जगमोहन रौतेला
पच्चीस साल का उत्तराखंड अब पूरी तरह गबरू जवान है। परन्तु विगत 25 सालों के इतिहास पर नजर डालें तो यह युवक हमें विकलांग जैसा लगता है। एक पहाड़ी राज्य होने की जो कल्पना राज्य आन्दोलन के दौरान की गई थी, वह धूल-धूसरित हो गई है।
आँकड़ों में उत्तराखण्ड आर्थिक तौर पर मजबूत दिखाई देता है। मगर धरातल पर स्थिति उलट है। पलायन पहले से ज्यादा तेज हुआ है। मानवविहीन होते घरों और गाँवों की संख्या हर साल बढ़ रही है। अगर हमारी अब तक की 6 सरकारें 25 सालों में युवाओं के लिए रोजगार की सफल नीति ही नहीं बना पाई तो यह उनका निकम्मापन ही तो है।
इस असफलता का सबसे बड़ा कारण यह है कि अब तक यहाँ भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की ही सरकारें रही हैं। ये राजनीतिक दल मन से कभी भी उत्तराखण्ड राज्य के समर्थन में नहीं थे। भारी जन दबाव के कारण ही इन्होंने पृथक राज्य की माँग को स्वीकार किया। सबसे बड़ा नुकसान भाजपा ने यह किया था कि केंद्र सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश विधानसभा को जो विधेयक उसकी मंजूरी के लिए भेजा गया था, उसमें भाजपा की तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने 26 संशोधन कर दिए, जो भावी उत्तराखंड राज्य को कई मामलों में उत्तर प्रदेश का उपनिवेश बनाते थे। आज भी यहाँ जल, जंगल, जमीन सम्बन्धी अधिकांश कानून थोड़ा बहुत संशोधन के बाद उत्तर प्रदेश वाले ही चल रहे हैं।
भाजपा के नेतृत्व वाली तत्कालीन केंद्र सरकार ने तो भावी राज्य की पीठ में छुरा ही घोंप दिया। उत्तर प्रदेश को भेजे गये उत्तराखण्ड राज्य बनाए जाने सम्बन्धी विधेयक में सिर्फ 12 जिले पिथौरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर, अल्मोड़ा, नैनीताल, उधमसिंह नगर, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी और देहरादून शामिल थे। हरिद्वार जिला शामिल नहीं था। उत्तर प्रदेश विधानसभा ने भी हरिद्वार को उत्तराखण्ड में मिलाए जाने का कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार को नहीं भेजा था। मगर जब ‘उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक-2000’ संसद की मंजूरी के लिए लोकसभा के पटल पर रखा गया तो भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा हरिद्वार जिले को उत्तराखण्ड में शामिल किए जाने का संशोधन लगा दिया गया। किसके दबाव और किनके इशारों पर ऐसा किया गया, यह आज तक भी रहस्य ही है। यह संशोधन एक पहाड़ी राज्य के तौर पर उत्तराखण्ड की पहचान खत्म करने की कोशिश थी। इसका तब पूरे हरिद्वार जिले में जबर्दस्त विरोध हुआ था, जो राज्य बनने के चार-पाँच साल बाद तक जारी रहा। सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर उत्तराखण्ड की पहाड़ी राज्य की पहचान को खत्म करने के भाजपा के ये दो बड़े षड़यंत्र आज उत्तराखण्ड को भारी पड़ रहे हैं।
एक तीसरा बड़ा षड़यंत्र राज्य की राजधानी न घोषित करने का था। संसद में पारित विधेयक में उत्तराखण्ड राज्य का जिक्र था, लेकिन राज्य की राजधानी का नहीं। उस वक्त अफसरशाही की सुविधा के लिये अस्थायी रूप से देहरादून में स्थापित की गई राजधानी जन भावनाओं को ठेंगा दिखाते हुए पिछले 25 सालों से गैरकानूनी और गैर संवैधानिक रूप से वहीं जमी हुई है।
