शीशपाल गुसाईं
उत्तराखंड में इन दिनों धरती के हल्के-हल्के झटके एक बार फिर उन लोगों की स्मृतियों को कुरेद रहे हैं, जिन्होंने 1991 के उत्तरकाशी और 1999 के चमोली भूकंप को अपनी आंखों से देखा है। भूकंप की तीव्रता भले ही कम हो, लेकिन पहाड़ में उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव कभी छोटा नहीं होता। धरती के थोड़ा-सा डोलने पर भी बहुत से लोगों के मन में वही पुरानी तस्वीरें लौट आती हैं—हिलते हुए मकान, टूटती दीवारें, मलबे में दबे लोग और रातोंरात बदल गया जीवन।
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें तो 31 जुलाई से 10 अगस्त के बीच उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में कई भूकंपीय घटनाएं दर्ज हुई हैं। 31 जुलाई को उत्तरकाशी में 3.1 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। इसके बाद 3 अगस्त को चमोली में 3.4 तीव्रता की भूकंपीय घटना दर्ज हुई। फिर 10 अगस्त की रात उत्तरकाशी के बड़कोट-राजगढ़ी क्षेत्र में रात 1 बजकर 21 मिनट पर 4.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। इसके लगभग 24 मिनट बाद इसी क्षेत्र में 2.2 तीव्रता का एक और झटका दर्ज हुआ, जबकि रात 2 बजकर 19 मिनट पर टिहरी गढ़वाल में 2.0 तीव्रता की भूकंपीय घटना दर्ज की गई।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन छोटे भूकंपों को किसी बड़े भूकंप के तत्काल आने की भविष्यवाणी मानना वैज्ञानिक दृष्टि से गलत होगा। आज की विज्ञान-व्यवस्था यह नहीं बता सकती कि भूकंप किस तारीख, किस समय और किस स्थान पर आएगा। लेकिन विज्ञान यह जरूर बताता है कि उत्तराखंड हिमालय भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है और यहां बड़े भूकंप की संभावना को गंभीरता से समझना और उसके लिए तैयारी करना आवश्यक है।
उत्तराखंड के लिए भूकंप कोई नई घटना नहीं है। 20 अक्टूबर 1991 की रात आया उत्तरकाशी भूकंप आज भी इस प्रदेश की सबसे गहरी आपदा-स्मृतियों में शामिल है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के राष्ट्रीय भूकंप अभियांत्रिकी सूचना केंद्र के अनुसार उस भूकंप में 768 लोगों की मृत्यु हुई, 5,066 लोग घायल हुए और लगभग 42,400 मकानों को नुकसान पहुंचा। 1,294 गांव प्रभावित हुए थे।
उस समय उत्तराखंड आज की तरह सड़क, संचार और तकनीक से जुड़ा हुआ नहीं था। राहत और बचाव की अपनी सीमाएं थीं। लेकिन उस भूकंप ने एक और बात स्पष्ट कर दी थी कि हिमालय की खूबसूरत पहाड़ियों के नीचे एक अत्यंत सक्रिय भूगर्भीय प्रक्रिया लगातार चल रही है।
आठ वर्ष भी नहीं बीते थे कि 29 मार्च 1999 को चमोली में लगभग 6.5 तीव्रता का भूकंप आया। वैज्ञानिक अध्ययनों में उत्तरकाशी और चमोली के भूकंपों को उत्तराखंड हिमालय की सक्रिय भूगर्भीय संरचना से जोड़कर देखा गया है।
इससे पहले 1803 का गढ़वाल भूकंप भी इस क्षेत्र के इतिहास में दर्ज है। यानी उत्तराखंड की धरती ने समय-समय पर बड़े झटके महसूस किए हैं। इसलिए आज जब उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी या दूसरे हिस्सों में हल्के झटके आते हैं तो उन्हें केवल एक-दो दिन की खबर मानकर भूल जाना उचित नहीं होगा। ये घटनाएं हमें उस भूगर्भीय वास्तविकता की याद दिलाती हैं जिसमें पूरा हिमालय स्थित है।
हिमालय का निर्माण ही भारतीय और यूरेशियाई भू-प्लेटों के टकराव से हुआ है। भारतीय प्लेट आज भी उत्तर की ओर बढ़ रही है और इस प्रक्रिया में हिमालय के नीचे भूगर्भीय तनाव जमा होता रहता है। इस पूरी व्यवस्था में मुख्य हिमालयी भ्रंश यानी मुख्य हिमालयी थ्रस्ट अत्यंत महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड हिमालय पर किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों में इस संरचना को लगभग 8 से 20 किलोमीटर की गहराई में पहचाना गया है और हाल की भूकंपीय गतिविधियों का बड़ा हिस्सा इसी भूगर्भीय तंत्र से जुड़ा पाया गया है।
उत्तराखंड हिमालय की संरचना एक जैसी नहीं है। मुख्य केंद्रीय भ्रंश, मुख्य सीमा भ्रंश और हिमालयी अग्र भ्रंश जैसी कई प्रमुख भूगर्भीय संरचनाएं यहां मौजूद हैं। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि मुख्य हिमालयी थ्रस्ट पूरे उत्तराखंड में एक समान नहीं है, बल्कि उसकी संरचना और गहराई में क्षेत्र के अनुसार अंतर है। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में भूकंप का प्रभाव पूरे क्षेत्र में एक जैसा होगा, ऐसा मानना भी सही नहीं होगा।
