कमल कुमार जोशी
इन दिनों सार्वजनिक मसलों पर सार्वजानिक तौर पर बात करने या कहने में डर लगता हैI पहला इस कारण कि अनेक लोग कह रहे हैं कि आजकल देश का ‘माहौल’ ठीक नहीं है (जो मुझे अर्ध-सत्य लगता है) और दूसरा इस आशंका के कारण कि मैं जो कहना चाहूँगा उसका अर्थ वही समझा जाएगा अथवा कुछ और ही निकाला जायेगाI मुझे स्मरण है कि करीब दो दशक पहले इसी अल्मोड़ा नगर में हिंदी के सुविख्यात साहित्यकार मनोहरश्याम जोशी ने एक राइटिंग-वर्कशॉप में बोलते हुए कहा था कि अक्सर किसी बात को कहने और उसे सुनने-समझने के बीच ग़लत फ़हमी पैदा हो जाती हैI कहने वाला अपनी सफाई देते हुए कहता है कि मेरा यह मतलब नहीं थाI संवाद की ग़लत फ़हमी का शिकार व्यक्ति उत्तेजित होकर कहता है कि मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि तेरा क्या मतलब थाI
अगर बात अल्मोड़ा नगर की करें तो डरने की ज़रूरत ज्यादा हैI मुझे अपने एक प्राध्यापक मित्र की कही बात याद आ रही है जो वर्षों पहले उन्होंने अपने विभागाध्यक्ष के बारे में कही थी कि यदि कोई मच्छर आकर उन्हें काट ले तो वह कहेंगे कि इसे ज़रूर उनके फ़लाने विरोधी ने भेजा होगाI संभवतः इजराइल से अल्मोड़ा के भ्रमण पर आई उस महिला पर्यटक को ये बातें मालूम नहीं होंगी जिसका वीडियो वायरल हो रहा है और राजनीतिक विवाद का कारण बना हैI अन्यथा वह भूल कर भी अल्मोड़ा नगर की बाज़ार में महिलाओं के लिये शौचालय की सुविधा नहीं होने के कारण उसको महसूस हुई परेशानी की बात कभी भूल कर भी नहीं कहती, कम से कम अल्मोड़ा के किसी व्यक्ति सेI मुझे नहीं मालूम कि वह व्यक्ति कौन है, किस राजनितिक दल का विरोधी/समर्थक है और उस भद्र महिला की परेशानी/शिकायत को वीडियो में रिकॉर्ड करने के पीछे उसका क्या इरादा थाI
आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कहना आवश्यक है कि मेरा किसी भी राजनीतिक दल, वामपंथी या दक्षिणपंथी विचारधारा किसी से कोई सम्बन्ध नहीं हैI मैं यह भी मानता हूँ कि इजराइल की उक्त महिला पर्यटक की तरह ही नगर या आसपास के गांवों से बाज़ार में काम-काज के सिलसिले में या घूमने-फिरने आने वाली, बाज़ार में अपना छोटा-मोटा व्यवसाय चलाने वाली महिलाओं में से किसी को फर्क नहीं पड़ता होगा कि शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा नहीं होने के पीछे भाजपा या कांग्रेस में से कौन ज़िम्मेदार हैI उन्हें तो अपनी उस गंभीर परेशानी से सरोकार होगा जिससे रोज़ाना गुजरना पड़ता हैI बाज़ार में अपनी दुकान, छोटे-मोटे व्यवसाय आदि चलाने वाली महिलायें नित्य ही शौचालय की कमी के कारण देर तक मल-मूत्र को रोके रखने को मजबूर होती