चन्द्रशेखर तिवारी
पहाड़ के वरिष्ठ लोक संस्कृति कर्मी जुगल किशोर पेटशाली एक ऐसे लोक संस्कृतिकर्मी और लेखक थे जिनकी कलम उत्तराखण्ड की थात को समृद्ध करने का काम कई सालों से लगातार करती आ रही थी। लोक संस्कृति के लिए उनके द्वारा जो योगदान दिया गया वह वाकई में बहुत बड़ा काम था। पिछले दो साल पहले उन्हें सांस्कृतिक योगदानक के लिए नई दिल्ली, राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमिक की तरफ से ‘संगीत नाटक अकादमी अमृत अवार्ड दिया गया था।. साल 2022 के आखिरी महीने में देहरादून में स्थित दून पुस्तकालय एवम् शोध केंद्र की ओर से पेटशाली जी के कुमांऊ के लोकगाथाओं पर आधारित किताब ‘मेरे नाटक‘ और अन्य चार किताब ‘जी रया जागि रया‘,‘ विभूति योग‘, ‘गंगनाथ-गीतावली‘ और ‘हे राम‘ का लोकार्पण देहरादून में किया गया था।
जुगल किशोर पेटशाली जी का जन्म 7 सितम्बर, 1946 को अल्मोड़ा शहर के नजदीक चितई गांव में हुआ था। बचपन में उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गांव की प्राइमरी स्कूल में और उसके बाद आगे की पढ़ाई-लिखाई अल्मोड़ा के गर्वन्मेन्ट इण्टर कालेज में हुई। पेटशाली जी अपने भीतर लोक के बीज अंकुरित कराने का सारा श्रेय ग्वाला जाने वाले अपने गायक साथियों को दिया करते थे। जिन्होंनंे गुरु के तौर पर उन्हें लोक से साक्षात्कार कराने का उपक्रम किया । जंगल में गाय-बछियों को चराते समय उन्होंने अपने संगी साथियों से खेल-खेल में जागर और लोकगीतों की बारहखड़ी सिखी। अल्माड़ों में पढ़ाई के दौरान हिन्दी के मास्साब और नामी गिरामी लोक साहित्य के रचनाकार चारुचन्द्र पाण्डे जी से पेटशाली जी को बहुत प्रेरणा मिलती रही। अल्माडे़ में पढ़ाई के दौरान पेटशाली जी पुराने कवियों की कविता पर अपनी पैरोडी बनाकर कविता लिखने की शुरुआत की। आगे जाकर उन्होंने कुमाउंनी लोक रंगकर्म और साहित्य पर अपनी कलम चलाई और लोक कलाकारों व संस्थाओं से जुड़ कर ये लोक संस्कृति के विकास व संरक्षण काम में जुटे रहे। हांलाकि इनके माता पिता इन्हें अपने पैतृक कारोबर से जोड़ना रहे थे पर जुगल युवा पेटशालि जी के मन में लोक रंगकर्म और साहित्य रचना की धुन ऐसी सवार हुई कि उन्होंने कारोबार में हाथ बंटाने से साफ मना कर दिया। पिता के साथ खटपट होने के बाद पेटशाली जी ने पीछे नहीं देखा और जैसे-तैसे पांव में खडे़ होने की पुरजोर कोशिश करी। बादमें उन्होंने पूरा तन-मन-धन सब पहाड़ की लोक संस्कृतिक के लिए न्यौछावर कर दिया। महत्वपूर्ण बात यह रही कि अपने जीवन के अन्त समय में स्वास्थ्य खराब होने के बाबजूद भी वे पहाड़ की संस्कृति व साज सम्हाल के काम में जुडे़ रहे।
लोक से जुड़े तमाम किस्मों की चीजों को इक्ट्ठा करने का शौक पेटशाली जी को पहले से रहा था। आसपास से लेकर दूर दराज के गांवों से उन्होंने पहाड़ के ढोल, दमौं, नंगाड़े,रणसिंग, तुतुरि जैसे वाद्य यंत्र, पुराने बरतन, पुराने जमाने के हाथ से लिखी किताबें, पुराने और दुर्लभ प्रकाशित लिखित सामग्री, ग्रामोफोन और तमाम किस्मों की चीजें उन्होंने संग्रह कि हुई थी। बाद में उन्होंने अपने खुद के प्रयासों से तकरीबन 2002-03 में चितई गांव में एक लोक संस्कृति संग्रहालय की स्थापना भी की जो कि एक सार्थक प्रयास था। कुछ सालों से जब इस संग्रहालय की देखरेख समुचित से नहीं हो पा रही थी और उनकी अक्सर तबियत खराब रहने लगी थी तब उस वजह से उन्होनें दो-तीन साल पहले इस संग्रहालय की अधिकतर सामग्री दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र को निशुल्क रुप में भेंट दी थी। