शैलेन्द्र सेमवाल
बंदूक्या जसपाल राणा सिस्त साध दे, निसणु साध दे, उत्तराखंड म बाघ लग्यूं बाघ मार दे…,(बंदूक वाले जसपाल राणा निशाना साध दे, क्योंकि उत्तराखंड में बाघ लग गया है (बाघ का आतंक है), अतः तुम ही इस बाघ को मार दो।) उत्तराखंड के दिग्गज लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी का यही वह गीत था जिसने एक झटके में जसपाल राणा को भावनात्मक रुप से पूरे पहाड़ की उस समस्या से जोड़ दिया था, जिससे आज भी उत्तराखंड जूझ रहा है।
आदमखोर बाघ के आंतक का उत्तराखंड से बहुत पुराना नाता रहा है। उत्तराखंड में पिछले सौ सालों में सैकड़ों आदमखोर बाघ(तेंदुए, गुलदार) हुए, हजारों लोग इनका शिकार हुए। जिम कार्बेट ने जब 20 के दशक में रुद्रप्रयाग, चंपावत के खूंखार आमदखोर बाघ को मारकर उनका आंतक खत्म किया था। तो अनेक निशानेबाज, तोपची लोगों की भरोसे, उम्मीद का केन्द्र बन गए थे।
बात 1994 की है। तत्कालीन गढ़वाल सांसद रेल राज्य मंत्री सतपाल महाराज एक बीएसएल टॉवर का उद्घाटन करने कल्जीखाल ब्लॉक मुख्यालय आए हुए थे। जिला सूचना कार्यालय में कार्यरत होने के नाते सरकारी स्तर पर कार्यक्रम की कवरेज के लिए ‘नेगीदा’ भी कल्जीखाल में थे। मंत्रीजी के इंतजार में वह चाय पीने एक छोटी दुकान पर बैठे, जहां ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर एशियाई खेलों की खबरें आ रही थी। शूटिंग स्पर्धा में जसपाल राणा पदक पर पदक जीत रहे थे। उसी समय दुकान में मौजूद गांव की एक बजुर्ग महिला जोर-जोर से कहने लगी कि, जसपाल राणा इतना ही बड़ा ‘तोपची’ है तो वह हमारे गांव में लगे मनस्वाग(आदमखोर बाघ) को मार कर दिखाए।
पौड़ी गढ़वाल जिले की पूरी ‘असवाल्स्यूं पट्टी’ उन दिनों से एक आदमखोर तेंदुए के आंतक से त्रस्त थी। वह महिलाओं और छोटे बच्चों को निशाना बनाता था, बच्चों को उनकी मां की गोद से झपट ले जाता था। दुकान में बैठे अन्य लोगों ने बुढ़िया की बात को मजाक में उड़ा दिया। लेकिन नेगीदा ने सोचा कि एक सामान्य बुढ़िया ने जिस तरह जसपाल राणा के महत्व, उपलब्धि का जो आंकलन किया था वह कितना अलग है, क्या कोई बुद्धिजीवी भी इस तरह सोचता होगा। इसके बाद पहाड़ों में बढ़ते पलायन ओर व्यवस्था पर करारे तंज के रुप में नेगीदा का ये कालजयी गीत अस्तित्व में आया।
गीत बना ‘लोकगीत’
गीत आने के बाद पहाड़ का हर घर जसपाल राणा से भावनात्मक रुप से जुड़ गया, ये गीत ‘लोकगीत’, ‘जनगीत’ की तरह गाया जाने लगा। खासतौर पर जो परिवार आदमखोर बाघ के हमले में अपने किसी परिजन को खो बैठताा था, उनके लिए ये गीत एक उम्मीद थी। इसी गीत की अगली लाइन थी कि ‘भौत नाम सुणि तेरु अखबार टीवी रेड्युं मां, तोपची बड़ा बड़ा हरैनी तिन देशु विदेशु मां, आंतकवादी ये बाघै की शेखी झाड़ दे, उत्तराखंड मां बाघ लग्यूं बाघ मार दे, मनस्वाग मार दे..। ’
नेगीदा कहते हैं कि कोई भी कला सिर्फ ‘कला’ के नजरिए से नहीं ‘जीवन के सरोकारों’ से भी जुड़ी होनी चाहिए। इसी परिस्थिति को देखते हुए उन्हें यह ये गीत लिखने की प्रेरणा बुजुर्ग महिला से मिली।
‘अलविदा गोल्डन ब्वाय जस्सू’
फोटो इंटरनेट से साभार































