अजय कुमार
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर मध्य-पूर्व को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के केंद्र में ला खड़ा किया है। तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ, जिनमें भारतीय रुपया भी शामिल है, दबाव में आ गई हैं। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, यह संकट केवल भू राजनीतिक खबर नहीं है। यह सीधे तौर पर महंगाई, आर्थिक वृद्धि और निवेशकों के व्यवहार को प्रभावित करने वाला आर्थिक जोखिम बन चुका है।
आधुनिक वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की नींव
आज के तनाव की जड़ें उस वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी थीं। युद्ध के बाद अमेरिका विश्व की प्रमुख आर्थिक और सैन्य शक्ति बनकर उभरा और अमेरिकी डॉलर को वैश्विक रिजर्व मुद्रा के रूप में स्थापित किया गया। समय के साथ यह व्यवस्था पेट्रो डॉलर प्रणाली में बदल गई, जिसके तहत तेल उत्पादक देश, विशेष रूप से खाड़ी क्षेत्र के देश, तेल की बिक्री डॉलर में करते थे और बदले में उन्हें अमेरिका से सुरक्षा सहयोग मिलता था। इससे पूरी दुनिया में डॉलर की माँग बढ़ी और अमेरिका की आर्थिक शक्ति मजबूत हुई।
कई दशकों तक यह व्यवस्था स्थिर रही। लेकिन 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी ने इस संतुलन को बदलना शुरू कर दिया। इस संकट ने पश्चिमी वित्तीय संस्थानों को कमजोर किया और इसी दौरान चीन एक बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में तेजी से उभरा। आज चीन वैश्विक विनिर्माण, हरित ऊर्जा तकनीक और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
अमेरिका और चीन की आर्थिक परस्पर निर्भरता
भू राजनीतिक प्रतिस्पद्र्धा के बावजूद अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। अमेरिका कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर निर्भर है, जैसे: विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखला, फार्मास्यूटिकल्स तथा इलेक्ट्रॉनिक्स में इस्तेमाल होने वाली रेयर अर्थ धातुएँ। वहीं चीन को अमेरिका से अत्याधुनिक सेमी कंडक्टर तकनीक और विशाल उपभोक्ता बाजार की आवश्यकता है। इस परस्पर निर्भरता के कारण दोनों देशों के बीच सीधा युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रतिस्पद्र्धा सीधे युद्ध के बजाय तकनीक, व्यापार और क्षेत्रीय संघर्षों के माध्यम से लड़ी जा रही है।
मध्य-पूर्व: वैश्विक ऊर्जा संकट का केंद्र
ईरान से जुड़ा हालिया संघर्ष इसी रणनीतिक प्रतिस्पद्र्धा का एक महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। अमेरिका द्वारा ईरानी ठिकानों पर हमले और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने हॉर्मुज जलडमरू मध्य को अस्थिर बना दिया है। यह वही मार्ग है जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति गुजरती है। इस क्षेत्र में थोड़ी-सी भी अस्थिरता तेल की कीमतों को तेजी से बढ़ा देती है और इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होती है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता
भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में कोई भी उछाल सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। जब तेल महंगा होता है तो इसके प्रभाव पूरे आर्थिक ढांचे में फैल जाते हैं: परिवहन लागत बढ़ती है; उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है; खाद्य और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं; तथा, महंगाई तेज हो जाती है। तेल की ऊँची कीमतें भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट को भी बढ़ाती हैं, क्योंकि देश को ऊर्जा आयात पर अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।
इसी दौरान विदेशी निवेशकों द्वारा उभरते बाजारों से पूँजी निकालने की प्रवृत्ति भी देखी जा रही है, जिससे रुपया कमजोर हुआ है। महंगा तेल और कमजोर मुद्रा, दोनों मिलकर नीति-निर्माताओं के लिए एक कठिन आर्थिक परिस्थिति पैदा करते हैं।
बाजारों में अस्थिरता
भू राजनीतिक तनाव का असर वित्तीय बाजारों में भी साफ दिखाई दे रहा है। निवेशक जोखिम से बचने के लिए उभरते बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं। शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है, जबकि सोना और तेल जैसी वस्तुओं की माँग बढ़ी है। भारत के लिए यह एक संतुलन की चुनौती है, एक तरफ महंगाई को नियंत्रित करना और दूसरी तरफ आर्थिक विकास की गति बनाए रखना। इस स्थिति से निपटने के लिए भारत कई रणनीतिक कदम उठा रहा है, उदाहरणार्थ, तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाना; रूस जैसे देशों से सस्ता तेल खरीदना; रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का उपयोग; और, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाना आदि।
लंबी अवधि में भारत का लक्ष्य ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करना और घरेलू ऊर्जा उत्पादन को मजबूत करना है। हालाँकि ऐसे संरचनात्मक बदलावों में वर्षों लगते हैं, जबकि भू राजनीतिक संकट अचानक आर्थिक झटके दे सकते हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
यह संकट केवल एक क्षेत्रीय युद्ध का परिणाम नहीं है। कई विश्लेषकों का मानना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था अब परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। ऐसे माहौल में निवेश रणनीतियों पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। विशेषज्ञ निवेशकों को कुछ प्रमुख सिद्धांत अपनाने की सलाह दे रहे हैं: विविधीकृत निवेश (सिर्फ इक्विटी पर निर्भर रहने के बजाय निवेश को विभिन्न एसेट क्लास में फैलाना चाहिए); भौगोलिक विविधता (विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करने से क्षेत्रीय जोखिम कम होता है); मुद्रा विविधता (कई मुद्राओं में निवेश रखने से डॉलर या किसी एक मुद्रा की अस्थिरता का जोखिम कम होता है); कैश-फ्लो आधारित निवेश (ऐसे निवेश जिनसे नियमित आय होती रहे, जैसे डिविडेंड स्टॉक, बॉण्ड या रियल एस्टेट, जो बाजार गिरावट के समय स्थिरता दे सकते हैं।)
निष्कर्ष
अमेरिका-ईरान संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय युद्ध नहीं है। यह वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत भी है, जहाँ ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पद्र्धा और आर्थिक प्रभाव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह इस बदलती वैश्विक परिस्थिति में अपनी आर्थिक स्थिरता और विकास को बनाए रखे और निवेशकों के लिए शायद सबसे बड़ा सबक यही है कि अनिश्चितता के दौर में विविधता और लचीलापन ही दीर्घकालिक सुरक्षा का आधार बन सकते हैं।































