रमदा
“साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय
सार सार को गहि रहे थोथा देई उड़ाय”
कक्षा चार-पांच से लेकर हिन्दी साहित्य में मास्टर्स करने तक कबीर निरंतर पाठ्यक्रम में हैं और उसी हिसाब से उनकी व्याख्या का रिवाज़ भी, “नई शिक्षा नीति” के बावजूद, चलन में है.
मुझे आजकल उक्त दोहा भ्रमित सा कर रहा है क्योंकि मुझे साफ़-साफ़ पता नहीं लग पा रहा है कि आज के समय में साधु, सूप, सार और थोथा का क्या अर्थ लिया जाना चाहिए. कबीर का समय तो यह है नहीं और बदलते समय के साथ शब्दों के आशय भी बदलते ही हैं. उस्ताद और गुरु को ही ले लीजिये, आजकल इनका इस्तेमाल अलग ही सन्दर्भों-अर्थों में होता है ना.
प्रश्न है कि यहाँ साधु कौन है, उसका वह सूप कैसा है जिससे वह सार और थोथा को अलग करता है और उसका सार और थोथा क्या बाकी सबके लिए भी वही साबित होगा ?
सवाल यह भी है कि साधु का एजेंडा क्या है? सूप के इस्तेमाल से वह हासिल क्या करना चाहता है? और उपयोगानुसार उसके लिए क्या सार क्या थोथा ?
अब “महामानव” को ही ले लीजिये जंतर-मंतर में चले प्रदर्शनों पर चले उनके सूप में से निकला सार यह रहा कि बच्चों को भद्दी-भद्दी गालियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था, ऐसे में बाकी सब अपने आप थोथे की श्रेणी में आ गया. किस चतुराई से शिक्षा-व्यवस्था में सुधार की मांग को थोथा और गालियाँ को सार साबित करते हुए एक नया ‘नेरेटिव’ बनाया जा रहा है.
अब अगर यही एक बात – गालियाँ- उन्हें ‘कल्चरल-शाॅक’ लगती हैं तो एक और ‘विधेयक की गुंजाइश है. गाली निरोधक विधेयक और एक और फास्ट-ट्रैक कोर्ट.
यह विधेयक उन सब पर लागू होना चाहिए जहां से हमारी बच्चियां यह सब सीख रहीं हैं. ओ टी टी प्लेटफार्म, स्टैंड-अप कॉमेडी, वह आई टी सैल जिसका सर्वेसर्वा राज्यसभा में बैठता है, समाज और हमारे माननीय नेतागण सभी इसकी परिधि में होंगे. कैलाश जी का “घंटा” और आपके छुटभैय्यौं का शाश्वत उद्घोष “गोली मारो सालों को” (जिसमें गाली के साथ गोली भी है) गालियाँ ही तो हैं. आज जिन्होंने आपको गाली दी उन्हें आपने क्षमा कर दिया तो जो आपको कल गाली देंगे उनका क्या?
ऐसा तो लगता नहीं कि आपकी कार्यशैली और अहंकार में कोई बदलाव आने वाला है या परिस्थितियां इस तरह बदलेंगी कि आम आदमी अपने आपको हर दिशा से तकलीफों से घेर लिया गया महसूस नहीं करेगा. नाउम्मीदी के हालात में गालियाँ ही निकलती हैं साहब और ऐसा लगता नहीं कि इस नाउम्मीदी के लिए आप कुछ कर सकेंगे.
आन्दोलन के शुरुआती चरणों में तो गालियाँ नहीं थीं, प्रदर्शनकारियों का आचरण मर्यादित था. यदि शासन-प्रशासन का व्यवहार भी मर्यादित रहता, वह संवाद के लिए तत्परता का प्रदर्शन मात्र भी यदि करता तो उस हताशा-निराशा से बचा जा सकता था जो लगातार प्रदर्शनकारियों के बीच बढ़ती रही. मर्यादा-पुरुषोत्तम के ठेकेदारों के मर्यादा-विहीन आचरण ने ही उस आक्रोश-अपमान-हताशा-असहायता-तनाव-डर और बलात दबाये जा रहे भावों को ऐसा आधार दिया कि गाली-गलौज की अमर्यादा का जन्म हुआ.
अंत, धर्मवीर भारती के अंधायुग से…
“ टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा / उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है/ पांडव ने कुछ कम,कौरव ने कुछ ज्यादा/ यह रक्तपात अब कब समाप्त होना है / ###### /अंधों से शोभित था युग का सिंहासन/ दोनों ही पक्षों में जीता अंधापन #### ”































