विनीता यशस्वी
देहरादून। उत्तराखंड में जुलाई का मानसून इस बार सिर्फ बारिश लेकर नहीं आया, बल्कि पहाड़ों के लिए भूस्खलन, टूटती सड़कों, बहते संपर्क मार्गों, बाधित चारधाम यात्रा और गांवों के अलग-थलग पड़ने की लंबी कहानी भी छोड़ गया। कहीं सड़क का बड़ा हिस्सा नदी में समा गया तो कहीं पहाड़ से गिरे मलबे ने घंटों और कई जगह दिनों तक यातायात रोक दिया। कई गांवों का संपर्क टूटा, तीर्थयात्री रास्तों में फंसे और पेयजल योजनाओं से लेकर पुलों की एप्रोच रोड तक बारिश की चपेट में आ गई।
जुलाई के पहले सप्ताह से ही राज्य में बारिश का मिजाज असमान रहा। कुछ इलाकों में सामान्य से बहुत अधिक बारिश हुई, जबकि दूसरे क्षेत्रों में मानसून अपेक्षाकृत कमजोर रहा। सात जुलाई तक बागेश्वर में सामान्य से 251 प्रतिशत, चमोली में 55 प्रतिशत, उत्तरकाशी में 45 प्रतिशत और टिहरी में 33 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई थी। इसके बाद बारिश का एक और तेज दौर शुरू हुआ, जिसने पहाड़ी जिलों में सड़क और यातायात व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया।
आठ जुलाई को पंतनगर में 107 मिलीमीटर और चोरगलिया में करीब 79.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। भारी बारिश के साथ पहाड़ी इलाकों में जगह-जगह पत्थर और मलबा गिरने लगा। उस समय राज्य में 32 सड़कें बंद होने की सूचना थी। अगले दो दिनों में स्थिति और गंभीर हो गई। दस जुलाई को राज्य की करीब 118 सड़कें बंद थीं। इनमें रुद्रप्रयाग की 22, देहरादून की 21, चमोली की 16, नैनीताल की 13 और पिथौरागढ़ की 12 सड़कें शामिल थीं।
ग्यारह जुलाई को बंद सड़कों की संख्या बढ़कर करीब 120 हो गई। इनमें तीन राष्ट्रीय राजमार्ग भी शामिल थे। इस दौरान उत्तरकाशी के स्यानाचट्टी के पास यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग का करीब 100 मीटर हिस्सा बह गया। सड़क कटने के कारण बड़ी संख्या में यात्री प्रभावित हुए। करीब सौ तीर्थयात्रियों को क्षतिग्रस्त हिस्से के पार निकालने के लिए प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ी।
उत्तरकाशी में गंगोत्री और यमुनोत्री दोनों मार्ग बारिश और भूस्खलन की चपेट में रहे। नालूपानी के पास गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर मलबा आने से यातायात प्रभावित हुआ, जबकि स्यानाचट्टी क्षेत्र में सड़क का हिस्सा बह जाने से यमुनोत्री मार्ग पर संकट पैदा हुआ। बाद में ओजरी समेत कई स्थानों पर भी मलबा और बोल्डर गिरने की घटनाएं सामने आईं।
चारधाम यात्रा के लिहाज से भी जुलाई बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जाने वाले मार्गों पर जगह-जगह भूस्खलन और मलबे ने यात्रियों की आवाजाही बाधित की। खराब मौसम और सड़क की स्थिति को देखते हुए कई बार यात्रा रोकनी पड़ी। जुलाई के अंतिम सप्ताह में भारी बारिश और भूस्खलन के कारण चारधाम यात्रा को दो दिनों के लिए रोकने का निर्णय भी लेना पड़ा।
चमोली जिले में भी बारिश ने व्यापक असर डाला। बदरीनाथ मार्ग पर छिनका के पास भूस्खलन से राष्ट्रीय राजमार्ग प्रभावित हुआ। ज्योतिर्मठ-मलारी मार्ग पर भी बड़े पैमाने पर मलबा आने से यातायात बाधित हुआ। जिले में सड़क बंद होने के अलावा घरों, दुकानों और अन्य परिसरों में मलबा घुसने की घटनाएं भी सामने आईं।
चमोली के नारायणबगड़ में बारिश से पहले से कमजोर हुई अस्पताल की चारदीवारी का हिस्सा गिरने से एक सरकारी चिकित्सक डॉ. नवीन चंद्र डिमरी की मौत हो गई, जबकि एक अन्य चिकित्सक घायल हुए। यह घटना इस बात की गंभीर चेतावनी भी बनी कि लगातार बारिश से कमजोर हो चुके पुराने ढांचे किस तरह जानलेवा साबित हो सकते हैं।
