तरुण जोशी
उत्तराखंड की 25 वर्षों की विकास यात्रा पर यदि केवल आँकड़ों की नजर से देखें, तो उत्तराखंड पीछे नहीं दिखता। सड़कें बनीं, शहर फैले, बजट बढ़ा और रिपोर्टों में ‘विकास’ की चमक दिखाई दी। लेकिन इन आँकड़ों की चकाचौंध के पीछे की कड़वी सच्चाई उस गाँव में दिखती है, जहाँ स्कूल हैं पर शिक्षक नहीं, अस्पताल है पर डॉक्टर नहीं, सड़क है, पर सुरक्षा नहीं। वही सच्चाई उस युवा की आँखों में झलकती है, जो हर साल परीक्षा की तैयारी करता है, पर कभी पेपर लीक हो जाता है, तो कभी भर्तियाँ रद्द हो जाती हैं।
आज उत्तराखंड का हर जागरूक नागरिक सोचने पर मजबूर है कि क्या यही वह उत्तराखंड है, जिसका सपना हमने देखा था ?
अर्थव्यवस्था और पर्यटन
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, सेवा क्षेत्र और पर्यटन पर आधारित है। 2001 में राज्य की जीडीपी मात्र 24,786 करोड़ रुपये थी, जो 2023-24 में बढ़कर लगभग 3.20 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गई। प्रति व्यक्ति आय में भी भारी इजाफा हुआ है और यह देश के औसत से अधिक है। हालाँकि कृषि का हिस्सा लगातार घट रहा है, वहीं पर्यटन का महत्व बढ़ा है। हर साल लगभग 4.5 करोड़ पर्यटक आते हैं, जिनमें चारधाम यात्रा का सबसे बड़ा हिस्सा है। लेकिन हाल के वर्षों में अनियंत्रित पर्यटन ने पारिस्थितिकी पर नकारात्मक असर डाला है। अंधाधुंध सड़क निर्माण, बिना नियोजन के ढाँचागत विकास और हेलिकॉप्टर दुर्घटनाएँ इसी समस्या की ओर इशारा करती हैं।
भूमि कानून विवाद
राज्य बनने के बाद भूमि कानून सबसे विवादित मुद्दा रहा। 2003 में बाहरी लोगों को सीमित सीमा तक जमीन खरीदने की अनुमति दी गई। 2018 में यह सीमा बढ़ाकर 1,500 वर्ग मीटर कर दी गई। 2025 में एक और संशोधन कर उद्योगों, होटलों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए जमीन खरीद और आसान बना दी गई। इससे बाहरी पूँजी के लिए रास्ते और खुल गए।
राज्य की 53 लाख हेक्टेयर भूमि में से केवल 7 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य है और 2001 से 2020 के बीच लगभग 59,000 हेक्टेयर खेती की जमीन कम हो चुकी है।
वनों से जुड़ी समस्या
ब्रिटिश शासनकाल से ही वनों पर स्थानीय समुदायों के अधिकार छीने गए। राज्य बनने के समय 63 प्रतिशत क्षेत्र वनभूमि के अंतर्गत था, जो अब 72 प्रतिशत हो गया है। यह बढ़ोतरी वास्तविक हरियाली की बजाय कानूनी रिकॉर्ड का परिणाम है।
2000 से अब तक लगभग 10,000 हेक्टेयर वनभूमि बाँध, सड़क और सेना जैसी परियोजनाओं के लिए दी जा चुकी है। वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय, जैसे बनगाँव और गोठ-खत्ते, अब भी अपने ही घर में “अतिक्रमणकारी” कहे जाते हैं। वन अधिकार अधिनियम 2006 उत्तराखंड में लगभग निष्प्रभावी रहा। 2022 तक केवल 185 दावे ही मान्य हुए और किसी को भी एक इंच जमीन नहीं मिली।
इसी तरह 1931 से अस्तित्व में आई वन पंचायतों (12,000 से अधिक) की स्वायत्तता भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है और उन पर वन विभाग का नियंत्रण बढ़ रहा है।
पलायन और भूतिया गाँव
राज्य निर्माण के बाद से पलायन सबसे गंभीर समस्या रही है। 2018-22 के बीच लगभग 3.3 लाख लोग राज्य से बाहर चले गए, जिनमें अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों से थे। पलायन का परिणाम है भूतिया गाँव। 2022 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 1,726 गाँव आंशिक या पूर्ण रूप से वीरान हो चुके थे। कुछ स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार यह संख्या 2,000 से भी अधिक है। कुछ युवाओं ने लौटकर जैविक खेती, जड़ी-बूटी उत्पादन और इको-टूरिज्म जैसे प्रयास किए हैं, लेकिन सरकारी मदद के अभाव में ये लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो पा रहे।
प्राकृतिक आपदाएँ
उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ आपदाओं के लिए भी जाना जाता है। उत्तरकाशी का भूकंप, मालपा का भूस्खलन, केदारनाथ की आपदा और रेणी की त्रासदी आज भी याद हैं। राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण के अनुसार लगभग 395 गाँव भूस्खलन की सीधी जद में हैं। हर मानसून में सड़कें टूटना, पुल बहना और गाँव उजड़ना सामान्य हो गया है। जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध निर्माण ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। साथ ही जंगल की आग भी हर साल चिंता का विषय बनती है। 2022-23 में 1,141 घटनाएँ दर्ज हुईं, जिनसे 1,250 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ।
आँकड़ों में उत्तराखंड ने पिछले 25 सालों में जरूर प्रगति की है। बजट बढ़ा, सड़कें बनीं और पर्यटन फला-फूला। लेकिन इसी दौरान गाँव खाली हुए, कृषि और स्थानीय समुदायों पर संकट गहराया और आपदाओं का खतरा बढ़ता गया। यदि उत्तराखंड को सच में आंदोलनकारियों के सपनों का राज्य बनाना है तो केवल आँकड़ों की चमक नहीं, बल्कि पर्यावरण-संवेदनशील विकास, पलायन रोकने के लिए रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य की मजबूती और स्थानीय समुदायों को संसाधनों पर अधिकार देना होगा।
फोटो इंटरनेट से साभार

































