माया पांडे
येन वद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः
तेन त्वां प्रतिबध्यामि रक्षे मा चल मा चल।
दानवीर बलि प्रह्लाद के पौत्र थे। दानी व सत्यवादी थे। एक बार उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किया। भगवान ने वामन रूप धारण कर उनसे तीन पग रखने को भूमि मांगी, गुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी बलि ने यथा संभव प्रार्थना व अर्चना करके तीन पग भूमि संकल्प कर दी। एक पग से भगवान ने स्वर्गलोक, दूसरे पग से मृत्युलोक पर अधिकार कर लिया। तीसरे पग रखने का स्थान न होने से बलि ने उन्हें अपना सिर तीसरा पग रखने को दे दिया। सिर पर तीसरा पग रखते ही बलि ने भगवान की स्तुति की, स्तुति करते ही विष्णु के परम भक्त और बलि के पितामह प्रह्लाद प्रकट हो गये। उनकी प्रार्थना से भगवान ने बलि का बंधन काट दिया। भगवान ने प्रह्लाद से कहा कि बलि ने बहुत त्याग करके अपनी सत्यता प्रमाणित की है। अतः मैं इन्हें देवताओं को भी दुर्लभ स्थान का अधिकारी बनाऊंगा। श्रावणी मन्वन्तर में ये इन्द्र होंगे इस मन्वनतर के आने तक इन्हें सुतल नामक पाताल में रहना होगा और मैं इनकी रक्षा करूंगा।
वैदिक काल से चला आ रहा वचन वद्धता का यह त्योहार स्नेह संबंधों, कर्तव्य पालन, दानशीलता, सत्यता का त्योहार है। यह त्योहार देश की एकता एवं अखंडता का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन, सम्पन्न एवं जागरूक संस्कृति है। संस्कृति की इसी परंपरा ने ब्राह्मणों का त्योहार रक्षा बंधन, क्षत्रियों का त्योहार दशहरा, वैश्यों का त्योहार दीपावली एवं शूद्रों का होली माना है। रक्षा सूत्रों से एक दूसरे को अपनत्व में बांध, दशहरे से अपनी संस्कृति, नारियों की रक्षा, दीपावली में परस्पर सौहार्द एवं होली में रंग की बौछार करके यहां के लोग पारस्परिक भाईचारे का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
इतिहास साक्षी है कि यह त्योहार सद्भावनाओं के आदान-प्रदान, जाति, धर्म सम्प्रदायों के वैमनस्य से परे एक सांस्कृतिक उत्सव है। रानी कर्मवती का मुगल शासक हुमायूँ को राखी भेजना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
कुर्मांचल में द्विज समुदाय रक्षा बंधन को यज्ञोपवीत पर्व के रूप में मनाता है। पूजा स्थल या जहां जनेऊ ली जाती है उस स्थान के मध्य में कलश स्थापना की जाती है। कुछ लोग कलश स्थापना के लिए भद्र बनाते है और कुछ लोग पंचमुखी। सरस्वती कलश के चारों ओर उतनी ही चौकियां बनायी जाती हैं, जितने लोग जनेऊ
या मौलीसूत्र को प्रतिष्ठित करने के लिए बैठते हैं। उस दिन नई जनेऊ की प्रतिष्ठा कर पुरानी जनेऊ उतार, नई धारण की जाती है। नई जनेऊ प्रतिष्ठा पर्व को पर्वतीय लोग जन्यो पुन्यू भी कहते हैं।
रक्षा बंधन के दिन वेदमाता गायत्री के मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित यज्ञोपवीत व रक्षा सूत्र में माता-पिता, गुरुजनों, महर्षि, ऋषियों में जो तेज बल पराक्रम प्राणशक्ति है उसे स्वयं में अंगीकार कर सकने की प्रार्थना का वेदमंत्र निहित है।
कुर्मांचलीय संस्कृति में यह त्योहार मामा-भान्जा, ससुर-दामाद, ब्राह्मण-यजमान का त्योहार है। भान्जा मामा को, दामाद-ससुर को और ब्राह्मण-यजमान को जनेऊ देकर मौली सूत्र जिसे कुमाउनी भाषा में लाथड़ी का धागा कहते हैं बांधते हुए येन बद्धो बलि राजा.. इस मंत्र से रक्षा का वचन देते हैं।
बदले में उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा स्वरूप द्रव्य दिया जाता है।
मैदानी क्षेत्रों में इस त्योहार में बहिने रंग-बिरंगे धागों की राखी भाईयों की कलाई में बांधती हैं। भाईयों के प्रति शुभकामनाएं, उनके दीर्घ जीवन की भावना और बदले में स्वयं की रक्षा का वचन लेती हैं और भाई आजीवन हर परिस्थितियों में बहिन की रक्षा का दृढ़ संकल्प लेता हुआ उपहार देता है।































