़ का युवा फौज या दिल्ली-मुंबई के होटलों में किस्मत आजमा रहा था, शिव दत्त अपनी मिट्टी के साथ एक मौन संवाद कर रहे थे।
शिव दत्त बताते हैं कि 40 साल पहले इस क्षेत्र में केवल पारंपरिक अनाज (मंडुवा, झंगोरा) ही उगाया जाता था, जिससे मुश्किल से परिवार का गुजारा होता था। उन्होंने महसूस किया कि यदि आर्थिक स्थिति सुधारनी है, तो नकदी फसलों (Cash Crops) की ओर मुड़ना होगा। उन्होंने अपनी लगन से लोबांज में मटर, गोभी, गाजर और गड़ेरी जैसी फसलों की नींव रखी।
वे केवल पारंपरिक किसान नहीं रहे। उन्होंने पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क साधा, वहां से उन्नत बीज मंगाए और वैज्ञानिकों की सलाह को अपनी पारंपरिक समझ के साथ जोड़ा। आज वे सालाना डेढ़ लाख रुपये से अधिक की शुद्ध आय अर्जित कर रहे हैं। शिव दत्त का कहना है, “मिट्टी कभी बेवफा नहीं होती, बस उसे प्यार और वैज्ञानिक तरीके से सहलाने की जरूरत है।” उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने खुद को समृद्ध नहीं बनाया, बल्कि अपने पूरे गाँव को सब्जी उत्पादन के व्यवसाय से जोड़ दिया।
सुनील कुमार: डिग्री और खेती का सफल समावेश
पहाड़ की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि यहाँ शिक्षा का अर्थ ‘गाँव से पलायन’ मान लिया गया है। लेकिन सुनील कुमार ने इस परिभाषा को बदल दिया है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने और सरकारी नौकरी की तैयारी करने के बावजूद, सुनील ने शहरों की कंक्रीट की दुनिया के बजाय अपने खेतों की हरियाली को चुना। सुनील ने खेती को एक व्यवसाय के रूप में देखा। उन्होंने केवल सब्जी उत्पादन पर निर्भर न रहकर एकीकृत कृषि को अपनाया।
* जैविक सब्जियां: रसायनों के स्थान पर पूरी तरह जैविक खाद का उपयोग।
* कुक्कुट पालन इससे न केवल अतिरिक्त आय हुई, बल्कि खेती के लिए जैविक खाद भी घर पर ही उपलब्ध हो गई।
* तकनीकी नवाचार: सुनील ने मल्चिंग, ड्रिप इरिगेशन और क्लस्टर फार्मिंग का सहारा लिया। सुनील का मानना है कि शिक्षित युवा जब खेती में आता है, तो वह डेटा, बाजार की मांग और नई तकनीकों को साथ लाता है, जिससे जोखिम कम और मुनाफा अधिक होता है। जंगली जानवरों का आतंक और आधुनिक समाधान पहाड़ में खेती के परित्याग का सबसे बड़ा कारण ‘वन्यजीव संघर्ष’ है। जंगली सूअर, बंदर और आवारा पशु रातों-रात महीनों की मेहनत पर पानी फेर देते हैं। लोबांज के इन किसानों ने हार मानने के बजाय तकनीकी समाधान तलाशे ।
* सोलर फेंसिंग और चैन-लिंक जाली: सुनील और अन्य युवाओं ने क्लस्टर बनाकर खेतों की घेराबंदी की। सोलर फेंसिंग से जानवरों को हल्का झटका लगता है, जिससे वे खेतों से दूर रहते हैं।
* फसल सुरक्षा घेरा किसानों ने मुख्य फसल के चारों ओर अदरक, हल्दी और मिर्च जैसी फसलें उगानी शुरू कीं, जिन्हें बंदर और जंगली सूअर पसंद नहीं करते। यह एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है।
* आधुनिक उपकरण: रात के समय खेतों की सुरक्षा के लिए आवाज़ करने वाले सेंसर यंत्रों और फ्लैश लाइट्स का प्रयोग किया जा रहा है। लोबांज की यह कृषि क्रांति अब केवल व्यक्तिगत नहीं रह गई है। इसके आंकड़े चौंकाने वाले और सुखद हैं:
* रोजगार: लगभग 200 से 250 परिवार इस मॉडल से सीधे तौर पर अपनी आजीविका चला रहे हैं।
* महिला सशक्तिकरण: पहाड़ की महिलाओं की रीढ़ पहले ही खेती थी, लेकिन अब उनकी भूमिका ‘प्रबंधक’ की हो गई है। ग्रेडिंग, पैकिंग और मार्केटिंग में महिलाओं की हिस्सेदारी 60% बढ़ी है।
* मार्केटिंग: स्थानीय स्तर पर ‘संडे सब्जी मार्केट’ की शुरुआत की गई है। इससे किसान सीधे उपभोक्ता से जुड़ रहा है। जो मटर हल्द्वानी मंडी में कम दाम पर बिकती थी, वह अब उचित दाम पर स्थानीय बाजारों और रिसॉर्ट्स तक पहुँच रही है।
पलायन के विरुद्ध एक मौन युद्ध कत्यूर महोत्सव के स्टॉल पर सजी ये सब्जियां केवल भोजन की वस्तुएं नहीं हैं, ये पलायन के खिलाफ एक घोषणापत्र हैं। शिव दत्त का अनुभव और सुनील की ऊर्जा मिलकर एक ऐसा सेतु बना रहे हैं, जिस पर चलकर उत्तराखंड का भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
पहाड़ की जवानी को रोकने के लिए उद्योग नहीं, बल्कि ‘मिट्टी से जुड़ाव’ की आवश्यकता है। आज जब महानगरों में लोग कैंसर और अन्य बीमारियों के डर से ‘ऑर्गेनिक’ की तलाश में हैं, तब कत्यूर घाटी के ये किसान शुद्धता की गारंटी दे रहे हैं।
लोबांज की यह कहानी हमें सिखाती है कि स्वरोजगार केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे नहीं मिलता, बल्कि उसके लिए ‘इच्छाशक्ति’ की आवश्यकता होती है। शिव दत्त और सुनील कुमार आज कत्यूर घाटी के असली ‘ब्रांड एंबेसडर’ हैं। वे सिखाते हैं कि यदि आप अपनी जमीन को प्यार करते हैं, तो वह आपको कभी खाली हाथ नहीं रहने देगी।
बेरोजगारी का दैत्य उन लोगों के सामने छोटा पड़ जाता है, जो सुबह की पहली किरण के साथ अपने खेतों में पसीना बहाना जानते हैं। आइए, कत्यूर महोत्सव के उल्लास के साथ-साथ इन किसानों के संघर्ष और सफलता को भी अपने जीवन में उतारें।































