सोशल मीडिया से साभार
इस शहर में हर शख्स, परेशान सा क्यूं है- 1978 में आई फ़िल्म गमन का यह गीत सुरेश वाडकर की आवाज में था।
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पचास साल बाद यह गीत दिल्ली के हर शख्स की हकीकत बन चुका है। पॉल्यूशन, स्मोग, और एयर क्वालिटी इंडेक्स ऐसा, जो हिटलर के गैस चेम्बर्स की हवा से कुछ ही बेहतर है।
उधर मुंबई हर बरस पानी में डूबती है। जो पानी आराम से, सीवर में बह जाना चाहिए, राह न पाकर लोगो की कमर, और गर्दन तक चढ़ आता है।
बंगलौर ट्रैफिक कन्जेशन से जूझ रहा है। हालात ये है कि ट्रैफिक की समस्या से परेशान कुछ कम्पनियां वहाँ से बोरिया बिस्तर समेट रहीं। हैदराबाद, पूना, गुड़गांव कमोबेश इस हाल में पहुँच चुके है,
या पहुचने वाले हैं।
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इन शहरों के लोग, देश को समृद्ध बनाने का दंश झेल रहे हैं। एक रिपोर्ट आई है, जो कहती है कि देश के 13 जिले/अर्बन सेंटर्स इस देश के जीडीपी का 50% देते हैं..
बाकी का शेष 700+ जिले, याने मेरे और आपके शहर- शून्य दशमलव कुछ कुछ प्रतिशत।
तो समृद्धि देने वाले शहर, जिले वही हैं, जहां हर शख्स सीने में जलन, और फेफड़ों के तूफान लेकर भटक रहा है।
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~सन 2000 से 2010 का दशक, हम समृद्धि के दशक के रूप में देख सकते हैं। इकॉनमिक लिबरलाइजेशन के फल अब आने लगे थे।~
*_उद्योग, व्यापार, रोजगार, सब बूम पर था- और इकॉनमी 8-9% की रफ्तार से बढ़ रही थी। इसका इंजन था- आईटी सेक्टर_*_
दनादन इंजीनियरिंग कॉलेज बढ़े थे, पैकेज बढ़ा था, धन का प्रवाह बढ़ा था। और हर युवा-अपने शहर से निकलकर बंगलौर, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई, पुणे जा रहा था। देसी टीसीएस वहां बैठी थी,और विदेशी कॉग्निजेंट भी।
कॉल सेंटर वहीं थे। तो बैंक, हेड ऑफिस, और उनके सहयोगी छोटी कम्पनियों के ऑफिस भी वहीं हुए। एयरपोर्ट, मॉल, पब, मार्किट, पॉश रेस्टोरेंट वहां थे।
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पर सबसे बढ़कर जो चीज थी- एक सुनहरा, सुरक्षित- कॉस्मोपॉलिटन माहौल।
~जो समृद्ध मध्यवर्ग को चाहिए, कम्पनियों को चाहिए। और जो पटना, लखनऊ, इंदौर, जबलपुर, सूरत कानपुर, इलाहाबाद या गोरखपुर की सरकारे नही दे सकती..या यहां का समाज पचा नही सकता-~
_इन शहरों में था।_
तो यहां गोबर फैलाने वाले व्हाइट ब्लैक कॉलर- दोनों तरह के मजदूर- इस गोल्ड रश में हिस्सा पाने, भर भरकर इन शहरों में पहुचें।
और व्यवस्था को चरमरा दिया।
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अर्बन प्लनिंग, हिंदुस्तान की सबसे नेगलेक्टेड सेक्टर्स में हैं। कानून के राज की जगह, नेताओ का राज है। जिनकी निगाह में शहरों के मास्टर प्लान की इज्ज़त, संविधान से भी कम है।
सो अवैध बेतरतीब बस्तियां बनी, फैली। फिर उनका नियमितीकरण हुआ। बिल्डर-नेता नेक्सस ने शहरों के गले में फंदा शनै: शनै: यूँ कसा, कि आज सांस आनी बन्द हो गयी है।
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“`हमने 100 स्मार्ट सिटी के सपने देखे। धौलेरा सिटी की बात सुनी। 20 से उपर शहरों में मेट्रो रेल, बुलेट ट्रेन, और एक्सप्रेसवे के प्रोजेक्ट किये। कुछ लाख करोड़ फूंककर बनी मेट्रो (दिल्ली छोड़) भयंकर घाटे में हैं। एक्सप्रेस वे सूने हैं, और स्मार्ट, आपका शहर कितना बना- आप बेहतर जानते हैं।“`
मगर इस कंक्रीट-स्टील की शो केसिंग की असली आत्मा- याने “रूल ऑफ लॉ”.और “सिविक सेंस” लाने में असफल रहे। राजनीतिक वजहों से, फाइनेंशियली वायबल प्रोजेक्ट की जगह, चंद नेताओ की नगरी चमकाने की कोशिश की।
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शो केसिंग और प्रोजेक्ट ऑफ प्राइड की जगह, हर 200 किमी में एक बंगलौर का नए शहरों का विकास, करने की जरूरत थी। धन, रोजगार, व्यापार, भरोसा और वर्किंग सोसायटी कल्चर की जरूरत थी।
उदाहरण बहुतेरे हैं।
चीन ने 20 से अधिक शहर खड़े किए। वहां उस इलाके के उत्पाद, क्राफ्ट, स्किल के बाजार की तरह डेवलप किया। वहां यूनिवर्सिटी, बाजार, पर्यटन के अवसर खड़े किए। हम इस कोर्डिनेटेड एप्रोच से दूर है।
इसके लिए आपको 20-30 साल की योजना, फोरकास्टिंग, और प्रोजेक्शन की जरूरत है। यह बजट दर बजट, चुनाव दर चुनाव, और हेडलाइन दर हेडलाइन बदलनी नही चाहिए।
*_पर इसका दोष मैं सरकार को कतई नही दे सकता।_*
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*इसलिए कि 2014 तक सरकारों का दोष होता था। तब तक, अवश्य सरकारे दोषी थी, नेहरू भी दोषी हैं।*
*लेकिन 2014 के बाद, केवल मैं और मेरा समाज दोषी है। ऐसा समाज जिसका विमर्श, 12 साल तक अहर्निश हिन्दू मुसलमान, बॉयकॉट -किस से खरीदना किस से नहीं -देशभक्ति- गद्दार, वामी-कामी, देख लूंगा, निपटा दूंगा, बर्बाद कर दूंगा.. तक सीमित रहे।*
उसके सीने में जलन और आँखो में तूफान भला क्यो न होगा। हां मगर, 1978 में आई फ़िल्म की तरह मोहब्बत और विरह की जलन से पैदा नही होगा।
ये दिलो में नफरत के तूफान से जन्मे, फोटो केमिकल स्मोग का नतीजा होगा।





