रुद्रप्रयाग में भी बारिश का असर व्यापक रहा। दस जुलाई को जिले में 22 सड़कें बंद थीं। चारधाम यात्रा का प्रमुख मार्ग होने के कारण सड़क बंद होने का असर केवल स्थानीय लोगों पर ही नहीं पड़ा, बल्कि हजारों यात्रियों और स्थानीय पर्यटन कारोबार पर भी पड़ा। सड़कें बंद होने से टैक्सी चालक, होटल कारोबारी, छोटे दुकानदार, घोड़ा-खच्चर संचालक और यात्रा से जुड़े दूसरे व्यवसाय प्रभावित हुए।
कुमाऊं में पिथौरागढ़ बारिश और भूस्खलन से प्रभावित प्रमुख जिलों में रहा। जिले में एक समय 12 सड़कें बंद थीं। मल्ला जोहार क्षेत्र में बिल्जू नदी के उफान पर आने से मिलम की ओर जाने वाला संपर्क प्रभावित हुआ और करीब 90 परिवारों के सामने आवाजाही का संकट खड़ा हो गया। स्थायी पुल नहीं होने के कारण लोगों को अस्थायी लकड़ी के पुल का सहारा लेना पड़ा।
बागेश्वर में समस्या सिर्फ मोटर मार्गों तक सीमित नहीं रही। बारिश और भूस्खलन से दूरस्थ गांवों को जोड़ने वाले पैदल रास्ते भी क्षतिग्रस्त हुए। इन रास्तों का महत्व पहाड़ी गांवों में बेहद अधिक है, क्योंकि कई बस्तियों के लिए यही बाजार, स्कूल, अस्पताल और मुख्य सड़क तक पहुंचने का प्रमुख साधन हैं। बावजूद इसके इन पैदल मार्गों के नुकसान का कोई व्यापक और समेकित सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। कई गांवों के अलग-थलग पड़ने की वास्तविक तस्वीर सरकारी सड़क आंकड़ों में दिखाई ही नहीं देती।
देहरादून जैसे मैदानी और शहरी इलाके भी इस मानसूनी कहर से अछूते नहीं रहे। जुलाई के अंतिम दिनों में मालदेवता क्षेत्र में 233 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। इससे नदी-नालों का जलस्तर बढ़ा और कई स्थानों पर मलबा और पानी घरों तथा सड़कों तक पहुंच गया।
देहरादून-पांवटा साहिब मार्ग पर नंदा की चौकी के पास करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से बने पुल की एप्रोच रोड का बड़ा हिस्सा भारी बारिश में धंस गया। खास बात यह रही कि पुल के उद्घाटन को अभी केवल 17 दिन ही हुए थे। पुल का मुख्य ढांचा सुरक्षित बताया गया, लेकिन एप्रोच रोड के नीचे की जमीन बह जाने से यातायात प्रभावित हुआ। घटना ने निर्माण गुणवत्ता और जलनिकासी व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े किए।
शहर में लगातार बारिश के कारण सड़कों की स्थिति भी खराब हुई। कई जगह पहले किए गए पैचवर्क के दोबारा बह जाने की शिकायतें सामने आईं। इससे यह सवाल उठने लगा कि क्या हर साल बारिश के बाद सड़क सुधार पर खर्च होने वाला पैसा स्थायी समाधान दे पा रहा है या फिर मानसून के साथ वही समस्या दोबारा लौट आती है।
बारिश की मार ने केवल सड़क और पुलों को ही नुकसान नहीं पहुंचाया। पेयजल योजनाएं भी प्रभावित हुईं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पूरे मानसून में अब तक राज्य की 424 पेयजल योजनाएं क्षतिग्रस्त हुई हैं। इनमें पिथौरागढ़ की 115 और देहरादून की 104 योजनाएं शामिल हैं। यह आंकड़ा सिर्फ जुलाई का नहीं, बल्कि मौजूदा मानसून का संचयी आंकड़ा है। फिर भी इससे स्पष्ट होता है कि बारिश का असर ग्रामीण और शहरी पेयजल व्यवस्था पर कितना व्यापक रहा है।
बारिश के कारण बिजली और संचार सेवाओं में भी बाधा आई। कई दूरस्थ इलाकों में सड़कें बंद होने के कारण राहत और मरम्मत दलों को मौके तक पहुंचने में कठिनाई हुई। कहीं जेसीबी मशीनों के पहुंचने का इंतजार करना पड़ा तो कहीं मलबा हटाने के बाद कुछ ही घंटों में दोबारा भूस्खलन होने से रास्ता फिर बंद हो गया।
बारिश का असर शिक्षा पर भी पड़ा। भारी बारिश के अलर्ट के दौरान बागेश्वर समेत कुछ जिलों में स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र बंद करने पड़े। बच्चों और अभिभावकों की सुरक्षा को देखते हुए स्थानीय प्रशासन को एहतियाती कदम उठाने पड़े।
