उत्तराखंड के लोगों को बाहर जाने का सिलसिला कोई नया नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की आकांक्षा होती है कि उन्हें सांवैधानिक प्रावधानों के तहत अपने संसाधनों का सही उपयोग कर अपनी जमीन में ही अच्छा जीवन जीने के अवसर प्राप्त हों। इन्हीं आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति पृथक उत्तराखंड राज्य का आधार रही है। राज्य बनने के बाद सरकारों की नाकाम नीतियों का परिणाम है कि भारी संख्या में लोगों ने अपनी रोटी-रोजगार या अन्य कारणों से पलायन किया। यहीं से पहाड़ से बाहर रहने वालों के लिए एक शब्द बहुत तेजी से प्रचलन में आया, जिसे ‘प्रवासी’ कहा जाता है। यह शब्द सत्ता के लिए हमेशा मुफीद रहा। जो लोग पहाड़ में रह रहे हैं वह भी मानने लगे हैं कि पलायन का कारण सरकार या नीतियां नहीं हैं, बल्कि वे लोग हैं जो पहाड़ को छोड़कर चले गए। यह स्थापना अब और बलवती हो गई है। कई बार तो बहुत समझदार लोग भी इस बात को कह देते हैं। सरकारों के लिए यह नरेटिव हमेशा लाभप्रद रहता है। असलियत यह है कि पलायन हमेशा ‘नीति जनित’ होता है, ‘व्यक्ति जनित’ नहीं। अपनी माटी को छोड़ने का दर्द और अपनी चीजों से जुड़े रहने की ज्यादा उत्कंठा प्रवासियों की ही रहती है। वह अपनी भाषा, संस्कृति, समसामयिक सवालों आदि पर हमशा संवदेनशील रहती है और वह प्रवास में रहकर अपनी थाती को हर तरह से याद करने के मौके भी तलाशती है। जब उत्तराखंड में कोई बड़ी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक या आंदोलनों की छटपटाहट होती है तो उसमें शामिल भी रहती है। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी प्रवासियों की महत्वूपर्ण भूमिका रही है।
प्रवास का उत्तराखंड राज्य आंदोलन और राज्य बनने से पहले के संबंधों को समझने के लिए थोड़ा इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है। इसके बिना इसे समझना थोड़ा कठिन हो जाएगा। उत्तराखंड के लोगों का पहाड़ से बाहर आने का सिलसिला नया नहीं है। इसे अगर इतिहास के बहुत छोटे कालखंड में भी देखने की कोशिश करें तो प्रथम विश्वयुद्ध के पहले और बाद में यहाँ से लोगों की बाहर जाने की प्रक्रिया शुरू होती है। वह अंग्रेजी सेना में भर्ती से लेकर अन्य रोजगार की वजहें भी रही हैं। यहां का एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई और रोजगार के लिए भी बाहर जाता रहा था। हमारे पुराने ठिकानों में क्वेटा, लाहौर, रावलपिंडी जैसे शहर रहे हैं। उत्तराखंड के लोगों ने अपनी बसासत म्यांमार और सुदूर दक्षिण के क्षेत्रों तक बनाई। पहाड़ के लोगों की कई पीढ़ियाँ वहाँ रहती आई हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण विश्व के जाने-माने भूगर्भशास्त्री प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया जी हैं, जिनके पुरखे म्यांमार में बसे थे और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अपने क्षेत्र पिथौरागढ़ वापस आए। ऐसे ही बहुत सारे पहाड़ी परिवार हैं, जो देश और देश के बाहर भी सदियों रहते आए हैं। आजादी के आंदोलन के दौर में उत्तराखंड के युवाओं की बड़ी संख्या थी, जो देश के विभिन्न हिस्सों में न केवल पढ़ाई के लिए गए, बल्कि उन्होंने वहीं अपनी सामाजिक और राजनीति हैसियत भी बनाई। वे जब वहाँ से वापस आए तो आजादी के आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका रही। इलाहाबाद, काशी और लखनऊ में बड़ी संख्या में लोग गए और अपने को संगठित करना भी शुरू किया।