होंगी या बहुत दूर स्थित शौचालय तक जाना पड़ता होगा या किसी बाज़ार में रहने वाले किसी परिचित/अपरिचित से हाथ जोड़ कर उनका शौचालय इस्तेमाल करती होंगीI वह भी एक मामूली सी समस्या के लिए जिसको हल किया जा सकता था लेकिन ऐसे मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता की कमी के चलते नहीं हुआI जगह/धन की कमी बता कर जो काम इतने सालों, दशकों तक नहीं किया गया वह उक्त विदेशी महिला की एक सिर्फ एक टिप्पणी से अब जल्दी सम्पन्न होने जा रहा हैI उसकी कही बात का वीडियो वायरल हों एके कुछ ही दिन बाद जिलाधिकारी ने नगर निगम के अफसरों के साथ बाज़ार का भ्रमण किया और हाईटेक महिला शौचालय के लिए उपयुक्त जगह की खोज का काम हाई-स्पीड से कर लिया गया हैI
इतने तक तो ठीक, बल्कि बहुत अच्छा है लेकिन मीडिया/सोशल मीडिया पर वीडियो का मुद्दा कांग्रेस बनाम भाजपा तथा पूर्व की नगरपालिका बनाम वर्तमान नगर निगम का बन गया है और महिलाओ की बुनियादी सुविधा के सीधे-सरल मुद्दे को राजनीति के रंग, बल्कि कीचड़ से पोता जा रहा हैI परस्पर एक-दूसरे पर दोषारोपण करना वैसे भी ठीक नहीं है क्योंकि एक पुरानी कहावत है कि कांच के घर में रहने वालों को दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं फैंकने चाहिएI
स्मरण रहे कि अल्मोड़ा को सांस्कृतिक और प्रबुद्धजनों का नगर कहा जाता है I यह साढ़े चार सौ साल से ज्यादा प्राचीन और उत्तराखण्ड का सबसे पुराना नगर है जो चंद राजाओं, गोरखों और अंग्रेजों के शासनकाल में विकसित हुआ हैI अल्मोड़ा चंद राजाओं की राजधानी और अंग्रेजों के समय कमिश्नरी रही हैI 1864 में स्थापित यहाँ की नगरपालिका उत्तराखण्ड की सबसे पुरानी नगरपालिका हैI
अतीत की उपरोक्त बातों पर हम नगरवासी उतना ही गर्व करते हैं जितना इस तथ्य पर कि अल्मोड़ा में शिक्षित और ऊंची डिग्रियां रखने वाले लोग बहुत ज्यादा हैंI कहा जाता है कि अगर अल्मोड़ा में किसी मकान की छत पर पत्थर फैंका जाय तो टन-टन के बजाय “बीए-एमए” की आवाज़ आती हैI यहाँ होने वाली चर्चाओं व बहसों से, जिनमें नितान्त निजी से लेकर स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय और वैश्विक मुद्दे समान अनुपात में शामिल रहते हैं, किसी को भी हैरानी हो सकती हैI तब सवाल उठता है कि शौचालय जैसी मूलभूत ज़रूरत के लिये “उठो लाल अब आँखें खोलो” कहने के लिये के लिए क्या किसी विदेशी टूरिस्ट की आवश्यकता होनी चाहिए? सोच रहा हूँ कि नगर की महिलाओं ने इस मुद्दे को जोर-शोर से क्यों नहीं उठाया होगा! यदि किसी एक महिला ने समस्या राखी होती तो उतना ज्यादा असर दिखता जितना अकेली इजराइली महिला की बात का दिखा है!