जुलाई में सड़क बंद होने के उपलब्ध आंकड़े इस मानसून की गंभीरता का अंदाजा देते हैं। आठ जुलाई को जहां करीब 32 सड़कें बंद थीं, वहीं दस जुलाई को यह संख्या 118 और 11 जुलाई को करीब 120 तक पहुंच गई। 12 जुलाई को भी 69 सड़कें पूरी तरह बंद और 13 सड़कें आंशिक रूप से प्रभावित बताई गईं। 29 जुलाई को राज्य में 111 मार्गों के बंद होने की सूचना थी। इन आंकड़ों को जोड़कर सड़क क्षति की कुल संख्या निकालना सही नहीं होगा, क्योंकि एक ही सड़क अलग-अलग दिनों में कई बार बंद हुई हो सकती है। फिर भी ये आंकड़े बताते हैं कि राज्य के सड़क नेटवर्क पर बारिश का दबाव कितना अधिक था।
भूस्खलनों की बात करें तो जुलाई में उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, बागेश्वर और देहरादून समेत कई जिलों में लगातार छोटे-बड़े भूस्खलन दर्ज हुए। लेकिन पूरे राज्य में जुलाई के दौरान हुए भूस्खलनों की कोई एक समेकित और अंतिम आधिकारिक संख्या अभी उपलब्ध नहीं है। यही स्थिति छोटे पुलों, कलवर्टों, ग्रामीण पैदल रास्तों और निजी संपत्ति के नुकसान की भी है।
यही इस आपदा की एक बड़ी तस्वीर सामने लाता है। सरकारी रिकॉर्ड में दिखाई देने वाला नुकसान वास्तविक नुकसान का केवल एक हिस्सा हो सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग या राज्य मार्ग बंद होने की जानकारी आसानी से दर्ज हो जाती है, लेकिन किसी गांव की पगडंडी टूटने, खेत का रास्ता बहने, छोटी पेयजल लाइन क्षतिग्रस्त होने या किसी परिवार की निजी संपत्ति को हुए नुकसान का पूरा हिसाब अक्सर सामने नहीं आ पाता।
बारिश से लोगों की मुश्किलें भी केवल आवागमन तक सीमित नहीं रहीं। कई परिवारों को बाजार और अस्पताल तक पहुंचने में परेशानी हुई। तीर्थयात्री रास्तों में फंसे। ग्रामीण इलाकों में जरूरी सामान की आपूर्ति प्रभावित हुई। टैक्सी और परिवहन कारोबार पर असर पड़ा। पर्यटन पर निर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी झटका लगा। चारधाम यात्रा रुकने से यात्रा मार्ग के होटल, ढाबे, दुकानदार, टैक्सी चालक और घोड़ा-खच्चर संचालक सीधे प्रभावित हुए।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड में हर साल आने वाले मानसून के लिए बुनियादी ढांचे को वास्तव में पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किया जा रहा है। जब एक ही मार्ग पर बार-बार मलबा गिरता है, नई बनी सड़कें और पुलों की एप्रोच रोड बह जाती हैं और गांवों को जोड़ने वाले पैदल रास्तों तक का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रहता, तो समस्या केवल प्राकृतिक आपदा की नहीं रह जाती।
उत्तराखंड का भूगोल स्वाभाविक रूप से संवेदनशील है। लेकिन संवेदनशील पहाड़ी भूभाग में सड़क निर्माण, कटिंग, जलनिकासी, पुल निर्माण और बस्तियों के विस्तार की गुणवत्ता ही यह तय करती है कि भारी बारिश एक सामान्य मानसूनी घटना रहेगी या बड़ी आपदा में बदल जाएगी।
जुलाई 2026 का मानसून फिलहाल यही सवाल छोड़ रहा है—बारिश हर साल होगी, भूस्खलन का खतरा भी रहेगा, लेकिन क्या उत्तराखंड हर साल उसी तरह सड़क टूटने, गांव कटने और लोगों के फंसने का इंतजार करता रहेगा?
सबसे जरूरी जरूरत अब केवल मलबा हटाकर सड़क खोलने की नहीं, बल्कि बारिश, भूस्खलन और बाढ़ के संयुक्त खतरे के आधार पर पहाड़ी बुनियादी ढांचे की दीर्घकालिक योजना बनाने की है। वरना हर मानसून के बाद सड़कें खुल जाएंगी, लेकिन नुकसान और सवाल दोनों जस के तस बने रहेंगे।
( इस रिपोर्ट के लिए AI से सहायता ली गई है।)
फोटो इंटरनेट से साभार।