जब हम प्रवास में उत्तराखंड राज्य बनने से पहले की चेतना को देखते हैं तो यह साफ है कि प्रवास में रहने वाले लोगों ने वहां रह कर भी सारे काम पहाड़ के लिए किए। प्रवास में पहाड़ की पहली संस्था ‘गढ़वाल हितैषिणी सभा’ की स्थापना 1923 में शिमला में हुई थी, जो बाद में दिल्ली आकर अपनी यात्रा के सौ साल पूरे कर चुकी है। बताया जाता है कि इस संगठन की पृष्ठभूमि क्वेटा (आज के पाकिस्तान) में 1919 में बन गई थी। बाद में दिल्ली में ही 1947 में ‘अल्मोड़ा ग्राम कमेटी’ और 1948 में लखनऊ में ‘कुमाऊँ परिषद’ की स्थापना हुई। आजादी से पहले भी बहुत सारे संगठन ऐसे थे, जिन्होंने प्रवास में उत्तराखंड के सवालों को प्रमुखता से उठाया। श्रीदेव सुमन की ‘गढ़ सेवा संघ’ की स्थापना भी दिल्ली में हुई थी। आजादी के बाद राजधानी दिल्ली और देश के महानगरों के अलावा छोटे-बड़े शहरों में लोगों अपने को पहले अपने गांव और बाद में पट्टियों के नाम से संगठित करना शुरू किया। इनमें ंसे ‘टिहरी-उत्तरकाशी विकास समिति’, ‘सल्ट विकास समिति’ जैसे दर्जनों संगठन अस्तित्व में आए। इन संगठनों ने अपने शुरूआती दौर में कुछ पैसा इकट्ठा कर अपने गाँवों के लिए सामूहिक रूप से बर्तन, दरी, चांदनी आदि सामान खरीदकर भेजे ताकि वह शादी-ब्याह या अन्य सार्वजनिक उत्सवों के काम आ सके। गांवों में होने वाली रामलीला और मेले-ठेलों के लिए भी ये संगठन आर्थिक संसाधन जुटाते थे। पहले गढ़वाल और कुमाऊं की रामलीलाएं होती थीं। यह सभी लोगों की एकता बड़ा आधार बनी। प्रवास में होने वाली रामलीलाओं ने भी लोगों में एकजुटता और अपने क्षेत्र के लिए कुछ बड़ा करने की समझ पैदा की। इसे मानिला की दिल्ली में होने वाली रामलीला से समझा जा सकता है। मानिला के लोगों ने दिल्ली में 1948 में ‘हाईस्कूल बनाओ संघर्ष समिति’ का गठन किया। इसके लिए उन्होंने एक रामलीला की शुरूआत की और उसमें मिलने वाले चंदे को स्कूल के निर्माण में लगाया। बहुत बाद में इसे ही उन्होंने ‘डिग्री कालेज बनाओ संघर्ष समिति’ में परिवर्तित कर दिया। जब मानिला में डिग्री काॅलेज बनाने का आंदोलन चला तो इसमें इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। ‘अल्मोड़ा ग्राम कमेटी’ की शुरूआत ही रामलीला कमेटी के रूप में हुई। इस तरह प्रवास में लोगों ने अपने-अपने संगठन बनाकर पहाड़ की हर छटपटाहट में अपने को शामिल किया।
पहाड़ के जो लोग प्रवास में महानगरों में रह रहे थे उनकी आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बहुत अच्छी नहीं थी। बहुत छोटी-छोटी नौकरियों में लोग थे। समय के साथ प्रवास में लोगों का रहन-सहन बदला। अच्छी पढ़ाई और सम्मानजनक रोजगार मिलने से उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में भी बदलावा आया। सत्तर का दशक आते-आते राजधानी दिल्ली से लेकर अन्य महानगरों में प्रवासियों की न केवल संख्या बढ़ी, बल्कि वह राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से संगठित होने लगे। दिल्ली और लखनऊ में तो इनके साथ आजादी के बाद ही गोविन्दबल्लभ पंत, भक्तदर्शन, हेमवतीनंदन बहुगुणा, केसी पंत, नारायण दत्त तिवारी, ब्रह्मदत्त आदि की राजनीतिक छत्रछाया भी रही, जो बाद में भी अलग-अलग नेताओं के सहयोग से बढ़ती गई। हालांकि आजादी के बाद से ही बहुत सारी राजनीतिक घटनाएं ऐसी थीं, जिन्होंने प्रवासियों को उत्तराखंड के तमाम सवालों से राजनीतिक रूप से जोड़ लिया था। इसकी सबसे बड़ी वजह प्रवास में आकर बहुत सारे लोगों ने आजादी से पहले उसके आसपास या बाद में राजनीति में अच्छा हस्तक्षेप कर लिया था। इलाहाबाद में हेमवतीनंदन बहुगुणा, नारायणदत्त तिवारी, मदनमोहन उपाध्याय छात्र संघों में रहे तो बनारस में भी विद्यासागर नौटियाल जैसे प्रगतिशील छात्र बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष रहे। मुरली मनोहर जोशी भी राजनीति में सक्रिय हुए। हेमवतीनंदन बहुगुणा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा मुकाम बनाया और बाद में राष्ट्रीय राजनीति में। फिर एक युग नारायणदत्त तिवारी जी का रहा। इस प्रकार एक ठोस राजनीतिक जमीन प्रवास में लोगों को आगे बढ़ने की मिल रही थी।