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में इनके नाम पर यहां पर एक संग्रहालय कक्ष बना हुआ है। ‘जुगल किशोर पेटशाली संग्रहालय‘ के नाम से उनके द्वारा संग्रहित विविध सामग्री को संास्कृतिक अध्येता, शोधार्थी व आम लोग देखने के लिए यहां लिजी और आम लोगबाग आते रहते हैं।
इस संग्रहालय में पेटशाली ज्यू द्वारा भेंट की गयी चालीस से ज्यादा खास चित्र तीस से ज्यादा पहाड़ के के पुराने वाद्ययंत्र, बीस से ज्यादा प्रकार के पुराने बरतन सौ के करीब पुरानी छपी किताबें, अखबार,पंचांग और कुछ संस्कृत में हाथ से लिखी पाण्डुलिपियां मौजूद हैं। संग्रहालय में इसके अलावा ग्रामोफोन, रेडियो, रिकॉर्ड प्लेयर,कैसेट व कुछ पुराने कैमरा भी प्रदर्शित हैं। इसके अलावा यहां के इस संग्रहालय में घरेलू काम में प्रयुक्त पुराने सामान जैसे हुक्के-चिलम, ताले कंघी, शीशा लम्फू, लालटैन, पैट्रोमैक्स, दातुली, बण्याठ, रस्सी, सूप व पूजा-पाठ में आने वाली सामग्री भी संग्रहित है। पहाडों में चलन में रही काठ के बरतन जैसे दही मथने वाला डकौव, दही रखने की ठेकी, हड़पि, चैथेई, फरुवा, आनाज मापने के काष्ठ मापक जैसे माणा, पाथा और खत्म होने के कगार पर दुर्लभ समान इस संग्रहालय में रखे हुए हैं।
इन सामग्री के अलावा इस संग्रहालय में मुख्य सचिव उत्तराखण्ड और दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के पूर्व अध्यक्ष स्व. सुरजीत किशोर दास के निजी संग्रह से प्राप्त मुगल व मध्यकालीन कई दुर्लभ व पुराने सिक्के और संसार के अनेक देशों द्वारा महात्मा गांधी जी के सम्मान में जारी किये गये विविध डाक टिकटों का शानदार संग्रह भी आम लोगों के दर्शनार्थ रखा हुआ है। इतिहास व पुरातत्व पर काम करने वाले डॉ. प्रह्लाद सिंह रावत के सौज्न्य से यहां पुरोला इलाके में मिले मृदभाण्ड के टुकुड़े, आदि रखे हैं। संग्रहालय के बाहर दर्शक दीर्घा में बंगाल के प्रसिद्ध चित्रकार रथिन मित्रा के बणाये रेखांकनों के साथ ही विविध समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित गांधीं ज्यू पर आधारित कार्टून्स और इतिहासकार डॉ. योगेश धस्मानाक के संग्रह से मिले स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन और उत्तराखण्ड आदोंलन सम्बन्धी कई दुर्लभ व जानकारी देने वाले चित्र भी आम लोगों के लिए प्रदर्शित किये हुए हैं।
जुगल किशोर पेटशाली जी ने अल्मोड़ा के समीप चितई गांव में लोक संग्रहालय की स्थापना करने से लेकर लोक थात पर कई किताबों की रचना की। अपने जीवन के शुरुआती वक्त में जिन विषम हालातों में रहकर उन्होंने लोक साहित्य व रंगमचक के संरक्षण के लिए जो भी प्रयास किये उसे पेटशाली जब तब बड़ी शिद्दतक के साथ याद ते थे। उन्होंने दूरदर्शन के लिए राजुला मालूशाही धारावाहिक श्रंखला और अन्य महत्वपूर्ण नाटकों के लिए पटकथा लिखने के अलावा बहुत सारे नाटकों का निर्देशन भी किया था।
