राजीव लोचन साह
अखबार में सुर्खियाँ होती हैं, ‘‘नैनीताल में पर्यटन कारोबारियों के चेहरे खिले।’’
पता नहीं वे कौन से पर्यटन कारोबारी होते हैं, जिनके चेहरे खिल जाते हैं, मगर जब ऐसी खबरें छपती हैं तो कुल मिला कर नैनीताल का चेहरा मुरझा जाता है। भीड़, शोर, गन्दगी और सबसे ऊपर ट्रैफिक का आतंक। नैनीताल के वे निवासी, जिनका पर्यटन से कोई सीधा रिश्ता नहीं होता, खास कर रिटायर्ड लोग घरों से बाहर निकलना ही बन्द कर देते हैं, जब तक बहुत जरूरी न हो। सबेरे सब्जी-दूध ले आये और फिर घर के भीतर ही सारा वक्त काटते रहे। अगर आपका घर मालरोड से थोड़ी ऊँचाई पर है, जहाँ पर नीचे का शोर नहीं पहुँचता तो थोड़ा सुकून बना रहता है। बाहर निकलना खतरनाक होता है, क्योंकि संकरे मार्गोंें पर भी बाईकों की आवाजाही लगी रहती है और इन बाईक सवारों को पैदल चलने वालों की असुविधा से कोई मतलब नहीं होता। वे इतनी तेजी से और ऊटपटाँग ढंग से गाड़ी लायेंगे कि आपको कूद कर एक किनारे होना पड़ेगा। अपनी जान बचाना आपकी जिम्मेदारी है, बाईक सवार की नहीं। अगर आपकी उम्र अधिक है या शरीर में ज्यादा फुर्ती नहीं है तो आप हमेशा खतरे में हैं। आप फिसल सकते हैं और आपके हाथ-पाँव टूट सकते हैं। इसलिये बेहतर है कि आप अपने घरों में स्वेच्छा से कैद में रहें। भारत में किसी को यह समझा पाना असम्भव है कि सभ्य और विकसित देशों में रास्तों पर पैदल चलने वालों का हक पहला होता है और किसी भी गाड़ी सवार का उन्हें असुविधा में डालना एक दण्डनीय अपराध। यहाँ तो भयावह ढंग से गाड़ी लाने वाले से आप टकराते-टकराते बच गये तो वह आप पर ही झल्ला पड़ेगा, ‘‘अंधे हो ? आँख देख कर नहीं चल सकते क्या ?’’
जिन पहाड़ों, खास कर हिल स्टेशनों में पैदल चलना ही विशेष माना जाता है, ठण्डी हवा खाते हुए सड़कों पर टहलना जहाँ का सबसे कीमती अनुभव है, वहाँ डर-डर कर घर से निकलना अथवा घरों में कैद रहना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है !
चैपहिया गाड़ियों की एक बहुत लम्बी कतार होती है, चार-पाँच किमी की, भवाली से आने पर पाइंस और हल्द्वानी से आने पर हनुमानगढ़ी से मालरोड से गुजरती हुई बारापत्थर तक। ये फासला सामान्यतया पन्द्रह मिनट में तय हो जाना चाहिये। डेढ़ घण्टे में तो इसे पैदल तय किया जा सकता है। मगर गाड़ी में बैठे-बैठे आप अगर इसे चार घंटे में भी तय कर लें तो गनीमत है। पैदल चलने वाले घरों में कैद हो जाते हैं तो गाड़ियों में चलने वाले अपनी इन शानदार गाड़ियों में। दिक्कत तो तब है, जब आपको किसी घायल या मरीज को अस्पताल ले जाना है। आप तो ट्रैफिक के बीचोबीच फँसे हैं। न आगे जा सकते हैं और न पीछे। उड़ कर तो नहीं ही जा सकते। अगर किसी के लिये पैदल चलना जरूरी हो तो गाड़ियों के जंजाल के बीच से इधर-उधर घुसते हुए आगे बढ़ना एक और हास्यास्पद कसरत होती है।
नैनीताल को नर्क बनाता यही वह पर्यटन है, जिससे कथित रूप से पर्यटन कारोबारियों के चेहरे खिल जाते हैं।
इस बार अप्रेल के उत्तरार्द्ध तक पर्यटन कारोबारियों के चेहरे नहीं खिल पाये थे। ट्रैफिक समस्या को लेकर लगी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने पुलिस-प्रशासन को कुछ निर्देश दिये थे। ऐसे निर्देश अनेक बार दिये जाते रहे हैं। कुछ दिन तक पुलिस-प्रशासन सक्रिय रहता है, फिर ‘जैसे थे’ वाली स्थिति आ जाती है। इस बार भी देर-सबेर वही स्थिति थी, मगर टाइमिंग गलत हो गई, क्योंकि यह पर्यटक सीजन की शुरूआत थी। पर्यटकों की गाड़ियाँ शहर से बाहर जहाँ-तहाँ रोकी गयीं, एक खास तिथि के बाद टैक्सी के रूप में रजिस्टर्ड बाइकों का शहर में आना बन्द कर दिया गया और गलत ढंग से पार्क किये गये वाहनों के धड़ाधड़ चालान काटे गये। यह बहुत योजनाबद्ध या साफ-सुथरे तरीके से नहीं किया गया, क्योंकि योजना बनाने में काफी वक्त लगता है और प्रशासन यह ट्रैफिक की जटिल समस्या सुलझाने की नीयत से नहीं कर रहा था। उसे किसी तरह न्यायपालिका की दृष्टि में अपने आप को पाक-साफ साबित करना था। उससे पहले तो वह नैनीताल शहर की सड़कों को चैड़ी करने की तुगलकी कवायद में लगा था और इसके लिये गांधी और पंडित पन्त की मूर्तियों को देशनिकाला देने तथा तल्लीताल के हेरिटेज डाकखाने को ध्वस्त करने को तैयार बैठा था। अब उसे एकाएक शहर में जहाँ-तहाँ की जा रही अनावश्यक तोड़फोड़ को रोक कर वाहनों को नैनीताल आने से रोकने की कवायद जुटना पड़ा। प्रशासन की सख्ती से मालरोड और नगर की कुछ खास सड़कें तो साफ-सुथरी और पैदल चलने वालों के लिये निरापद अवश्य हो गयीं, मगर अनियंत्रित और अराजक ढंग से चल रहे पर्यटन को इससे जबर्दस्त धक्का लगा। टैक्सी और बाईक वालों में आतंक छा गया, सोशल मीडिया पर सवार होकर नैनीताल में चल रही इस सख्ती की ख्याति दूर-दूर तक पहुँच गई और नैनीताल के होटल और होमस्टे सूने पड़ने लगे।
यह नाटक सिर्फ एक पखवाड़े का था। प्रशासन को इस जटिल समस्या का कोई कारगर और दीर्घकालीन समाधान तो ढूँढना नहीं था और अदालत को तात्कालिक रूप से संतुष्ट कर दिया गया था। धीरे-धीरे नैनीताल अपनी पूर्ववर्ती स्थिति में आने लगा। मगर तभी एक दुर्घटना घट गई। एक वहशी मुसलमान वृद्ध ने एक अनाथ बारह वर्षीय बालिका से बलात्कार कर डाला। हिन्दुत्व की ताकतें देश में सर्वत्र ऐसे मौकों की तलाश में रहती हैं। नफरत पैदा करने वाली राजनीति और उसके जहर को लोगों के दिमाग में अच्छी तरह बिछा देने वाले मीडिया ने पिछले कुछ सालों में पूरे देश में साम्प्रदायिक सद्भाव की चूलें इस कदर हिला दी हैं कि अच्छा-भला इन्सान भी दिमाग से खोखला हो गया है। नैनीताल में भी सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश काफी समय से जारी थी। इस घटना ने हिन्दुत्व के झंडाबरदारों को खुल कर खेलने का मौका दे दिया। चार-पाँच दिन तक नैनीताल का शान्त शहर जबर्दस्त तनाव में रहा। गनीमत रही कि कोई दंगा नहीं हुआ। पर्यटकों की आमद, जो धीरे-धीरे गति पकड़ने लगी थी, वह रुक गई। बल्कि उस एक सप्ताह में तो जो कुछ पर्यटक थे भी, शहर का मिजाज देख कर वे भाग खड़े हुए।
मगर इसके बाद अभी आॅपरेशन सिन्दूर को भी होना था और जब देश में युद्ध जैसी स्थिति हो, खास कर जब मीडिया युद्धोन्माद फैला रहा हो तो कोई व्यक्ति सैर-सपाटा करने घर से बाहर क्यों निकलेगा ? तो नैनीताल में इस दौरान पर्यटकों की किल्लत बनी रही। मई के तीन हफ्ते नैनीताल में सुनसानी में ही बीते। अब माहौल ठीक हो रहा है। पर्यटक भी धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं। मगर नैनीताल की जो मूल समस्यायें हैं उनसे अब सबका ध्यान हट गया है, न्यायपालिका का भी, प्रशासन का भी, पर्यटन कारोबारियों का भी और जन सामान्य का भी।
जो नैनीताल के शुभचिन्तक हैं और जो नैनीताल के पर्यटन से कमा रहे हैं (भले ही उनकी जड़ें नैनीताल में न हों) को समझना पड़ेगा कि नैनीताल की मूल समस्याओं का समाधान किये बगैर न तो नैनीताल का अस्तित्व सुरक्षित है और न ही यहाँ पर्यटन व्यवसाय दीर्घजीवी होने जा रहा है। जरा कल्पना कीजिये कि नैनीताल का तालाब सूख गया है, जिसकी आशंका वैज्ञानिक न जाने से व्यक्त कर रहे हैं (झील के पानी में आॅक्सीजन प्रवाहित कर इसका जलीय जीवन तो जैसे-तैसे जिन्दा रखा गया है) तो क्या नैनीताल में पर्यटन व्यवसाय रहेगा ? फिर वे हजारों लोग कहाँ जायेंगे, जो पर्यटन से अपनी आजीविका कमा रहे हैं ?
































