महेश पन्त
शहरी आपदाओं का हमारे देश में एक त्रासद और चिरपरिचित क्रम बन चुका है। दिल्ली के सत्य निकेतन या सैदुलहजाब जैसे इलाकों में ढहते छात्रावास, मुंबई की मानसूनी बारिश में भरभराकर गिरती पुरानी और जर्जर इमारतें, या कोलकाता की पुरानी गलियों में मलबे के नीचे दबती जिंदगियां—यह सब दशकों से एक सामान्य दृश्य बन गया है। कुछ दिनों तक मीडिया की सुर्खियां, टीवी स्टूडियो में चीखती बहसें और नेताओं के क्षणिक रूप से लटके चेहरे एवं संताप भरे बयान गूंजते हैं, फिर सब कुछ शांत हो जाता है। फाइलें बंद कर दी जाती हैं और हम अगली किसी दुर्घटना का इंतजार करने लगते हैं। जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रहती है, लेकिन वह ‘दीमक’ जो अंदर ही अंदर हमारे तंत्र को खोखला कर रहा है, जस की तस बनी रहती है।
भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का यह नाता नया नहीं है। दशकों पहले कुंदन शाह की बेहतरीन व्यंग्य फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ ने इसी मिलीभगत को प्रस्तुत किया था—जहां बिल्डरों, भ्रष्ट निरीक्षकों और राजनेताओं का अपवित्र गठजोड़ नियमों को ताक पर रखकर शहर के नक्शे बदल देता है। फिल्म का वह चर्चित क्लाइमैक्स, जहां ताश के पत्तों की तरह इमारतें गिर जाती हैं, अब एक साधारण घटना बन चुकी है। नियमों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और नियमों के उल्लंघन के जुर्माने को एक ‘व्यापारिक लागत’ मान लिया जाता है। इस विसंगति में कोढ़ में खाज का काम कर रहे हैं वे अनगिनत कोचिंग संस्थान, जो बिना किसी योजना के रिहायशी इलाकों के तंग तहखानों में छात्रों की जिंदगियों को दांव पर लगाकर चलाए जा रहे हैं या फिर छात्रों को ऐसी जगहों पर रहने को विवश कर रहे हैं। यह न असत्य है, नहीं अतिशयोक्ति कि इसमें छात्रों और उनके अभिभावकों की मौन सहमति भी शामिल है।
जब राहत और बचाव कार्य खत्म हो जाते हैं, तो मुख्य सवाल यह उठता है कि आखिर यह बीमारी लाइलाज क्यों है? इसका जवाब हमारी प्रशासनिक प्राथमिकताओं में छिपा है—हम ‘तमाशे’ के आदी हो चुके हैं और ‘दीर्घकालिक बीमारी’ से आंखें मूंद लेते हैं। चकाचौंध भरी आपदाएं और तत्काल राहत के पैच-वर्क नेताओं को चटपट दृश्यमान श्रेय और सुर्खियां देते हैं। इसके विपरीत, जमीन पर सुधारात्मक और सतत काम करना अदृश्य, कठिन और राजनीतिक रूप से ‘बेस्वाद’ होता है। एक अनहोनी को टाल देना कभी सुर्खी नहीं बनता, वह केवल एक शांत और सुरक्षित मंगलवार देकर गुजर जाता है। वरिष्ठ अधिकारियों और नगर निगमों के प्रतिनिधियों को भी यह बात अच्छी तरह समझ आ चुकी है कि अदृश्य और जटिल समस्याओं को सुलझाने के बजाय तात्कालिक राजनीतिक प्राथमिकताओं को पूरा करना ही उनकी नौकरी की सुरक्षा की गारंटी है। सिद्धांत रूप में, दिखावटी और चमकदार उपलब्धियां हमेशा उस खामोश और मुश्किल सुधार पर भारी पड़ती हैं जो असल में ज्यादा जरूरी होता है।
असली बदलाव तब आता है जब नीतियां केवल तात्कालिक आपदा प्रबंधन से हटकर मूल कारणों के खात्मे पर केंद्रित हो जाती हैं। जैसा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में जापानी इंसेफेलाइटिस (चमकनी बुखार) के खिलाफ उत्तर प्रदेश में लड़ी गई लड़ाई से स्पष्ट होता है। दशकों तक सरकारें हर मानसून में बच्चों की मौत पर केवल अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर पहुंचाने और शोर मचाने तक सीमित रहीं—यह तमाशा हर साल दोहराया जाता था। असली फर्क तब आया जब सरकार ने इस ‘दमकल संस्कृति’ को छोड़कर बुनियादी और अदृश्य मोर्चों पर काम शुरू किया: जैसे बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान, ग्रामीण स्वच्छता सुधार और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था। जब ध्यान मरने वाले बच्चों को इमर्जेंसी वार्ड में बचाने से हटकर बीमारी के मूल कारणों को खत्म करने पर गया, तब जाकर उस महामारी पर काबू पाया जा सका।
हमारे शहरों को भी आज इसी वैचारिक कायाकल्प की जरूरत है। जोनल कानूनों को दुरुस्त करना, इमारतों की नींव का आडिट (audit) करना, सीवेज और ड्रेनेज सिस्टम को सुधारना और भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित करना; शायद फोटो-ऑप या फीता काटने के काम नहीं आ सकता। लेकिन ठीक वैसे ही जैसे एक अदृश्य टीके से लाइलाज बीमारी को हराया जाता है, शहरों की नसों में फैले इस सड़न को खत्म करने के लिए हमें सिस्टम के उस अदृश्य और उबाऊ अंग को मजबूत करना होगा- “बूंद-बूंद से सागर भरने” जैसा है।
इस चक्र को तोड़ने के लिए हमें एक स्थायी और पारदर्शी निगरानी तंत्र की आवश्यकता है। जब विभागों से स्वयं ही अपनी कमियों की समीक्षा करनी होगी, तो फाइलें धूल ही फांकती रहेंगी। जवाबदेही के लिए स्वतंत्र और सक्रिय विधायी समितियों (Legislative Committees) की जरूरत है, जो केवल हादसे के बाद जागने के बजाय निरंतर इस बात की निगरानी करें कि नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।
ठीक उसी तरह, मीडिया और समाज को भी अपनी भूमिका बदलनी होगी। नींव की ईंटें कभी मंच पर प्रदर्शन नहीं करतीं, वे हमेशा अंधेरे में दबी रहकर पूरे भवन का बोझ उठाती हैं। एक जीवंत और सुरक्षित शहर का निर्माण चकाचौंध से नहीं, बल्कि उस खामोश और निरंतर चलने वाली व्यवस्था से होता है जिसका हर नागरिक और शासक सम्मान करना सीखे। यह भले ही आज के इन्स्टाग्राम के दौर में आकर्षक न लगे, लेकिन जीवन का शाश्वत सत्य यही है कि भवन विज्ञापनों पर नहीं, बल्कि मजबूत और अदृश्य नींव पर खड़े रहते हैं—यह तो सच है कि जो दिखता है, वह बिकता है; पर टिकता वही है जो सुदृढ़ नींव पर बनता है।































