राजीव लोचन साह
क्या हो गया इस उत्तराखंड को ? यह तो उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौरान देखे गये सपनों का एकदम विलोम है। लगता है अगल-बगल के राज्यों के गुण्डा तत्वों ने पहाड़ के गुण्डों के साथ गठजोड़ कर समाज और जनजीवन के हर हिस्से पर कब्जा कर लिया है। सत्ता और प्रशासन में वे लोग काबिज हैं, जिनमें न तो उत्तराखंड के संस्कार हैं और न ही कोई मूल्यबोध। उनमें है पैसा कमाने की एक अन्तहीन हवस। तीस साल पहले बड़े-बड़े माॅल, निजी अस्पताल, प्राइवेट विश्वविद्यालय और एक्सप्रेसवे के बारे में कोई सोचता नहीं था। तब तो बात होती थी पहाड़ के दूरदराज के गाँवों में एक शान्त और आरामदायक जिन्दगी की। वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधायें हों, वे सड़क मार्ग से जुड़ जायें, नौजवानों को घर में या नजदीक ही सम्मानजनक रोजगार मिल जाये, महिलायें घास, पानी, लकड़ी की चिन्ता से मुक्त हों, उन्हें शराबियों का आतंक न झेलना पड़े, बाहर के धन्नासेठ प्राकृतिक सुषमासम्पन्न जमीनों पर रिजोर्ट बना कर स्थानीय ग्रामीणों के हक-हकूक न छीनें। बस ऐसे ही मुद्दों पर चर्चा तब हुआ करती थी। उन सब पर अब कोई बात नहीं करता। जगह-जगह लगे विशालकाय होर्डिंग साबित करने की कोशिश करते हैं कि समान नागरिक संहिता और नकल विरोधी कानून से उत्तराखंड स्वर्ग जैसा हो गया है। कहीं-कहीं छुटभैये नेता भी धुरंधर मुख्यमंत्री को बधाई देते दिखते हैं कि उनके नेतृत्व में प्रदेश कहाँ से कहाँ पहुँच गया है। जनता इस निखालिस झूठ से जबर्दस्त गुस्से में है। मगर उसका गुस्सा निर्वीर्य है। वह कहीं आन्दोलन भी करती है तो वह एक कोने में सिमट कर रह जाता है। अखबार के पन्नों तक वह पहुँच भी नहीं पाता। वह गुस्सा एक जगह एकत्र होकर 1994 के विराट आन्दोलन का आकार नहीं ले पाता। पढ़े-लिखे नौजवानों का असंतोष बस सोशल मीडिया में ही मुखर हो पाता है। मगर कभी फिर ज्वालामुखी फूटेगा। ऐसा गुस्सा बगैर अभिव्यक्त हुए समाप्त नहीं हो पाता।
फोटो इंटरनेट से साभार































