राजीव लोचन साह
25 जुलाई का दिन उत्तराखंड के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है. इस दिन अमर बलिदानी श्री देव सुमन ने टिहरी रियासत के खिलाफ लड़ते हुए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था. अब यह तिथि एक और कारण से भारत के इतिहास में दर्ज हो गई है कि इसी रोज भारत के युवाओं ने देश के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लिया था. स्वस्थ लोकतंत्र में यह बहुत बड़ी घटना नहीं है. अपने दौर में हमने लाल बहादुर शास्त्री को एक रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेते हुए स्वयं त्यागपत्र देते देखा था. अब तो विपक्ष माँग करता रहता है. जनता सड़कों पर भी उतरती है, मगर किसी मंत्री का त्यागपत्र नहीं होता. यह कहना अपनी उपलब्धि माना जाता है कि हमारी सरकार में त्यागपत्र नहीं होते. ऐसे में नीट परीक्षा में लीक के बाद बीस से अधिक बच्चों द्वारा आत्महत्या कर लेने की जिम्मेदारी धर्मेन्द्र प्रधान ने नहीं ली तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं. मगर सैकड़ों युवाओं ने नयी दिल्ली की सड़कों पर पुलिस और सुरक्षा बलों से पिट कर, हजारों युवाओं ने जंतर मंतर पर रात-दिन धरना देकर और देश के दर्जनों शहरों में लाखों युवाओं ने सड़कों पर उतर कर सत्ता के अहंकार को ध्वस्त कर दिया. यह ऐतिहासिक घटना है. सवाल है कि इसके आगे होगा क्या. क्या कुछ बदलेगा? नहीं कुछ नहीं बदलेगा. सब कुछ पहले की तरह चलेगा. इन बच्चों ने न जानते हुए भी इस तानाशाही की दीवार में एक दरार पैदा कर दी है. इस पर बुलडोजर चलाना राजनैतिक ताकतों का काम है. उधर से कोई उम्मीद फिलहाल दिखती नहीं. सिर्फ बिसूरना दिख रहा है कि युवाओं को, जेन जी को यह माँग करनी चाहिए थी, वह माँग मँगवानी चाहिए थी. बच्चों को सिर्फ शिक्षा चाहिए, रोजगार चाहिए और इसके लिए जवाबदेही चाहिए. वे यह लड़ाई जीत कर घर लौट गये हैं. आप अपना काम कीजिये.
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