भाजपा की इस हरकत का तब उत्तराखण्ड में कोई विशेष विरोध नहीं हुआ। भाजपा की स्थानीय इकाई ने भी राजधानी के मामले में अपने केंद्रीय नेतृत्व के सामने घुटने टेक दिए थे। कांग्रेस के नेतृत्व को लगा कि अगर वह राजधानी को लेकर उत्तराखण्ड का विरोध करते हैं तो उन्हें कहीं एक बार फिर से उत्तराखण्ड राज्य विरोधी घोषित न कर दिया जाए। वह तो भाजपा के साथ ‘राज्य बनने की गंगा’ में अपना हाथ धोना चाहती थी और यही उसने किया। उसने न राज्य पुनर्गठन विधेयक में किये गए 26 संशोधनों का विरोध किया और न ही लोकसभा में रखे गए विधेयक में संशोधन करते हुए हरिद्वार जिले को शामिल किए जाने का।
यही स्थिति क्षेत्रीय राजनीतिक दलों, उत्तराखण्ड क्रान्ति दल और आन्दोलनकारी संगठनों उत्तराखण्ड महिला मंच, उत्तराखण्ड जन संघर्ष वाहिनी, उत्तराखण्ड आंदोलनकारी मंच और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भी रही। हर एक जाने-अनजाने भाजपा के नेतृत्व वाले केंद्र सरकार द्वारा उत्तराखण्ड बनाए जाने पर एक तरह से उसका एहसान मान रहा था। इन सबने राजधानी, हरिद्वार जिले के शामिल किये जाने और 26 संशोधनों पर दबाव बनाने की कोई बड़ी कोशिश नहीं की।
उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के नेता तब कहते थे कि राजधानी कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। एक बार राज्य बन जाएगा तो राजधानी का सवाल भी हल कर लेंगे। सच्चाई यह है कि 1994 के जन उभार के बाद खटीमा, मसूरी, देहरादून, रामपुर तिराहे और कई दूसरे स्थानों पर आन्दोलनकारियों का जो दमन हुआ, उससे उक्रांद और अन्य आन्दोलनकारी संगठनों में निराशा का भाव आ गया था। भाजपा ने आन्दोलनकारी संगठनों और उक्रांद की इस मानसिकता को भाँप कर ही एक लूला-लंगड़ा राज्य यहाँ के लोगों को पकड़ाया ऊपर से राज्य बनाने का एहसान भी जताया।
क्षेत्रीय दलों और संगठनों में राजनीतिक दूरदर्शिता होती तो वे भाजपा के षड़यंत्र को समझ कर एक बगैर राजधानी और सांवैधानिक अधिकारों वाले राज्य को न सिर्फ लेने से इनकार करते, बल्कि इस बात के लिये जम कर लड़ते। मगर भाजपा का षड़यंत्र सफल हुआ, उसने एक नैरेटिव गड़ा और उसके द्वारा राज्य बनाए जाने के उस कथित एहसान के तले यहाँ के लोग आज भी दबे हुए हैं। 1994 के बाद पैदा हुई पीढ़ी तो यही मानती है कि उत्तराखण्ड राज्य भाजपा की देन है।
भाजपा को ‘उत्तराखंड’ नाम से ही वितृष्णा थी। इस नाम में उसे अलगाववाद की बू आती थी। उसके तर्क हैरान करने वाले थे। 1988 में अटल बिहारी बाजपेयी ने देहरादून में एक जनसभा में खुले तौर पर उत्तराखण्ड राज्य की माँग को अस्वीकार करते हुए इसे अलगाववादी आन्दोलन तक कह डाला। उन्होंने कहा कि चीन सीमा से लगे होने के कारण अगर इस तरह के आन्दोलनों को समर्थन दिया गया तो यह देश की सुरक्षा के लिए गम्भीर खतरा होगा। इससे पता चलता है कि भाजपा की उत्तराखंड राज्य को तब सोच क्या थी। यह अलग बात है कि 1991 आते-आते उसे राज्य आंदोलन का समर्थन करने को मजबूर होना पड़ा। राज्य बनाते समय उसने इसे ‘उत्तरांचल’ नाम दे दिया। वही भाजपा राज्य बनने के बाद यहाँ चैथी बार सरकार चला रही है।
उधर कांग्रेस का भी उत्तराखंड की अवधारणा से कोई आन्तरिक जुड़ाव नहीं रहा। कांग्रेस के बड़े नेता पूर्ण राज्य के समर्थन में आने से हिचकिचाते रहे। राज्य गठन से पहले तक वे इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाने तक ही सहमत हो पाये। उससे पहले वे इसे हिल काउंसिल बनाने की मांग करते रहे थे। नारायण दत्त तिवारी ने तो चरम पर पहुँचे राज्य आन्दोलन के दौरान 1994 में यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि उत्तराखण्ड राज्य मेरी लाश पर बनेगा। मगर राज्य बनने पर पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला तो यही तिवारी जी जोड़-तोड़ कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गये।
