पहाड़ों की अपनी कोई भाषा नहीं होती, लेकिन वे उन लोगों की कहानियां जरूर याद रखते हैं, जो उनकी चोटियों तक पहुंचने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा देते हैं। निर्मल ‘निम्सदाई’ पुर्जा भी उन्हीं लोगों में से एक थे। दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को अपनी जिद, साहस और अदम्य इच्छाशक्ति से चुनौती देने वाला यह पर्वतारोही अब हमारे बीच नहीं है। 30 जुलाई 2026 को पाकिस्तान के ब्रॉड पीक पर आए विनाशकारी हिमस्खलन ने 43 वर्षीय पुर्जा समेत अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण अभियान के सभी 10 सदस्यों की जान ले ली। खराब मौसम और बेहद कठिन परिस्थितियों के बीच बचाव दल ने बाद में पुर्जा और अन्य पर्वतारोहियों के शव बरामद किए।पर्वतों ने उनकी आखिरी सांस अपने पास रख ली, लेकिन उनकी कहानी को अपने भीतर हमेशा के लिए दर्ज कर लिया। यह कहानी केवल एक पर्वतारोही के शिखर तक पहुंचने की नहीं है। यह उस युवक की कहानी है जिसने नेपाल के एक छोटे से गांव से निकलकर गुरखा सैनिक बनने का सपना देखा, ब्रिटिश सेना की विशेष बल इकाई तक पहुंचा, फिर एक दिन सुरक्षित सैन्य जीवन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे खतरनाक चोटियों को अपना जीवन बना लिया। और देखते ही देखते उसने पर्वतारोहण की दुनिया में ऐसे अध्याय लिख दिए, जिन्हें कभी असंभव समझा जाता था।
25 जुलाई 1983 को नेपाल के म्याग्दी जिले में जन्मे निर्मल पुर्जा का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। परिवार की जड़ें सैन्य जीवन से जुड़ी थीं। उनके पिता गुरखा सैनिक थे और भाइयों ने भी ब्रिटिश गुरखा सेना का रास्ता चुना। शायद यही वजह थी कि बचपन से ही पुर्जा के भीतर अनुशासन और कठिन परिस्थितियों से जूझने का संस्कार गहराता चला गया।
2003 में उन्होंने गुरखा ब्रिगेड में प्रवेश किया। इसके बाद उनका सैन्य सफर उन्हें ब्रिटिश सेना की प्रतिष्ठित विशेष बल इकाई ‘स्पेशल बोट सर्विस’ तक ले गया। वे इस इकाई में पहुंचने वाले पहले गुरखा सैनिक बने। सैन्य जीवन ने उन्हें सिर्फ हथियार चलाना या कठिन परिस्थितियों में टिके रहना नहीं सिखाया, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में शांत रहना, सही निर्णय लेना और अपने लक्ष्य से नजर न हटाना भी सिखाया।
2018 में उन्होंने सैन्य सेवा छोड़ दी। यह निर्णय आसान नहीं था। एक स्थिर और सम्मानजनक करियर को छोड़कर पर्वतारोहण जैसे अनिश्चित और जोखिम भरे जीवन को चुनना अपने आप में एक बड़ा साहस था। मगर पुर्जा शायद उन लोगों में थे जिनके लिए सुरक्षित रास्ते से ज्यादा जरूरी वह रास्ता होता है, जो उन्हें अपने सपने तक ले जाए।
फिर उन्होंने एक ऐसा सपना देखा, जिसे सुनकर दुनिया के बड़े-बड़े पर्वतारोही भी चौंक गए। दुनिया के सभी 14 ऐसे पर्वतों को फतह करना, जिनकी ऊंचाई 8,000 मीटर से अधिक है—और वह भी सात महीने से कम समय में। यह सिर्फ एक लक्ष्य नहीं था। यह मानवीय क्षमता की सीमा को चुनौती देने जैसा था। उन्होंने इस अभियान को नाम दिया— ‘प्रोजेक्ट पॉसिबल’।
