कैलाश मावड़ी
वर्तमान में उत्तराखंड के अनेकानेक स्थानों पर अभिभावक आंदोलन कर रहे हैं कि उनके पड़ोस में जो स्कूल है उसे बंद न किया जाए। उत्तराखंड के शिक्षामंत्री और शिक्षा विभाग के अधिकारी बार-बार यह कह रहे हैं कि कोई भी स्कूल बंद नहीं किया जाएगा। लेकिन इस आश्वासन के बाद भी अभिभावकों के आंदोलन चल ही रहे हैं। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में तो जनांदोलन के दबाव में योगी सरकार को बैकफुट पर आना पड़ गया और यह फैसला किया गया कि वहाँ फिलहाल 50 से अधिक छात्रों और एक किमी. से अधिक दूरी वाले स्कूलों का क्लस्टर विद्यालयों में विलय नहीं किया जाएगा। क्लस्टर स्कूल योजना उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। नई शिक्षा नीति 2020 के अन्तर्गत इसे पूरे भारत में लागू किया जाना है। आगे बढ़ने से पहले यह जान लेते हैं कि कलस्टर स्कूल योजना है क्या ?
अभी तक बच्चों की पहुँच स्कूलों में बढ़ाने के लिये एक किमी. के अन्तर्गत प्राइमरी, 3 किमी. तक जूनियर और 5 किमी. के दायरे में माध्यमिक विद्यालय खोले गए। परिणामस्वरूप देश में इन तीनों श्रेणियों के लगभग 15 लाख विद्यालय संचालित हैं, जिनमें 25 करोड़ बच्चे अध्ययनरत हैं तथा उन्हें पढ़ाने के लिए 95 लाख शिक्षक कार्यरत हैं। बहुत बड़ी संख्या में विद्यालयों के होने और अलग-अलग स्थानों पर होने के कारण इनमें संसाधनों का नितांत अभाव रहा है। इसे देखते हुए नई शिक्षा नीति में यह संस्तुति की गई है कि 5-10 किमी. के दायरे में एक क्लस्टर स्कूल या स्कूल काॅम्पलैक्स की स्थापना की जाएगी। ये स्कूल सभी संसाधनों से लैस होंगे, अर्थात् वहाँ पर्याप्त मात्रा में शिक्षक, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, आई.सी.टी.लैब, खेल का मैदान आदि विद्यार्थियों को उपलब्ध होगा। अलग-अलग प्राथमिक उच्च प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय की अपेक्षा स्कूल काॅम्प्लेक्स (क्लस्टर स्कूल) में पूर्व प्राइमरी से लेकर इन्टरमीडिएट तक की शिक्षा एक ही परिसर में विद्यार्थियों को मिल सकेगी। नयी शिक्षा नीति में क्लस्टर स्कूल की अवधारणा के पीछे यह तर्क दिया गया है कि वर्तमान में कक्षा एक से बारहवीं कक्षा तक एक ही कैम्पस में शिक्षा देने वालों की संख्या केवल 70,000 है जो कुल विद्यालयों का 0.4 प्रतिशत है। इनकी विशेषता यह रही है कि यहां विद्यार्थी बार-बार प्रवेश लेने में होने वाली दिक्कतों का सामना नहीं करते। परिणामस्वरूप इन विद्यालयों में बीच में पढ़ाई छोड़ने यानी ड्राॅप आऊट की समस्या न के बराबर है। ऐसे स्कूलों की संख्या बढ़ाकर ही भारत में माध्यमिक शिक्षा के नामांकन को सन् 2030 तक 100 प्रतिशत किया जा सकता है।
नई शिक्षा नीति में यह भी उल्लेख किया गया है कि क्लस्टर स्कूल ‘बाल भवन व सामाजिक चेतना केंद्र’ के रूप में विकसित किए जाएंगे। क्लस्टर स्कूल में स्थित संसाधनों का प्रयोग आसपास के अन्य विद्यालय भी कर सकेंगे।
उत्तराखंड में नई शिक्षा नीति को पहले पहल लागू किया गया। इसके अन्तर्गत 2023 से ही क्लस्टर स्कूल पर कार्य प्रारम्भ किया गया। राज्य के 1,200 माध्यमिक विद्यालयों में 539 को क्लस्टर विद्यालय के रूप में चुना गया है। इसके बाद मामला कुछ खास आगे नहीं बढ़ा। मगर 2025 में इस दिशा में नई हलचल शुरू होने लगी है। प्रदेश में कुछ क्लस्टर विद्यालयों को बजट आबंटित किए गए। उत्तरकाशी जनपद में मुख्यमंत्री ने 15 स्कूल बसों को को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। ये बसें दूरदराज के बच्चों को क्लस्टर विद्यालय से जोड़ने के लिए शुरू की गईं हैं। शिक्षा विभाग द्वारा क्लस्टर विद्यालयों की सूची जारी की गई और बताया गया कि क्लस्टर विद्यालय में प्रवेश के लेने, विद्यार्थियों को स्कूल आने जाने के लिए मार्ग व्यय के रूप में एक निश्चित धनराशि प्रतिदिन के हिसाब से दी जायेगी साथ ही छोटे बच्चों को स्कूल लाने ले जाने के लिए एस्कॉर्ट की व्यवस्था की जाएगी। इन घोषणाओं के मद्देनजर जनता को आभाष होने लगा कि भविष्य में केवल कलस्टर विद्यालय ही रह जाएंगे और उनके पड़ोस का विद्यालय जिसके बंद होने की चर्चा बार – बार होती रही है वह जल्द ही बंद हो जाएगा। उनकी यही आशंका आंदोलन का कारण बनी हुई है।
