राजीव लोचन साह
उत्तराखंड सरकार और नैनीताल जिला प्रशासन की अदूरदर्शिता ने इस बार नैनीताल नगर को दो-तीन दिन तक अनावश्यक रूप से तनाव और संशय में झोंक दिया। मौका था फ्लैट्स पर बकरीद की नमाज पढ़ने का। कुछ दिन पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि सार्वजनिक स्थानों पर नमाज नहीं पढ़ने दी जायेगी। यह घोषणा सत्ताधारी दल के एजेण्डे के अनुरूप थी, जिसके अनुसार अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों को दृष्टि में रखते हुए धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश लगातार तेज की जा रही है। मुख्यमंत्री की रुचि कानून-व्यवस्था की स्थिति मजबूत करने में होती तो वे सिर्फ नमाज पढ़ने पर रोक लगाने की घोषणा नहीं करते, बल्कि धर्म के नाम पर किसी भी समुदाय द्वारा सार्वजनिक स्थानों का दुरुपयोग किये जाने पर रोक लगाने की घोषणा करते। कौन नहीं जानता कि श्रावण मास में शिवभक्तों द्वारा की जाने वाली काँवड़ यात्रा में कानून-व्यवस्था की किस तरह धज्जियाँ उड़ जाती हैं। यात्रा मार्ग के आसपास रहने वाले लोगों की जिन्दगी साँसत में रहती है। मगर उस वक्त उस भीड़ को नियंत्रित करने की बजाय सरकार द्वारा उस पर फूल बरसाये जाते हैं। मुख्यमंत्री के वक्तव्य की पड़ताल किये बगैर फ्लैट्स को सार्वजनिक स्थान मानते हुए जिला प्रशासन ने इस बार वहाँ ईद की नमाज पढ़ने की इजाजत देने से इन्कार कर दिया। नैनीताल जैसे शान्त शहर में तो नमाज, चाहे वह इदुल फितर की हो या इदुलजुहा (बकरीद) की, पिछले सौ सालों से फ्लैट्स पर ही पढ़ी जा रही है। किसी को भी इससे कोई दिक्कत नहीं है। दिक्कत है तो उस बेतहाशा भीड़ से, जो पर्यटन के नाम पर शहर को रौंद रही है। इसे व्यवस्थित करने में प्रशासन नाकाम रहा है। दो-तीन दिन के संशय और तनाव के बाद अन्ततः उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने अंजुमन इस्लामिया नैनीताल की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बकरीद पर फ्लैट्स पर नमाज अता करने की अनुमति दे दी और नैनीताल ने राहत की साँस ली।
फोटो इंटरनेट से साभार
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