राजीव लोचन साह
जंतर मंतर के सफल जेन जी आन्दोलन के बाद देश के हालात में अनेक बदलाव आते दिखाई दे रहे हैं। बदलाव हमेशा ही सकारात्मक नहीं होते। 12 साल पहले जो बदलाव शुरू हुए थे, वे देश और समाज को प्रतिगामी दिशा में ले जाने वाले थे, भले ही अधिकांश देशवासियों ने उस वक्त उनमें अपनी मुक्ति देखी थी। ‘अच्छे दिनों’ की उम्मीद में जनता ने मोदी जी को आँख मूँद कर अपना भविष्य सौंप दिया था। वे सपने चकनाचूर हो गये और अब देश के युवाओं ने दूसरीे तरह से उम्मीद जगाई है। उनमें सपने देखने की उम्मीद भले ही कम है, मगर यह उम्मीद अवश्य है कि अब गलत-सलत काम करने वालों को बख्शा नहीं जायेगा। न ही किसी तरह के झूठ को बर्दाश्त किया जायेगा। अब माहौल इस तरह का बना है कि जब नोएडा की डी.एम. मेधा रूपम, जो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पुत्री बतलाई जा रही हैं, ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चैधरी को एक मजदूर आन्दोलन के सिलसिले में गिरफ्तार कर जेल में भेजा, तो इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न सिर्फ आकृति चैधरी को मुक्त किया, बल्कि उन्हें नोएडा की डी.एम. मेधा रूपम के वेतन से काट कर 5 लाख रुपये का मुआवजा उन्हें देने का आदेश तक दे डाला। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त, जिन्होंने बेरोजगार युवकों को ‘काॅक्रोच’ की उपाधि से नवाज कर जंतर मंतर आन्दोलन के बीज बोये थे, ने एक अभूतपुर्व निर्णय में इस आन्दोलन में शामिल युवाओं के खिलाफ दाखिल की गई एफ.आई.आर. रद्द कर दीं। यह वहीं न्यायपालिका है, जो कुछ महीने पहले केन्द्र सरकार के सामने दण्डवत करती दिखाई दे रही थी। जिस तरह से न्यायपालिका अपनी स्वायत्तता दुबारा प्राप्त करती दिखाई दे रही है, उसी तरह शासन-प्रशासन में भी खौफ पनपता दिखाई दे रहा है। पटना में एक जेन अल्फा, एक दिहाड़ी मजदूर का छः वर्षीय बच्चा आदित्य बिहार सरकार के गली की हड्डी बन गया है।