सीधे तौर पर देखा जाय तो डेढ़ किलोमीटर लंबी अल्मोड़ा बाज़ार में महिलाओं के लिये एक भी शौचालय का न होना एक गंभीर समस्या हैI I नगरवासियों, विशेषकर महिलाओं को उस विदेशी महिला पर्यटक का बहुत आभारी होना चाहिए जिसकी एक टिप्पणी ने नगर-निगम और जिला प्रशासन को याद दिलाया कि अल्मोड़ा की ऐतिहासिक बाज़ार में आने वाली महिलाओं को शौचालय की ज़रुरत हो सकती हैI
एक बात और है कि हमारा ज़ोर या ध्यान आम तौर पर नगर निवासियों या आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में बाज़ार आने वाले लोगो की बजाय पर्यटकों पर ज्यादा रहता है, ख़ास तौर से विदेशी टूरिस्टों परI इस सोच को भी बदलने की ज़रूरत हैI अनेक बार शौचालय के न होने की स्थिति में मैंने यहाँ पुरुषों को सड़क के किनारे पेशाब करते देखा हैI इनमें बहुत से बड़े-बुजुर्ग होते हैं जो देर तक नहीं रुक सकतेI लेकिन महिलायें सड़क- किनारे भी नहीं जा सकतीI
एक और बात सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिली कि शौचालय नहीं भी है तो किसी होटल या किसी के घर पर जो शौचालय है उसका इस्तेमाल किया जा सकता हैI मैंने मजबूरी में कुछ बार ऐसा किया भी है और कभी छावनी क्षेत्र तक भी गया जहां सार्वजनिक शौचालय अपेक्षाकृत ज्यादा साफ़ रहते हैंI लेकिन पुनः प्रश्न उठता है कि क्या यह/यही समस्या का व्यावहारिक हल है? हो सकता है किसी यूरोपीय या अमरीकी गोरे सैलानी, प्रभावशाली या अच्छे कपड़े पहने व्यक्ति को होटल वाले या बाज़ार के घर वाले ख़ुशी-ख़ुशी अपना निजी शौचालय इस्तेमाल करने की अनुमति दे देंI लेकिन गाँव-देहातों से आने वाली महिला को? यहाँ यह सुझाव भी देना उचित लगता है कि शौचालय भले ही हाईटेक न होकर पानी की सुविधा-युक्त साधारण सा हो लेकिन इसका शुल्क कम से कम होना चाहिये या जो (खासकर महिलाएं) सम्पन्न वर्ग के नहीं हैं उनके लिये कम शुल्क में या निशुल्क शौचालय की सुविधा होनी चाहिएI अक्सर हाईटेक के नाम पर सार्वजानिक शौचालयों में मूत्र-विसर्जन के लिये पुरुषों से कम, जबकि महिलाओं से ज्यादा शुल्क लिया जाता है या पुरुषों से लिया ही नहीं जाताI क्या यह उचित और न्याय सांगत है? हमारी सरकार मुफ्त राशन और शिक्षा से लेकर तक लैपटॉप, साइकिल, बिजली, पानी तक कितनी चीजें मुफ्त दे ही रही हैI फिर मुफ्त शौचालय इस्तेमाल की सुविधा क्यों नहीं जो बुनियादी सुविधा के साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्वच्छता की द्रष्टि से भी ज़रूरी है? कम से कम उनको को जो दिन में बार-बार पांच/दस रुपये आसानी से नहीं दे सकतेI मैंने नगर में हाईटेक शौचालय के ठीक सामने स्थित व्यावसायिक प्रतिष्ठान के कर्मचारियों को खुले में, झाड़ी की ओट में पेशाब करने जाते देखा तो आश्चर्य चकित हुआI कारण पूछने पर बताया कि दिन में कई बार जाना पड़ता है और एक बार के पांच रुपये लगते हैंI समझने की ज़रूरत है कि कितने सारे लोग हैं जिनकी कमाई बहुत कम हैI उनका मल/मूत्र विसर्जन में शुल्क का दैनिक व्यय जोड़ कर महीने में कितना ज्यादा होगा?
आखिर में, एक महत्वपूर्ण मुद्दा सार्वजानिक शौचालयों/मूत्रालयों की साफ़-सफाई का हैI हाईटेक कहे जाने वाले छोड़ दें तो ज्यादातर या सभी की हालत बेहद गन्दी और बदबूदार हैI इतनी गन्दी तस्वीर होती है कि मैंने कई बार फोटो खींची लेकिन ज्यादा दिन तक मोबाइल में उसको रखना तक कष्टकारी लगने लगा और डिलीट करनी पड़ीI यहाँ फिर कहना है कि यह बात किसी राजनीतिक दल या नगर निगम/नगरपालिका के किसी पदाधिकारी के पक्ष/विपक्ष में या सिर्फ अल्मोड़ा नगर के बारे में नहीं लिख रहा हूँ बल्कि शौचालय बनाने वाले, इसकी देखरेख करने वाले और इसका इस्तेमाल करके इसे गन्दा छोड़ जाने वाले सभी लोगों के बारे में हैI उम्मीद है कि आगे हम अल्मोड़ा वासियों को जगाने किसी विदेशी सैलानी को नहीं आना पड़ेगाI































