संजीव भगत
इस बार हुए पंचायती चुनाव और चुनाव के बाद भाजपाई सरकार की तानाशाही व अंधेरगर्दी, गैरसंैण के डेढ़ दिन के अराजक विधान सभा सत्र को देखकर हमें कोफ्त हो रही है कि क्या हमने इसी दिन के लिए उतराखण्ड राज्य की माँग की थी ? नैनीताल में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में निर्वाचित सदस्यों का खुलेआम अपहरण की घटना देख कर तो लगता है आज कानून-व्यवस्था में हम बिहार से भी पीछे पहुँच गये हैं।
जनता के लम्बे संघर्ष और बलिदान के बाद तमाम संवैधानिक औपचारिकतायें पूरी कर 9 नवम्बर 2000 को उतराखण्ड राज्य अस्तित्व में आ गया। मगर राज्य बनते ही राजधानी का मुद्दा फँस गया। आज की उत्तराखण्ड की अधिकांश समस्याओं की जड़ ही अस्थायी राजधानी है। हमारे सभी चुने हुए नेता पहाड़ सिर्फ वोट मांगने के लिए ही चढ़ते हैं। अपने जीवन निर्वाह व सुविधा के लिए हल्द्वानी, देहरादून में बस जाते हैं। राजधानी गैरसैंण उन्हें मंजूर नहीं। नेताओं के पीछे-पीछे अफसर, बाबू भी केवल मैदानी जिलों में ही अपनी पूरी नौकरी कर लेते हैं। रोजगार के अभाव में पलायन की समस्या पहले से गम्भीर हो चुकी है। दूरस्थ गाँव ‘भूतगाँव’ बनते जा रहे हैं। पहाड़ी और मैदानी जिलों के बीच आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है। अस्पताल और स्कूलों के भवन खण्डहरों में तब्दील हो रहे हैं। कोई भी अध्यापक, डाक्टर पहाड़ों में नौकरी नहीं करना चाहता। इस बात का फायदा उठा कर नेताओं ने ट्रांसफर पोस्टिंग को सबसे बड़ा उद्योग बना दिया है।
हमारी सरकारों को विकास केवल ऑलवेदर रोड, रेल लाईन और चैड़ी सड़क में ही नजर आता है। इन चैड़ी सड़कांे से हिमालय को कितना दर्द हो रहा है, यह हमारे नेता नहीं समझते। उत्तराखण्ड बनने के पहले दस साल अफसरशाही उत्तराखण्ड के जनपक्षीय भावनाओं को समझने हुए विकास योजनायें बनाने की कोशिश करती थी। ये अफसर राज्य आन्दोलन को नजदीक से देख चुके थे। 2010 के बाद जो अधिकारी सत्ता के शीर्ष पर पहुँचे, उनकी प्राथमिकता में उत्तराखण्ड को मानवीय दृष्टिकोण से देखना और दूरस्थ पहाड़ में रहने वाले व्यक्ति को सुविधा पहुँचाना कतई नहीं था और जो राजनीतिक नेता इस दौर में उभरे, उनके पास अपनी कोई दृष्टि ही नहीं थी।
उत्तराखण्ड को कभी ऊर्जा तो कभी पर्यटन प्रदेश बनाने की घोषणा होती रही, लेकिन दिशाहीन नेताओं ने इसे खनन व शराब प्रदेश बना डाला। इन्हें खनन और शराब में ही सरकारी और निजी राजस्व नजर आया और पूरी सत्ता खनन और शराब के चारों तरफ घूमने लगी। उत्तराखण्ड बनने के पहले दस सालों में नारायण दत्त तिवारी के प्रयासों से सिडकुल उधमसिंह नगर व सिडकुल हरिद्वार में स्थापित सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों में से अधिकांश अव्यावहारिक जीएसटी व नोटबंदी के चलते या तो बंद हो चुकी हैं या पलायन कर चुकी है।
सरकारी शिक्षा व्यवस्था भले ही पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हो, लेकिन देहरादून में ही डिग्रियाँ बेचने वाली सैकड़ों प्राइवेट दुकानें खुल गयीं। इन प्राइवेट काॅलेजों ने पिछले डेढ़ दशक से ऐसी फौज तैयार कर दी है, जिसमें से अधिकांश में किसी भी तरह के काम करने योग्यता नहीं है। ये सब बेरोजगारों की कतार में खड़े है। इस साल उत्तराखण्ड राज्य भीषण आपदा से घिरा हुआ है। आपदा हर बार आती है, लेकिन इस बार भयावह है। लेकिन इन आपदाओं से निबटने की कोई ठोस व दूरगामी योजना न तो बनी है और न बनाने का इरादा है। पहाड़ में रहने वाले दो-चार सौ लोग मर-खप जायें, इस हैलीकाॅप्टर सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता। पिछले कुछ सालों से पर्यटकों के नाम पर चारधाम यात्रा व पहाड़ों में बढ़ रही बेतहाशा भीड़ ने पर्यटकों के साथ-साथ पर्यटन प्रदेश की सुखद अवधारणा को ही चकनाचूर कर दिया है। इस बेतहाशा भीड़ से पर्यटक, पर्यटन कारोबारी, स्थानीय लोग व पुलिस-प्रशासन सब परेशान हैं। नियत्रित पर्यटन के लिए सरकार के पास कोई दूरगामी योजना नहीं है।
पिछले पच्चीस सालों में कोई भी सरकार जमीनों की पैमाइश ही नहीं करा सकी। कोई उद्यान नीति नहीं बन सकी। फलों का उत्पादन लगातार कम होता जा रहा है। कीमती जमीनों में बड़े-बड़े रिजाॅर्ट उग आये हंै। जमीनों के मूल मालिक उन ऐशगाहों में मजदूर बने हुए हैं।
जब उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैंण में होगी, मुख्यमंत्री, अफसर, नेता सब वहाँ स्थायी रूप से बैठेंगे तभी पहाड़ की समस्याओं को गम्भीरता से समझा जा सकेगा।

