जुगल किशोर पेटशाली जी ने पहाड़ के लोक साहित्य पर जो भी कार्य किया हुआ है वह लोक संस्कृति के लिए काम करने वाले अध्येताओं के शोध कार्यों में बहुत मददगार साबित रहा है। कुमाऊं के लोकगाथाओं पर आधारित उनकी किताब ‘मेरे नाटक‘ में चार शानदार हिन्दी नाटक शामिल हैं। यह सब नाटक आज से तीन सौ से पाँच सौ साल पहले के समाज और उस समय के ऐतिहासिक घटनाक्रमों पर आधारित हैं। इन नाटकों का अगर प्रस्तुतिकरण किया जाय तो ये नाटक उस समय के घटनाक्रम को रंगमंच में जीवंत करने में पूरी तरह सक्षम दिखते हैं।
उत्तराखण्ड के सालों पहले राजकाज में तत्कालीन समाज के इतिहास से जुड़ी खास घटनाओं के तमाम प्रसंगों को इन नाटकों के माध्यम से सामने लाने का भरसक प्रयास पेटशाली जी ने किया हुआ है। नाटककार के तौर पर पेटशाली जी का असल उद्देश्य इन नाटकों के माध्यम से पुराने राजव्यवस्था के दौर में मौजूद सामंतवादी, निरंकुशता व राजनैतिक अन्याय ,भ्रष्टाचार, और बेगार व्यवस्थाक के खिलाफ़ इक्कट्ठा होकर तत्कालीन समाज का विरोध साफ तौर पर प्रकट करना रहा है। देखा जाय तो हमारे समाज के इर्द-गिर्द इस तरह के हालात अनेक कालों में मौजूद रही है।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से 21 नवम्बर 2022 को पेटशाली जी की जिन पांच किताबों का लोकार्पण किया गया उनके नाम हैं – 1.कुमाऊं की लोकगाथाओं पर आधारित ‘मेरे नाटक‘,2.जी रया जागि रया‘,(कुमाउनी कविता संग्रह), 3.‘गंगनाथ-गीतावली‘,(सम्पादित) 4.‘विभूति योग‘ और 5. ‘हे राम‘ (काव्य संग्रह)। इस आलेख में उनकी इन किताबों के बारे में सामान्य परिचय देना भी उचित रहेगा।
पहली किताब ‘मेरे नाटक‘, में लोकगाथाओं पर आधारित चार पुराने नाटक शामिल है। इसमें पहला नाटक राजुला-मालूशाही गीत-नाटिका में हमें भोट इलाके के शौका व्यापारी सुनपति की लड़की राजुला और बैराठ के राजा दुलशाई के लड़के मालूशाई के हृदय में पैदा हुए श्वाश्त प्रेम का शानदार वर्णन देखनने को मिलता है। नाटक में एक जगह राजुली के सुन्दरता का अनुपम वर्णन आया हुआ है जिसमें उसकी तुलना पूर्णिमा के चन्द्रमा और हरी-भरी डाली के साथ किया हुआ है। -पूनम कैसी चांद राजुला/ हरी-भरी सी डाली राजुला/दिन दिन बढ़ती जाये/दिन-दिन बढ़ती जाये/राजुला दिन-दिन बढ़ती जाये…./होंठ में जैसे तृष्णा घट है/मेघों सी घुंघराली लट है/मानस सर की हिम बाला सी/लगता है जैसे, ये बाला तो युग-युगों से प्यासी…./राजुला…तू है कितनी प्यासी…/युग-युगों से प्यासी…। (राजुला-मालूशाई)
वहीं दूसरी तरफ गोलज्यू पर आधारित बाला गोरिया गीत-नाटिका में काली कुमाउं में चम्फावत गढ़ी के राजा हलराई की सात रानियों की तरफ से रानी कालिंगा को दी जाने वाली कुटिल यातनाओं के दुःख भरी कथा मिलती है। अजुवा-बफौल नाटक में बफौलीकोट में रहने वाले बाईस भाई बफौलियों के अकट पराक्रम और उनके नगाड़ों की गर्जनभेदी हुंकार राजा भारती चंद और उसकी डोटियालि रानी को बहुत बैचेन जैसी कर देती है। नौ-लखा दीवान नाटक में आसपास के गांव वालों के लिए राजा दीपचंद के मुंह लगे दीवान सकराम पांडे का एक अत्याचारी मनुष्य रुप में तथा कल्याण सिंह यानि कलबिष्ट का चरित्र एक देवतुल्य परोपकारी मानव के तौर पर सामने आता है। इस नाटक में कलबिष्ट की छवि को नाटककार पेटशाली जी ने आम लोगों के हित में ओगे खड़ा रहने वाले वीर पुरुष के रुप में शानदार तरीके से दे रखा है। इसमें एक उल्लेखनीय प्रसंग इस तरह आया है ‘‘फिर आग लगवायेगा… तबाही मचायेगा…ऐसे कब तक चलेगा…मैं कहता हूँ आप सब अपने आप को पहचानें…अरे! हम पहाड़ के रहने वाले लोग हैं…हमने इन कठोर चट्टानों और पहाड़ों को काटकर रास्ते बनाये, खेत, मकान बनाये, इन्हें आबाद किया है…दीवान इन चट्टानों से ज्यादा तो मजबूत नहीं होगा… हम लोगों को मिलकर उसका मुकाबला करना होगा…इस इलाके के सभी गाँव के लोगों को एक करना होगा…आओ मेरे साथ…‘‘ (नौ-लखा दीवान)
