रवि चोपडा
अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लिमिटेड बनाम अनुज जोशी एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार द्वारा दायर शपथपत्र ने 14 वर्षों पुराने विवाद को सुलझाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। इस शपथपत्र में उत्तराखंड की केवल सात जलविद्युत परियोजनाओं (एचईपी) को आगे बढ़ाने की अनुमति देने की सिफारिश की गई है, वे परियोजनाएँ जो या तो पहले से चालू हैं या जिनमें भारी भौतिक अथवा वित्तीय प्रगति हो चुकी है। इनमें शामिल हैं—
- टिहरी स्टेज-II (1000 मेगावाट)
- सिंगोली-भटवारी (99 मेगावाट)
- मध्यमहेश्वर (15 मेगावाट)
- कालीगंगा-II (4.5 मेगावाट)
- तपोवन-विष्णुगढ़ (520 मेगावाट)
- विष्णुगढ़-पिपलकोटी (444 मेगावाट)
- फाटा-ब्यूंग (76 मेगावाट)
यह शपथपत्र जल शक्ति मंत्रालय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा विद्युत मंत्रालय के सामूहिक निर्णय को दर्शाता है। यह सिफारिश इस शर्त के साथ दी गई है कि सभी वैधानिक प्रावधानों और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन किया जाएगा तथा गंगा बेसिन के ऊपरी क्षेत्रों में कोई नई जलविद्युत परियोजना शुरू नहीं की जाएगी।
हालाँकि मीडिया रिपोर्टों और कई टिप्पणियों ने केंद्र सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है, उत्तराखंड सरकार इससे निराश दिखाई देती है क्योंकि इससे लगभग 2,134 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता और उससे जुड़े आर्थिक लाभों का नुकसान होगा। पर्यावरणविदों ने भी इस निर्णय का स्वागत किया है, लेकिन वास्तव में यह केवल एक छोटा कदम है। नवीनतम शपथपत्र केवल 2021 में दाखिल किए गए पुराने शपथपत्र में केंद्र सरकार द्वारा लिए गए रुख को दोहराता है।
ऊपरी गंगा बेसिन में नई जलविद्युत परियोजनाओं का विरोध करने वाले तर्क 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति (EB-I) ने प्रस्तुत किए थे। समिति की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि पाराग्लेशियल क्षेत्र (हिमनदों के आसपास के संवेदनशील इलाके) में कोई भी बाँध नहीं बनाया जाना चाहिए। तपोवन-विष्णुगढ़ और विष्णुगढ़-पिपलकोटी परियोजनाएँ इसी क्षेत्र में आती हैं। यदि 2014 में विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें मान ली गई होतीं, तो 2021 में तपोवन-विष्णुगढ़ बैराज का विनाश नहीं होता और 200 से अधिक मजदूरों की जान बचाई जा सकती थी। फाटा-ब्यूंग परियोजना स्थल पर भी केवल कुछ निर्माण कार्य हुए हैं, इसलिए इन तीनों परियोजनाओं को बंद किया जा सकता है।
केंद्र के निर्णय का महत्व उन कारणों में छिपा है जिनके आधार पर यह निर्णय लिया गया। यह स्वीकार किया गया है कि गंगा अपनी विशिष्ट जलवैज्ञानिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक महत्ता के कारण दुनिया की अन्य नदियों से अलग स्थान रखती है।
शपथपत्र में ऊपरी गंगा क्षेत्र की पाँच प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया गया है—
- पाँच प्रयाग, चार धाम मंदिर, कानूनी रूप से संरक्षित क्षेत्र जैसे भगीरथी ईको-सेंसिटिव ज़ोन, नंदा देवी, फूलों की घाटी, गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान और केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्ता को दर्शाते हैं।
- 1916 के हरिद्वार समझौते की भावना के अनुरूप यह निर्णय लिया गया था कि अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी सहित पूरी गंगा का प्रवाह कहीं भी नहीं रोका जाएगा।
- यह क्षेत्र अत्यंत भूवैज्ञानिक रूप से संवेदनशील है और भूकंपीय क्षेत्र IV एवं V में स्थित है, जिससे यहाँ भूस्खलन, अचानक बाढ़, ग्लेशियल झील फटने (GLOF), हिमस्खलन तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है।
- शपथपत्र में उत्तराखंड क्षेत्र में बढ़ती आपदाओं का उल्लेख किया गया है, जैसे 1991 का उत्तरकाशी भूकंप, 1998 का भेंटी भूस्खलन, 1999 का चमोली भूकंप, 2003 की वरुणावत ढलान विफलता, 2012 की अस्सी गंगा बाढ़, 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की ऋषिगंगा आपदा, 2023 का जोशीमठ धंसाव, 2023 की पिंडर घाटी बाढ़ और 2025 की धाराली हिमस्खलन घटना। ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है।
पूर्व केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सदस्य जी. डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) ने वर्षों तक केंद्र सरकार को समझाने का प्रयास किया कि गंगा दुनिया की अन्य नदियों से अलग है। उनके शोध से पता चला कि हिमालय से आने वाले विशेष अवसाद और वनस्पति तत्व गंगा की आत्म-शुद्धिकरण क्षमता को अद्वितीय बनाते हैं।
शपथपत्र का एक और महत्वपूर्ण पहलू “सावधानी सिद्धांत” (Precautionary Principle) का समर्थन है। इसमें कहा गया है कि यदि किसी अंतिम निर्णय से पर्यावरणीय नुकसान की आशंका हो, तो सतर्कता और रोकथाम को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
यह सत्य है कि उत्तराखंड को अपनी 2,100 मेगावाट से अधिक स्थापित जलविद्युत क्षमता के नुकसान के साथ-साथ संभावित राजस्व हानि भी उठानी पड़ेगी। इसलिए केंद्र सरकार को हिमालयी राज्यों को “पारिस्थितिक सेवाएँ” प्रदान करने के बदले आर्थिक सहायता देने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सहायता उन राज्यों को मिलनी चाहिए जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली परियोजनाओं को त्यागते हैं।
ऐसी नीति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि धन का उपयोग नष्ट हुए पर्यावरण को पुनर्स्थापित करने और सामुदायिक भागीदारी से उसकी रक्षा करने में किया जाएगा। जलविद्युत परियोजनाओं से नष्ट हुए जंगलों का पुनर्जीवन और सुरंग निर्माण से प्रभावित जलस्रोतों की रक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रभावशाली हित समूहों ने वर्षों तक समिति-दर-समिति और शपथपत्र-दर-शपथपत्र प्रक्रिया को प्रभावित किया है। 2014 से 2024 तक कई विशेषज्ञ समितियों और मंत्रालयों ने इन मुद्दों का अध्ययन किया। अंततः प्रधानमंत्री कार्यालय की भागीदारी से एक सहमति बन पाई, जिसके आधार पर यह शपथपत्र तैयार हुआ।
अब सुप्रीम कोर्ट के पास उत्तराखंड के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह निर्णय शक्तिशाली लॉबियों और निजी हितों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश होगा।
(लेखक पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट, देहरादून के पूर्व निदेशक हैं।)
फोटो इंटरनेट से साभार