इन्हीं कारणों से गैरसैंण का उत्तराखण्ड की राजधानी बनाने का सवाल अब तक हल नहीं हो पाया है। प्रदेश की पहली अन्तरिम सरकार के मुख्यमन्त्री, भाजपा के नित्यानंद स्वामी ने एक राजधानी चयन आयोग का गठन कर इस मामले को प्रारम्भ में ही उलझा दिया। उनके कदमों में चलते हुए ही पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने भी इस मामले में कोई गम्भीरता नहीं दिखाई। उल्टे वह अपने बयानों में यह तक कह बैठे कि अब देहरादून में इतना ढाँचागत विकास हो गया है कि राजधानी को अन्यत्र ले जाना राज्य की आर्थिक दशा के लिए ठीक नहीं होगा।
अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में केवल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ही राज्य आन्दोलन का खुल कर समर्थन कर रही थी। पहली बार 1952 में उत्तराखण्ड राज्य बनाने की माँग भाकपा के पीसी जोशी ने ही की थी। परन्तु बाद के दौर में उत्तराखण्ड में जनाधार सिकुड़ जाने के कारण भाकपा राज्य आन्दोलन में अपनी कोई दमदार भूमिका नहीं बना पाई। इसके उलट भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) यानी सी.पी.एम. उत्तराखण्ड आन्दोलन के खिलाफ थी। 1988 में नए-नए बने जनता दल ने अवश्य राज्य आन्दोलन का समर्थन किया।
बात करें क्षेत्रीय दलों और संगठनों की। 24-25 जुलाई 1979 को मसूरी में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का गठन हुआ। अध्यक्ष बने सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी डॉ. डी. डी पंत। इस दल का एकमात्र उद्देश्य उत्तराखण्ड के तत्कालीन 8 जिलों, देहरादून, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, चमोली, पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और नैनीताल जिलों को मिला कर अलग राज्य बनाना और जब तक यह लक्ष्य हासिल न हो, इसके लिये आन्दोलन चलाना था। उत्तराखण्ड राज्य की माँग वर्ष 1952 से उठती रही थी। इसके लिए दिल्ली में भी धरना, प्रदर्शन होते रहे और केंद्र सरकार को ज्ञापन सौंपे जाते रहे। पर इन आन्दोलनों में निरंतरता नहीं थी। 1957 में उत्तराखण्ड राज्य परिषद, 1967 में पर्वतीय राज्य परिषद, 1970 में पी.सी. जोशी के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा, 1974 में बाबा मथुरा प्रसाद बमराड़ा द्वारा उत्तराखण्ड रक्षा मंच का गठन, 1976 में उत्तराखण्ड युवा परिषद और 1979 में केंद्रीय उत्तराखण्ड राज्य परिषद का गठन उत्तराखंड राज्य के लिये होता रहा। 1979 में उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी ने भी ‘नये भारत के लिये नया उत्तराखंड’ का नारा स्वीकार किया। 1987 में 20 दिसम्बर को उत्तराखण्ड जन परिषद और 7-8 सितम्बर 1991 को उत्तराखण्ड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ, जिसके संयोजक सुप्रसिद्ध कथाकार विद्यासागर नौटियाल बनाए गए। बाद में लक्ष्मी प्रसाद नौटियाल पार्टी के अध्यक्ष बने। इस तरह कई संगठन उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर अस्तित्व में आए, परन्तु ये संगठन चुनाव के रास्ते अपनी माँग को आगे बढ़ाने के लिये नहीं बने थे।