अन्याय व बेगारी के खिलाफ जब एक सधारण गाय भैंसे चराने वाला आम व्यक्ति कलबिष्ट गांव वालों के साथ मिल कर विरोध करने लगता है तब गुस्से से फनफनाया वह नौ लखा दीवान कलष्टि को उसके ही जीजा लछम सिंह के हाथों धोखा देकर मरवा देता है। बाद में गांव वाले सब इक्कट्ठा होकर नौलखा दीवान को मार कर इस अत्याचार से मुक्ति पा लेते हैं। अत्याचार और अन्याय के खिलाफ खडे़ होने वाले इस कल्याणकारी पुरुष कल्याण सिंह यानि कलबिष्ट को आज भी लोगबाग गैराड़ के गोलज्यकू के रूप में आदर के साथ पूजते हैं।
कुमाउनी बोली-भाषा के शानदार ठसक और परम्परा में चलकर आयी लोक धुन हिंदी में रचित इन गीत-नाटकों को खास बना देती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि पहाड़ के लोक संगीत के माटी की खुसबू इन नाटकों के कथानक व संवादों में साफ तौर पर महसूस करी जा सकती है।
इसके अलावा पेटशाली जी की ‘जी रया जागि रया‘ किताब कुमाउनी कविताओं का संग्रह है। इस संकलन में पहाड़ के परिवेश से जुड़ी तमाम किस्मों के खास-खास रचनाओं का संकलन हुआ है। इन्होंनंे ‘विभूति योग‘ पुस्तिका में श्रीमद् भागवतगीता के दशम अध्याय का हिन्दी व कुमांउनी भाषा में भावानुवाद भी किया हुआ है। ‘गंगनाथ-गीतावली‘ वालि लधु पुस्तिका जो पहले साठ के दशक के दरम्यान अल्मोड़ा के वैद्य पण्डित पीताम्बर पाण्डे जी ने लिखी थी उसकी प्रस्तावना लेखन और संपादन पेटशाली जी ने किया था। ‘हे राम‘ नाम से लिखी किताब में उन्हांेने श्री राम के चरित्र को नई तरीके से सुन्दर कवितात्मक शैली में प्रस्तुत किया है।
जुगल किशोर पेटशाली जी की हिन्दी में और भी कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। इनमें मुख्यतः यह हैं -1.राजुला मालूशाही(महाकाव्य), 2.जय बाला गोरिया, 3.कुमाऊं के संस्कार गीत, 4.बखत (कुमाउनी कविता संग्रह), 5.उत्तरांचल के लोक वाद्य, 6.कुमाउनी लोकगीत, 7.पिंगला भृतहरि(महाकाव्य), 8.कुमाऊं के लोकगाथाएं, 9.गोरी प्यारो लागो तेरो झनकारो (कुमाउनी होली गीत संग्रह), तथा 10.भ्रमर गीत,(सम्पादित)। इसके अलावा उनकी चालीस से ज्यादा आलेख व कविताएं अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओंन में छपी हुई हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से उनके कई कार्यक्रम भी प्रसारित हुए हैं। पेटशाली जी के लिखे कई नाटकों का जगह-जगह प्रदर्शन भी हुआ है। एक विशेष बात यह भी है कि इनकी लिखी राजुला-मालूशाई नाटक पर दूरदर्शनल ने एक धारावाहिक बनाकर उसे प्रसारित भी किया है। यहां पर इस बात का जिक्र करना सही रहेगा कि जुगल किशोर पेटशाली जी को उ.प्र. हिन्दी संस्थान की तरफ से जय शंकर प्रसाद पुरस्कार, सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार और उत्तराखण्ड सरकार से वरिष्ठ संस्कृति कर्मी पुरस्कार, व कुमाऊं गौरव पुरस्कार भी मिला हुआ है। भले ही जुगल किशोर पेटशाली जी आज इस संसार में नहीं हैं पर उनका पहाड़ की संस्कृति को बचाने के लिए किया गया काम जुग – जुग तक हमारे समाज में मौजूद जरुर रहेगा।

































