शीशपाल गुसाईं
देहरादून की युवा शिक्षिका सृष्टि कंडारी की मृत्यु केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे समाज के अंतर्मन को झकझोर देने वाली घटना है। यह घटना हमें सोचने के लिए विवश करती है कि क्या विज्ञान और तकनीक की ऊंचाइयों को छू लेने भर से समाज आधुनिक हो जाता है, या आधुनिकता का वास्तविक अर्थ वैज्ञानिक सोच, संवेदनशीलता और मानवीय गरिमा को स्वीकार करना भी है?
सृष्टि कंडारी एक प्रतिभाशाली युवती थीं। वे राजकीय इंटर कॉलेज में प्रवक्ता (लेक्चरर) थीं और गोल्ड मेडलिस्ट भी थीं। लगभग आठ महीने पहले उनका विवाह सौरभ खत्री के साथ हुआ था। उनके पति उत्तराखंड सचिवालय में अपर निजी सचिव के पद पर कार्यरत बताए जाते हैं। समाचारों के अनुसार, विवाह के कुछ ही समय बाद परिवार में उनके ससुर का निधन हो गया। इसके बाद, आरोप है कि सृष्टि को बार-बार “अपशकुनी” कहकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
बताया जाता है कि आत्महत्या से पहले उन्होंने अपनी मां, जो श्रीकोट (श्रीनगर गढ़वाल) में रहती हैं, को एक भावुक वीडियो भेजा। उस वीडियो में उन्होंने रोते हुए अपनी मानसिक पीड़ा व्यक्त की। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह वीडियो जांच का महत्वपूर्ण आधार बना और पुलिस ने मामले में ससुराल पक्ष के कुछ सदस्यों के विरुद्ध कार्रवाई की। इन आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और जांच पूरी होने के बाद ही होगी।
लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सामाजिक प्रश्न हमारे सामने रख दिया है—क्या किसी व्यक्ति की मृत्यु के लिए किसी बहू को दोषी ठहराया जा सकता है?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
किसी व्यक्ति की मृत्यु जीवन का एक दुखद, किंतु प्राकृतिक सत्य है। उसे किसी महिला के आगमन से जोड़ देना अंधविश्वास है। न विज्ञान इसकी पुष्टि करता है, न तर्क और न ही मानवीय मूल्य।
विडंबना देखिए। एक ओर भारत चंद्रयान-3 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचाता है, आदित्य-एल1 सूर्य के रहस्यों का अध्ययन करता है, भारतीय वैज्ञानिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतरिक्ष विज्ञान में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं; दूसरी ओर समाज का एक हिस्सा आज भी “मनहूस”, “अपशकुनी” और “अशुभ” जैसी धारणाओं से बाहर नहीं निकल पाया है।
यह केवल शिक्षा की कमी का प्रश्न नहीं है। अनेक बार उच्च शिक्षित परिवार भी ऐसे अंधविश्वासों के शिकार मिलते हैं। इसलिए शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री नहीं, बल्कि विवेक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवेदनशीलता भी है।
भारतीय इतिहास में महिलाओं को अंधविश्वासों का सबसे बड़ा शिकार बनाया गया है। कभी विधवा को अशुभ कहा गया, कभी पुत्री के जन्म को दुर्भाग्य माना गया, कभी किसी बीमारी या दुर्घटना का दोष महिलाओं पर मढ़ दिया गया। समाज ने समय के साथ कई कुरीतियों को छोड़ा, लेकिन कुछ धारणाएं आज भी हमारे बीच जीवित हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(क)(ह) में प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य बताया गया है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा सुधार की भावना का विकास करे। यह केवल संवैधानिक प्रावधान नहीं, बल्कि आधुनिक भारत का सामाजिक दर्शन है। यदि परिवारों में ही वैज्ञानिक सोच का अभाव रहेगा, तो संविधान की यह भावना अधूरी रह जाएगी।
महात्मा गांधी ने कहा था, “किसी समाज की महानता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वह अपनी महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है।” यदि किसी शिक्षित महिला को भी अंधविश्वास के नाम पर मानसिक यातना झेलनी पड़े, तो यह केवल एक परिवार की विफलता नहीं, बल्कि समाज के आत्ममंथन का विषय है।
आज आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं, बल्कि घर-घर में सोच बदलने की है। बेटियों और बहुओं को सम्मान, समानता और विश्वास का वातावरण देना होगा। परिवार तभी मजबूत बनते हैं, जब उनमें प्रेम, संवेदना और संवाद हो; भय, ताने और अंधविश्वास नहीं।
सृष्टि कंडारी अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन यदि उनकी मृत्यु समाज को अंधविश्वास के विरुद्ध खड़ा होने की प्रेरणा देती है, यदि इससे किसी एक बेटी का जीवन भी बचता है, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आइए संकल्प लें कि किसी भी महिला को कभी “अपशकुनी” नहीं कहेंगे। क्योंकि अशुभ कोई इंसान नहीं होता—अशुभ होती है वह सोच, जो बिना किसी प्रमाण के किसी निर्दोष व्यक्ति को दोषी ठहरा देती है।
अब समय आ गया है कि भारत केवल अंतरिक्ष में ही नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक चेतना में भी नई ऊंचाइयों को छुए।
संदर्भ:
◆ भारतीय संविधान, अनुच्छेद 51(क)(ह)।
◆ राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), Accidental Deaths & Suicides in India।
◆ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), चंद्रयान-3 मिशन।
◆ राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की संबंधित रिपोर्टें।
◆ घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005।
◆ देहरादून के विभिन्न समाचार पत्रों एवं विश्वसनीय मीडिया में प्रकाशित समाचार (सृष्टि कंडारी प्रकरण)।































