जगमोहन रौतेला
जब सड़क मार्ग नहीं होता था, तो चार धाम की यात्रा पर ऋषिकेश से आगे जाने वाले तीर्थ यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता था। इस पैदल मार्ग में कई रात्रि विश्राम पड़ाव होते थे। जिन्हें चट्टी कहा जाता था। ऋषिकेश में भी काली कमली वाली धर्मशाला को तब चट्टी के तौर पर ही उपयोग में लाया जाता था। गंगा घाटी में अब पैदल मार्ग में ये पड़ाव खंडहर बन चुके हैं। सन् 2023 में पत्रकार संदीप गुसाईं ने हरिद्वार से केदारनाथ तक की यात्रा इन्हीं चट्टियों के माध्यम से पूरी की। यात्रा मार्ग में अब केवल कुछ ही चट्टियों में दुकानें और धर्मशालाएँ मौजूद हैं। ऋषिकेश से बदरीनाथ तक कुल 84 चट्टियाँ हुआ करती थीं और पैदल मार्ग से यह दूरी करीब 1 माह में पूरी होती थी।
यह जानकारी देहरादून में गत 3 जून 2026 को दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर की ओर से ‘चार धाम यात्रा का बदलता पर्यटन स्वरूप’ विषय पर पत्रकार संदीप गुसाईं द्वारा सजीव छाया-चित्र के माध्यम से एक व्याख्यान में दी गई। जिसमें उन्होंने ऋषिकेश से बदरीनाथ पैदल यात्रा मार्ग पर विस्तार से चर्चा की। संदीप ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऑल वेदर रोड परियोजना और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट के कारण इस पूरी गंगा घाटी पर भारी दबाव हो चुका है। तीर्थाटन परंपरा अब एक तरह से पर्यटन में तब्दील हो रही है।
ऋषिकेश-देवप्रयाग पैदल मार्ग के 67 किलोमीटर क्षेत्र में बड़े होटल, रिजॉर्ट और अत्यधिक पर्यटकों के दबाव से गंगा नदी और उसके पूरे इकोसिस्टम पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन पौड़ी गढ़वाल के क्षेत्र में अभी भी सन्नाटा पसरा है। पैदल मार्ग के रखरखाव और जीर्णोद्धार न होने के कारण अब इस पर केवल स्थानीय गाँवों के लोग कुछ दूरियों तक सफर करते हैं। सन् 2013 की आपदा के बाद हेंवल घाटी, रुद्र गधेरा, महादेव चट्टी जैसे कई इलाकों में फ्लैश फ्लड और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई थी। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट के बाद इस घाटी के कई गाँवों के मकानों में दरारें पड़ती जा रही हैं। देवप्रयाग के पास सौड़ गाँव में लगभग सभी मकानों में दरारें हैं। कई प्राकृतिक जलस्रोत सूख चुके हैं।
संदीप ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज से 100 साल पहले ऋषिकेश से देवप्रयाग तक पैदल सफर कर यात्री जाते थे। ऋषिकेश में टिहरी राजा की तरफ से कुली एजेंसी थी, जबकि लक्ष्मण झूला के पास ब्रिटिश सरकार ने कुली एजेंसी, पुलिस चौकी, डिस्पेंसरी और पोस्ट ऑफिस बनाए थे। लक्ष्मण झूला से यात्री फूलचट्टी, मोहनचट्टी, बिजनी चट्टी होते हुए नौड़खाल धार पार कर बंदरचट्टी पहुँचते थे। बंदरचट्टी के बाद महादेव चट्टी से तोता घाटी होते हुए कांडी चट्टी पहुँचते थे। कांडी चट्टी में डिस्पेंसरी, कुली एजेंसी, पोस्ट ऑफिस और धर्मशाला हुआ करती थी। जो आज भी मौजूद हैं। यहाँ पर करीब 14 दुकानें थीं, जिनसे यात्री खाने-पीने का सामान लिया करते थे।
कांडी चट्टी के बाद व्यास चट्टी में काली कमली की धर्मशाला और दुकानें थीं। आज ये धर्मशाला पूरी तरह से खंडहर हो चुकी है। व्यास चट्टी में नयार नदी, जिसे पुराणों में नवालिका कहा गया है, आकर मिलती है। इसे इंद्रप्रयाग भी कहते हैं। व्यास चट्टी में गंगा नदी यू आकृति बनाती है। व्यासघाट चट्टी से आगे करीब 12 किलोमीटर पर इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल देवप्रयाग आता है। जिसे बाह बाजार भी कहते हैं। बाह बाजार में कई दुकानें और धर्मशालाएँ यात्रियों के लिए हुआ करती थीं। आज भी यहाँ पर काली कमली की धर्मशालाएँ हैं।