इसके अलावा बाद में उक्रांद के संस्थापक सदस्य बने जगदीश कापड़ी ने उत्तराखण्ड पार्टी का गठन किया तो दिल्ली के कमिश्नर रहे बी आर टम्टा ने उत्तराखण्ड विकास मंच, 1995-96 में मंत्री प्रसाद नैथानी और 1997-98 में बसपा से अलग होने के बाद डॉ. हरक सिंह रावत आदि ने भी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का गठन किया। पर ये बहुत अधिक प्रभाव उत्तराखण्ड की राजनीति में नहीं बना पाए और कुछ तो एक-दो साल में ही विलुप्त हो गए।
एक क्षेत्रीय दल के रूप में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। परन्तु भावी उत्तराखंड का स्वरूप क्या होगा, उसके राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक पक्ष क्या और कैसे होंगे, इसेे लेकर उक्रांद के नेतृत्व में कभी स्पष्टता नहीं रही। दल के गठन के कुछ समय बाद उसके पर्चे-पोस्टरों में तत्कालीन 8 जिलों के अलावा सहारनपुर जिले की छुटमलपुर और हरिद्वार तहसील, बिजनौर जिले की नजीबाबाद तहसील, पीलीभीत जिले की पूरनपुर तहसील, बरेली जिले की बहेड़ी तहसील और रामपुर जिले की बिलासपुर तहसील भी दिखाई देने लगे। फिर जब इन मैदानी हिस्सों को लेकर पार्टी के अंदर ही विरोध होने लगा तो इन्हें भावी राज्य से अलग कर दिया गिया। उत्तराखंड तत्कालीन 8 जिलों तक ही सीमित रहा। उसके बाद कुम्भ क्षेत्र से उत्तराखंड के जुड़ाव को लेकर हरिद्वार तहसील को जोड़ा गया। बाद में जब हरिद्वार जिला बना तो पूरे हरिद्वार जिले को ही भावी उत्तराखण्ड में शामिल कर लिया गया। यहाँ तक कि एक प्रसिद्ध जनगीत में हरिद्वार और कनखल को उत्तराखण्ड का आंगन बताया गया। यदि दूरदर्शिता से सोचा जाता तो शायद ऐसी स्थिति नहीं आती। उत्तराखंड का वही कथित आँगन आज जनसंख्या के भारी घनत्व के कारण उत्तराखण्ड के गले की हड्डी बन गया है।
क्षेत्रीय दलों और संगठनों में राज्य आन्दोलन को लेकर कोई एकरूपता नहीं रही। उत्तराखण्ड क्रान्ति दल ने 1992 में जब भावी उत्तराखण्ड की राजधानी को लेकर गैरसैंण को राजधानी बनाने की बात कही और 24 जुलाई को चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर चंद्र नगर नाम से राजधानी का शिलान्यास किया तो अधिकांश संगठनों ने इस की आलोचना की। इसी तरह उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के हिमालयन कार रैली के विरोध में किए गए आन्दोलन को उक्रान्द ने समर्थन नहीं दिया। उक्रान्द द्वारा वर्ष 1996 में ही पहले लोकसभा चुनाव का बहिष्कार और कुछ ही महीने बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ने के निर्णय भी अदूरदर्शी ही था। उ.प्र. विधानसभा के 1996 के चुनाव में उक्रांद को एक भी सीट नहीं मिली। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि इस विधानसभा के आखिरी समय में जब उत्तराखण्ड के भाग्य का निर्णय हो रहा था, तब कोई भी राज्य समर्थक आवाज उत्तर प्रदेश विधान सभा में मौजूद नहीं थी। पृथक राज्य की लड़ाई क्षेत्रीय दलों के हाथ से निकलकर भाजपा जैसी छल-प्रपंच वाली पार्टी के हाथों में चली गई, जिसने एक अधिकारविहीन, बिना राजधानी वाला और हरिद्वार जिले को शामिल कर पहाड़ी राज्य की अवधारणा को खत्म करने वाला राज्य लोगों पर थोप दिया।
इस सब के बाद भी, जब राज्य बने अब 25 साल बीत गये हैं, क्षेत्रीय राजनैतिक दल और संगठन अभी तक एक नहीं हो पाये हैं। जिसका जो बचा-खुचा जनाधार है, उसे भी नष्ट कर रहे हैं।

































