शेखर पाठक
(नैनीताल समाचार — 1 जनवरी 1978 में प्रकाशित लेख का अंश)
उत्तराखंड में (और विशेष रूप से टिहरी रियासत में) राष्ट्रीय चेतना को जन सामान्य तक पहुंचाने और स्वयं आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से हिस्सेदारी करने में जिन व्यक्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है उनमें श्री देव सुमन (25 मई 1915-25 जुलाई 1944 ) प्रमुख हैं. वे उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानियों में एक मात्र और पूरे देश के गिने चुने ऐसे सेनानियों में से एक थे, जिन्होंने ऐतिहासिक अनशनों के बाद प्राण त्यागे, अपनी जिंदगी के तीन दशक भी पूरे न जी पाने वाले सुमन की शहादत आजादी की लड़ाई की एक स्मरणीय घटना मानी जाती है. उनकी शहादत की तुलना आयरलैण्ड के वीर मैक्सविनी, वर्मा के साधु विनयफुंगी और बंगाल के क्रांतिकारी यतीन्द्रनाथ दास की शहदात से की जाती है। इस बात की जानकारी अधिकांश लोग रखते हैं कि सुमन का देहान्त टिहरी जेल में 84 दिन की भूख हड़ताल के बाद हुआ था।
शुद्ध आंदोलनकारी और राजनीति का व्यक्तित्व होने पर भी कविता से लगाव और स्मरणीय ऐतिहासिक शहादत उन्हें सुमन बनाती है। उनका एक कविता संग्रह ‘सुमन सौरभ ‘ नाम से 1937 में छपा था।
सुमन जेल की दीवारों पर भी कोयले से कविताएं लिखते थे। यह कविता भी उन्होंने जेल में जुल्म सहते हुए लिखी थी।
तुम तोड़ सकते हो मुझे,
पर तुम मुझे झुका नहीं सकते!
तुम बांध सकते हो मेरे शरीर को,
पर मेरी आत्मा को तुम बंदी नहीं बना सकते!
तुम दबा सकते हो मेरी आवाज को,
पर मेरे विचारों को तुम मिटा नहीं सकते!
तुम ले सकते हो मेरे प्राणों की आहुति,
पर मेरी क्रांति की ज्वाला को तुम बुझा नहीं सकते!