अगर हम इसे उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना के साथ प्रवासियों की चेतना के साथ जोड़कर देखते हैं तो इतिहास का एक बड़ा कालखंड है, जिसमें राज्य के लिए प्रवासियों की बड़ी भूमिका रही है। इसे हम 1936-37 में भी देख सकते हैं, जब श्रीदेव सुमन की संस्था ‘गढ़सेवा संघ’ ने राज्य की बात को दिल्ली में उठाया, जिसने बाद में 1938 में कांग्रेस के श्रीनगर सम्मेलन में इसे विस्तार दिया, जिसमें जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष विजयलक्ष्मी पंडित भी शामिल थे। उत्तराखंड राज्य के लिए 1952 में कामरेड पीसी जोशी ने जो पहल की उसका प्रवास मे रहने वाले लोगों पर गहरा असर रहा। सत्तर के दशक में जब उत्तराखंड में वन आंदोलन और उत्तराखंड राज्य की छटपटाहट शुरू होने लगी, तब तक प्रवास में लोगों ने अपने को हर क्षेत्र में बहुत समृद्ध कर लिया था। अगर इसे थोड़ा और पीछे से देखने की कोशिश करें तो दिल्ली में सक्रिय ऋषिबल्लभ सुंदरियाल ने हिमालय, विशेषकर उत्तराखंड को लेकर एक बड़ा सेमिनार 1963 में किया था। इसे ‘हिमालय बचाओ आंदोलन’ के तहत किया गया था। इस सेमिनार में राममनोहर लोहिया, बलराज मधोक, अटलबिहारी वाजपेयी के अलावा दलाई लामा भी शामिल हुए थे। इसकी अध्यक्षता ‘कर्मभूमि’ के संपादक भैरवदत्त धूलिया ने की थी। इस सम्मेलन में पहली बार ऋषिबल्लभ सुंदरियाल जी ने एक नारा दिया था- ‘हिमालय बसाओ।’ इस नारे का मतलब था कि जब हिमालय के सीमावर्ती गांव बचे रहेंगे तभी हिमालय भी बचा रहेगा। यह विचार एक तरह से उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना का ही एक भाव था।
प्रवास में उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना का असर हमेशा रहा। प्रवासियों ने हर आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। साठ-सत्तर के दशक के प्रारंभिक आंदोलनों की शुरुआत भी प्रवास से ही हुई। 1967 में रामनगर में जब ‘उत्तराखंड राज्य परिषद’ की स्थापना हुई तो उसके बाद उत्तराखंड राज्य आंदोलन को पहली बार सड़क पर लाने का श्रेय भी प्रवासियों को ही जाता है। उत्तराखंड राज्य की मांग के लिए सबसे पहले ऋषिबल्लभ सुंदरियाल के नेतृत्व में 1968 में दिल्ली के बोट क्लब पर रैली हुई थी। इसके बाद 1972 में भी एक बड़ी रैली दिल्ली में आयोजित की गई जिसमें ऋषिबल्लभ सुंदरियाल के अलावा त्रेपन सिंह नेगी आदि शामिल रहे। इसमें पहली बार राज्य आंदोलन के लिए गिरफ्तारियां हुई। इसके बाद एक बड़ी रैली 1978 में भी त्रेपन सिंह नेगी के नेतृत्व में हुई। उसके बाद 1973 में ‘उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी’ और 1979 में ‘उत्तराखंड क्रांति दल’ की स्थापना के बाद उत्तराखंड के तमाम सवालों और विशेषकर राज्य आंदोलन को लेकर प्रवासियों में नई तरह की चेतना का विकास हुआ। राजधानी दिल्ली के अलावा मुबंई, चंडीगढ़, लखनऊ, जयपुर जैसे शहर थे, जहां उत्तराखंड राज्य की बात को लोगों ने संगठनात्मक तरीके से कहना शुरू किया। जब ‘उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी’ ने उत्तराखंड में नशा नहीं रोजगार दो, हिमालय कार रैली का बहिष्कार, भ्रष्टाचार के खिलाफ कनकटे बैल को दिल्ली लाने जैसे आयेाजन किए तो प्रवास में रहने वाले युवाओं ने इनमें सक्रिय भागीदारी निभाई।