अप्रैल 2019 में अन्नपूर्णा से शुरू हुआ सफर अक्टूबर में शिशापांगमा पर जाकर पूरा हुआ। केवल 189 दिन—छह महीने और छह दिन। चौदह चोटियां। चौदह बार मौत की ऊंचाई के करीब पहुंचना। और हर बार वापस लौटकर अगली चोटी की ओर बढ़ जाना।
पुर्जा ने वह कर दिखाया, जिसे पूरा करने में इससे पहले पर्वतारोहियों को वर्षों लगते थे। उनका रिकॉर्ड बाद में 2023 में क्रिस्टिन हरिला और तेनजेन शेरपा ने 92 दिनों में 14 चोटियां फतह करके तोड़ दिया, लेकिन पुर्जा का 2019 का अभियान पर्वतारोहण के इतिहास में आज भी एक असाधारण उपलब्धि के रूप में दर्ज है। क्योंकि उन्होंने सिर्फ पहाड़ों की ऊंचाई को नहीं चुनौती दी थी, उन्होंने समय की गति को भी चुनौती दी थी।
लेकिन पुर्जा की कहानी केवल रिकॉर्डों की कहानी नहीं थी। ऊंचाई पर जब हवा कम पड़ती है और शरीर हर कदम के लिए संघर्ष करने लगता है, तब इंसान का असली चरित्र सामने आता है। ऐसे ही क्षणों में पुर्जा ने कई बार दूसरे पर्वतारोहियों की मदद के लिए अपना अभियान रोका। उनके लिए शिखर तक पहुंचना महत्वपूर्ण था, लेकिन किसी जिंदगी को बचाकर लौटना उससे बड़ा।
यही वजह थी कि पर्वतारोहण की दुनिया में उनका सम्मान केवल एक रिकॉर्डधारी के रूप में नहीं था। उन्हें ऐसे पर्वतारोही के रूप में भी याद किया गया, जो जरूरत पड़ने पर दूसरों के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालने से पीछे नहीं हटते थे।
फिर आया K2। दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची चोटी। एक ऐसा पर्वत, जिसे गर्मियों में भी पर्वतारोहण की सबसे कठिन चुनौतियों में गिना जाता है। सर्दियों में K2 पर चढ़ना लंबे समय तक लगभग असंभव माना जाता रहा था। 16 जनवरी 2021 को यह असंभव भी टूट गया।
निर्मल पुर्जा और नौ अन्य नेपाली पर्वतारोहियों की टीम ने पहली बार सर्दियों में K2 के शिखर पर पहुंचकर इतिहास रच दिया। शिखर पर पहुंचते हुए नेपाली पर्वतारोहियों की वह सामूहिक तस्वीर केवल एक पर्वतारोहण उपलब्धि नहीं थी; वह हिमालय के उन लोगों की भी जीत थी, जिनकी पीढ़ियां इन पहाड़ों के साथ जीती और मरती रही हैं।
पुर्जा ने इस आरोहण में अतिरिक्त ऑक्सीजन का इस्तेमाल नहीं किया। उनके लिए यह केवल एक और शिखर नहीं था, बल्कि यह प्रमाण था कि इच्छाशक्ति, प्रशिक्षण और टीम भावना मिल जाए तो इंसान अपनी कल्पना से कहीं आगे जा सकता है।
उनकी कहानी अब पहाड़ों से निकलकर दुनिया के घरों तक पहुंच चुकी थी। 2021 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई डॉक्यूमेंट्री ‘14 Peaks: Nothing Is Impossible’ ने पुर्जा की यात्रा को वैश्विक दर्शकों के सामने ला दिया। आर्थिक कठिनाइयों, पारिवारिक चिंताओं, शारीरिक थकान और लगातार मंडराते खतरे के बीच आगे बढ़ते एक पर्वतारोही की कहानी ने लाखों लोगों को प्रभावित किया।
लेकिन पुर्जा की लोकप्रियता का एक और अर्थ था। उन्होंने दुनिया के सामने नेपाली पर्वतारोहियों की भूमिका की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हिमालय की चोटियों पर लंबे समय से नेपाली और शेर्पा पर्वतारोहियों का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कहानियों में अक्सर उनका नाम पीछे छूट जाता था। पुर्जा ने उस खामोशी को तोड़ा।