इस समय उत्तराखंड में 1149 प्राथमिक विद्यालय शिक्षा विहीन हैं, 3000 से अधिक विद्यालय एकल शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। 3000 प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की संख्या 10 से भी कम है। माध्यमिक विद्यालयों में भी साल दर साल विद्यार्थियों की संख्या घटती जा रही है। अनेक हाइस्कूल 50 से कम तो इंटरमीडिएट कॉलेज में भी 100 से कम विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। ऐसे में कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों का विलय और छात्र-शिक्षक अनुपात सही करने की बातें शिक्षा विभाग में विगत कई वर्षों से जारी हैं। नई शिक्षा नीति में क्लस्टर स्कूल को भी इसी रूप में देखा जा रहा है। सरकार इतनी बड़ी संख्या में स्कूलों के संचालन को संसाधनों के अपव्यय के रूप में देख रही है।
जैसे-जैसे शिक्षा विभाग क्लस्टर स्कूल योजना पर आगे बढ़ रहा है। वैसे-वैसे अभिभावकों, शिक्षकों, शिक्षाविदों और नागरिकों की आशंकाएं भी बढ़ती जा रही हैं। अभिभावको को चिन्ता है कि क्लस्टर योजना के तहत यदि उनके स्कूल का विलय होता है तो उनके बच्चे किस तरह मीलों दूर क्लस्टर स्कूल तक पहुँचेंगे ? उन्हें सरकार की स्कूल लाने-ले जाने वाली व्यवस्थाओं पर भरोसा पैदा नहीं हो पा रहा है। कुछ क्लस्टर स्कूल 15-20 किमी. की दूरी पर भी बनाए गए हैं। ऐसे में हाईस्कूल-इंटरमीडिएट में पढ़ने वाली बालिकाओं की शिक्षा और भी चुनौतीपूर्ण हो जाएगी। आज पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली जानवरों का खतरा, नदी-नाले, खराब सड़कें ये सब विद्यार्थियों के स्कूल पहुँचने के मार्ग में चुनौतियाँ बनी हुई हैं। जब क्लस्टर स्कूल योजना में स्कूल की दूरी बढ़ने पर बच्चों के स्कूलों तक पहुँच और भी कठिन हो जाएगी। अभिभावकों की यह चिन्ता आंदोलन की बड़ी वजह है।
शिक्षकों के विभिन्न संगठन भी क्लस्टर स्कूल योजना के विरोध में हैं। उनकी चिंता है कि बड़ी संख्या में स्कूलों का विलय होगा तो शिक्षकों के पद समाप्त होगे, पदोन्नति प्रभावित होगी और स्थानान्तरण के अवसर घट जाएंगे। विशेषकर दूरस्थ विद्यालयों में इंटरमीडिएट स्तर पर विज्ञान पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 10 से कम ही होती है, इन्हीं छात्रों को क्लस्टर स्कूल में प्रवेश दिला दिया गया तो आसपास के तीन-चार इंटरमीडिएट कॉलेजों में विज्ञान पढ़ाने वाले प्रवक्ताओं की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। क्लस्टर योजना के बहाने यह कार्य तो शिक्षा विभाग कभी भी कर सकता है।
बेरोजगारों की दृष्टि से देखा जाए तो यह योजना भविष्य में उनके शिक्षक बनने के सपने पर भी चोट पहुंचाती है। जब 1300 प्राथमिक, 1000 उच्च प्राथमिक स्कूलों में और 1200 माध्यमिक विद्यालय 539 में समाहित जाएंगे तब शिक्षा के क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का क्या होगा। ‘क्लस्टर स्कूल योजना’ पर्वतीय राज्य की अवधारणा के एकदम उलट जान पड़ती है। उत्तराखंड राज्य निर्माण की बुनियाद में यही तथ्य था कि यहाँ के नागरिकों की पहुँच स्कूलों, अस्पतालों तक आसानी से हो। इन सुविधाओं के अभाव में पलायन न करना पड़े। ऐसे में बेसिक स्कूल का 5-10 किमी. के दायरे में होना समझ से परे है। दूसरा उत्तराखंड की पर्यावरणीय स्थिति है। जिन स्कूलों को सरकार ने क्लस्टर विद्यालय के रूप में चुना है, क्या वहाँ इतने बड़े निर्माण संभव हैं जिनमें कक्षा 1 से लेकर 12 तक के सैकड़ों छात्र संसाधनों के साथ अध्ययन कर सकें ? अभी जिन विद्यालयों को क्लस्टर स्कूलों के रूप में चुना गया है, ढाँचागत सुविधाओं और संसाधनों की दृष्टि से उनकी स्थिति खराब है उन पर आसपास और दो-तीन विद्यालयों का विलय होने पर किस प्रकार उनका संचालन होगा ?
विद्यालयों को संसाधन उपलब्ध कराने की दृष्टि से हमारी सरकारों का रिकॉर्ड खराब ही रहा है। ऐसे में आधे-अधूरे तरीके से शुरू की गई ‘क्लस्टर स्कूल योजना’ वर्तमान व्यवस्था को और खराब कर सकती है और विद्यालयों की बढ़ती दूरी ग्रामीणों को पलायन के लिए मजबूर कर सकती है।

