चार धाम यात्रा में जब सन् 1880 में हरिद्वार तक ट्रेन पहुँची तो देश भर से तीर्थ यात्रियों की संख्या में तेजी आने लगी। उसी दौरान स्वामी विशुद्धानंद चार धाम की पैदल यात्रा पर आए। जिन्हें काली कमली वाले बाबा कहते हैं। उन्होंने यात्रियों की परेशानियों को बहुत नजदीक से देखा। उस समय उच्च हिमालयी क्षेत्र में यात्रियों के रात्रि विश्राम स्थलों, धर्मशालाओं का बेहद अभाव था। उस दौरान बहुत कम धर्मशालाएँ और गेस्ट हाउस हुआ करते थे। विशुद्धानंद महाराज ने यात्रियों के कष्टों को देखते हुए अपने अनुयायियों से पूरे चार धाम यात्रा मार्ग पर 100 से अधिक धर्मशालाएँ बनवाईं। ब्रिटिश काल में पैदल रास्तों, छोटी पुलियों और झूलों-पूलों के निर्माण में तेजी आई। ब्रिटिश सरकार ने सदावर्त के फंड से यात्रा मार्ग में डिस्पेंसरी भी खोलीं। जहाँ यात्रियों को निःशुल्क दवाइयाँ मिलती थीं।
ऋषिकेश से देवप्रयाग तक पूरा पैदल मार्ग वर्तमान पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर और द्वारीखाल विकास खंडों से होकर देवप्रयाग तक पहुँचता है। यह मार्ग बेहद कठिन भी था, क्योंकि मार्ग में जंगली जानवरों का आतंक बहुत रहता था। शिवालिक और मध्य हिमालय का यह क्षेत्र आपदाओं की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। कई गाड़, गधेरों और गंगा नदी के तेज बहाव से यात्रा मार्ग बाधित ही रहता था। हेंवल नदी, रुद्र गधेरा, नयार नदी सहित दर्जनों छोटे-बड़े नदी-नालों को पार कर यात्री देवप्रयाग पहुँचते थे। यात्रा देवप्रयाग से गंगोत्तरी, यमुनोत्तरी, केदारनाथ और बदरीनाथ के लिए जाती थी। वर्तमान समय में सड़क, हेली से यात्रा संचालित हो रही है।
ऋषिकेश-देवप्रयाग मार्ग में राफ्टिंग, कैंपिंग और अन्य एडवेंचर स्पोर्ट्स के कारण पूरे चार धाम यात्रा में सबसे ज्यादा भीड़ होती है। इससे न सिर्फ सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की समस्या खड़ी हो गई है, बल्कि राजाजी नेशनल पार्क और नरेन्द्र नगर वन प्रभाग से जुड़े जंगलों में वन्यजीव पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। भारतीय वन्य जीव संस्थान ने कई बार इसकी चेतावनी भी जारी की है। लगातार बढ़ते पर्यटन ने तीर्थाटन को भी खत्म कर दिया है। सड़कों पर दबाव से भूस्खलन के कई नए क्षेत्र विकसित होते जा रहे हैं, जो आने वाले समय में किसी बड़ी आपदा का कारण बन सकते हैं।
संदीप गुसाईं पौड़ी गढ़वाल जिले में एकेश्वर विकास खंड के नावा गाँव के रहने वाले हैं। इन्होंने मास कम्युनिकेशन से एमए की पढ़ाई गढ़वाल विश्वविद्यालय से की। उसके बाद 2007 से 2011 तक ईटीवी में संवाददाता रहे। बाद में साधना न्यूज़ और फिर ज़ी न्यूज़ में कार्य करते हुए 2020 में नई मीडिया का माध्यम चुना। सन् 2020 से ‘rural tales’ चैनल के माध्यम से सैकड़ों गाँवों की पदयात्राएँ कर चुके हैं। इन्होंने 2023 में हरिद्वार से केदारनाथ पुराने पैदल मार्ग की कवरेज करते हुए पुराने चार धाम यात्रा मार्ग की लंबी सीरीज की प्रस्तुति की। उनकी यह सीरीज ऋषिकेश से देवप्रयाग के बीच गंगा घाटी में विभिन्न चुनौतियों पर केंद्रित रही।
छाया-चित्र व्याख्यान कार्यक्रम में चंद्रशेखर तिवारी, कल्याण सिंह रावत, रेखा उनियाल धस्माना, कल्याण बुटोला, देवेंद्र कुमार, राजू गुसाईं, सुरेंद्र सजवाण, डॉ. डी.के. पाण्डे, डॉ. योगेश धस्माना, डॉ. लालता प्रसाद, आलोक सरीन, चंदन नेगी, सुंदर बिष्ट, कर्नल कंडवाल, डॉ. अतुल शर्मा, प्रेम पंचोली सहित कई साहित्यकार, इतिहासकार, छात्र-छात्राएँ और तमाम मीडियाकर्मी उपस्थित थे।
फोटो इंटरनेट से साभार