उन्होंने कहा नहीं, करके दिखाया कि हिमालय के बेटे सिर्फ दूसरों को शिखर तक पहुंचाने वाले नहीं हैं। वे स्वयं शिखर पर खड़े हो सकते हैं। अभियान का नेतृत्व कर सकते हैं। रिकॉर्ड बना सकते हैं। और दुनिया को अपनी कहानी सुनाने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
पर्वतों से उन्हें जितना मिला, शायद उतना ही लौटाने की कोशिश भी उन्होंने की। हिमालय में बढ़ते कचरे और पर्यावरणीय संकट को लेकर उन्होंने जागरूकता अभियानों का समर्थन किया। उनका संदेश साफ था—जिन पहाड़ों से इंसान प्रेरणा लेता है, उनकी रक्षा करना भी उसकी जिम्मेदारी है।
2026 में भी उनका रिश्ता पहाड़ों से टूटा नहीं। जुलाई में उन्होंने गैशरब्रुम-2 की चढ़ाई पूरी की। इसके बाद उनकी निगाह ब्रॉड पीक पर थी। शायद उन्हें भी नहीं मालूम था कि यह उनकी आखिरी चढ़ाई होगी। 30 जुलाई को ब्रॉड पीक की लगभग 6,579 मीटर की ऊंचाई के आसपास हिमस्खलन आया। कुछ ही पलों में बर्फ का एक विशाल प्रवाह उस अभियान को अपने भीतर समेट ले गया, जिसने दुनिया की कुछ सबसे ऊंची चोटियों को चुनौती दी थी। पुर्जा समेत अभियान के सभी 10 सदस्यों की मौत हो गई।
कभी-कभी पहाड़ अपने सबसे बड़े प्रेमियों को भी अपने पास रोक लेते हैं। पुर्जा की जिंदगी भी आखिरकार उसी बर्फ में थम गई, जिसके बीच उन्होंने अपना सबसे बड़ा जीवन-सपना देखा था। लेकिन क्या सचमुच उनकी कहानी खत्म हो गई? शायद नहीं। क्योंकि कुछ लोग अपनी जिंदगी से आगे निकल जाते हैं। उनके जाने के बाद भी उनके विचार, उनके साहस और उनके बनाए रास्ते दूसरों को आगे बढ़ाते रहते हैं।
निर्मल पुर्जा ने दुनिया को सिर्फ 14 चोटियों की कहानी नहीं दी। उन्होंने एक सोच दी—कि इंसान की सीमाएं उतनी निश्चित नहीं हैं, जितना हम उन्हें मान लेते हैं। उन्होंने दिखाया कि नेपाल के एक साधारण परिवार का युवक गुरखा सैनिक बन सकता है, ब्रिटिश विशेष बलों तक पहुंच सकता है, सैन्य जीवन को छोड़कर पर्वतों को अपना जीवन बना सकता है और फिर दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर अपना नाम लिख सकता है। उन्होंने यह भी दिखाया कि शिखर सिर्फ पहाड़ों पर नहीं होते। कुछ शिखर हमारे भीतर होते हैं—डर के, संदेह के और असंभव लगने वाली परिस्थितियों के। उन्हें पार करना ही शायद सबसे बड़ी चढ़ाई है।
आज ब्रॉड पीक की बर्फ में निर्मल पुर्जा की आखिरी यात्रा थम गई है। लेकिन एवरेस्ट, K2, अन्नपूर्णा, धौलागिरी और हिमालय की दूसरी चोटियां उनकी कहानी को आने वाली पीढ़ियों तक सुनाती रहेंगी। एक ऐसे आदमी की कहानी, जिसने पहाड़ों को जीतने का दावा नहीं किया—बल्कि हर बार उनके सामने खड़े होकर खुद को आजमाया। शायद इसी वजह से उनका जाना एक पर्वतारोही का जाना भर नहीं है।
यह उस जिद के चले जाने जैसा है, जो कहती थी— असंभव कोई दीवार नहीं, सिर्फ एक चुनौती है।
(इस लेख के लिए AI से सहायता ली गई है।)