उत्तराखंड राज्य को लेकर जब ‘उत्तराखंड क्रांति दल’ अपने संगठनात्मक स्वरूप को आगे बढ़ाने लगा तो उसने दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ और जयपुर में अपनी इकाइयां भी गठित की। प्रवास में रहने वाले लोगों के बल पर ही 23 नवंबर, 1987 को दिल्ली के बोट क्लब में बड़ी रैली करने में भी सफल रहे। उस दौर में प्रवास के तमाम संगठन और नागरिक एक तरह से उत्तराखंड के हर सवाल के साथ न केवल अपनी सहमति रखते थे, बल्कि उन्होंने सक्रिय रूप से इनमें भाग भी लिया। इस दौर तक आते-आते प्रवास में विश्वविद्यालयों और पत्रकारिता के क्षेत्र में पहाड़ के लोगों की अच्छी-खासी भागीदारी हो गई थी। पहाड़ में होने वाली हर हलचल का असर यहां पड़ता था। दिल्ली तो पहाड़ से फिर भी नजदीक था, लेकिन अस्सी के दशक में इस चेतना का विस्तार और शहरों तक भी हुआ। उत्तराखंड राज्य के लिए तो ‘उत्तराखंड पत्रकार परिषद’ जैसे संगठनों ने जन चेतना के लिए कई सेमिनार, गोष्ठियों और संवाद कार्यक्रम रखे। मुंबई में उन दिनों अर्जुन सिंह गुसाई जैसे लोग थे, जिन्होंने वहां से ‘हिलांस’ नाम से पत्रिका का प्रकाशन किया। एक तरह से वह उस दौर में प्रवासियों का मुखपत्र था। प्रवास में जितने भी संगठनों ने अपने सांस्कृतिक आयोजन किए या अपने संगठनों की स्मारिकाएं निकाली उनमें उत्तराखंड के सवालों को प्रमुखता से रखा।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के निर्णायक दौर में 1994 में जितना योगदान उत्तराखंड के लोगों का है, उससे कम प्रवास में रहने वाले लोगों नहीं है। दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, जयपुर में तो पहले भी इस तरह की चेतना थी। बाद में इसका विस्तार छोटे शहरों तक भी हुआ। राज्य आंदोलन के दौरान बरेली, मुरादाबाद, जालंधर, अमृतसर, इलाहाबाद, बनारस आदि शहरों में भी लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। धरना-प्रदर्शन किए। जेल भी गए। दिल्ली तो एक तरह से दूसरा उत्तराखंड बन गया था। यहां लोगों ने सरकारी नौकरियों की परवाह नहीं की। बड़ी संख्या में विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक और छात्र, सरकारी कर्मचारी, रंगकर्मी, साहित्यकार, कलाकारों के अलावा महिलाओं ने इस पूरे आंदोलन में शिरकत की। देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में पहाड़ के बहुत सारे पत्रकार अच्छी स्थिति में थे, उन्होंने अपने पत्रों के माध्यम से इस आंदोलन को बहुत गति प्रदान की। उस समय दिल्ली से ही लगभग एक दर्जन पत्र-पत्रिकाएं लोगों ने निकाली, जो उत्तराखंड राज्य आंदोलन से प्रेरित थीं। दिल्ली में दर्जनों संगठनों ने मिलकर जंतर मंतर पर लंबे समय तक इस लड़ाई को लड़ा और बड़ी संख्या में गिरफ्तार भी हुए। आंदोलन के दौरान जब 2 अक्टूबर, 1994 को दिल्ली कूच हुआ तो उसमें लाखों लोग इकट्ठा हुए। इस प्रदर्शन में आए लोगों के लिए दिल्ली के घर-घर में खाना बना। प्रवास में रह रहे पहाड़ के लोगों ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन और उसके बाद उत्तराखंड की बेहतरी की हर पहल में बहुत गहरी और केंद्रीय भूमिका निभाई है। आज भी उत्तराखंड के समासामयिक सवालों के साथ प्रवासी हमेशा न केवल खड़े रहते हैं, बल्कि संघर्ष करने वाले लोगों की मदद भी करते हैं।

