इसी संदर्भ में “भूकंपीय रिक्तता” की चर्चा होती है। मध्य हिमालय के कुछ हिस्सों को लंबे समय से ऐसे क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है जहां बड़े भूकंपों के बीच लंबा अंतर रहा है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों ने यहां बड़े भूकंप की संभावना को गंभीर माना है, जबकि दूसरे अध्ययनों ने ऐतिहासिक भूकंपों की तीव्रता और उनके प्रभाव की नए सिरे से व्याख्या की है। इसलिए यह कहना कि “इतने वर्षों से भूकंप नहीं आया, इसलिए अब निश्चित रूप से बहुत बड़ा भूकंप आएगा”, विज्ञान नहीं है। वैज्ञानिक साहित्य में इस विषय पर मतभेद भी हैं।
यही वह बिंदु है जहां सार्वजनिक चर्चा में सावधानी जरूरी है। सोशल मीडिया पर अक्सर यह कहा जाता है कि उत्तराखंड में 8.5 या 9 तीव्रता का भूकंप आने वाला है। ऐसा दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित भविष्यवाणी नहीं है। हां, हिमालयी क्षेत्र में अतीत में आठ से अधिक तीव्रता के बड़े भूकंप आए हैं और वैज्ञानिक अध्ययन यह मानते हैं कि मध्य हिमालय में भविष्य में बड़े भूकंप की क्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन कब आएगा, कहां आएगा और कितनी तीव्रता का होगा—इसका सटीक पूर्वानुमान आज संभव नहीं है। कुछ शोध भविष्य में आठ या उससे अधिक तीव्रता वाले भूकंप की संभावना को पूरी तरह नकारते भी नहीं हैं।
इसलिए डर पैदा करने के बजाय हमें तैयारी पर बात करनी चाहिए।
यहां एक और भ्रम दूर करना जरूरी है। भूकंप के लिए कोई ऐसा रडार नहीं है जो मौसम विभाग के वर्षा रडार की तरह पहले से बता दे कि कुछ घंटे बाद भूकंप आने वाला है। उत्तराखंड में जो व्यवस्था विकसित की गई है, वह भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली है। यह भूकंप आने से पहले उसकी भविष्यवाणी नहीं करती। भूकंप शुरू होने के बाद जमीन में पैदा होने वाली शुरुआती तरंगों को सेंसर पकड़ते हैं और कंप्यूटर प्रणाली उनके आधार पर कुछ स्थानों पर अधिक तेज और नुकसान पहुंचाने वाली तरंगों के पहुंचने से पहले चेतावनी देने का प्रयास करती है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के अनुसार उत्तराखंड में भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली काम कर रही है। इस प्रणाली के माध्यम से कुछ स्थानों पर चेतावनी के लिए कुछ सेकंड से लेकर पर्याप्त दूरी होने पर अधिक समय मिल सकता है। संस्थान के अनुसार देहरादून में संभावित रूप से करीब 20 सेकंड का अग्रिम समय मिल सकता है, जबकि दिल्ली जैसे दूरस्थ क्षेत्र में यह समय एक मिनट से अधिक हो सकता है।
उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार वर्ष 2025 में राज्य में 177 सेंसर और 192 सायरन लगाए गए थे तथा 500 अतिरिक्त सेंसर और 1,000 नए सायरन लगाने की प्रक्रिया चल रही थी। इसका अर्थ है कि सरकार स्वयं भी इस व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता महसूस कर रही है।
उत्तराखंड भूदेव मोबाइल अनुप्रयोग भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार यह पांच से अधिक तीव्रता वाले संभावित विनाशकारी भूकंपों के लिए पूर्व चेतावनी और पांच से कम तीव्रता वाली घटनाओं की सूचना दे सकता है। चेतावनी कुछ सेकंड पहले मिलने पर व्यक्ति सुरक्षित स्थान लेने का प्रयास कर सकता है।
लेकिन यहां भी एक गंभीर सवाल है—10 अगस्त की रात उत्तरकाशी में आए 4.2 तीव्रता के भूकंप के समय इस व्यवस्था ने वास्तव में क्या किया? क्या सेंसरों ने भूकंप को उसी समय दर्ज किया? चेतावनी जारी हुई या नहीं? कितने सेंसर सक्रिय थे? कितने सायरन तक संदेश पहुंचा? मोबाइल अनुप्रयोग पर कितने लोगों को सूचना मिली? चेतावनी जारी हुई तो भूकंप के झटके आने से कितने सेकंड पहले हुई?
इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि व्यवस्था विफल रही, क्योंकि इसके लिए वास्तविक समय के तकनीकी अभिलेख चाहिए। लेकिन यह भी जरूरी है कि ऐसी महत्वपूर्ण व्यवस्था के प्रत्येक उल्लेखनीय भूकंप के बाद उसका परीक्षण सार्वजनिक रूप से किया जाए। इससे कमियों का पता चलेगा और जनता का विश्वास भी बढ़ेगा।
भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली को केवल सेंसरों की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए। सेंसर लगा देना पहला काम है, उसके बाद उसकी बिजली, संचार व्यवस्था, आंकड़ों का वास्तविक समय में पहुंचना, सर्वर की क्षमता, चेतावनी जारी करने की गति और लोगों तक संदेश पहुंचने की विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की ने ऐसे सेंसर भी विकसित किए हैं जो सौर ऊर्जा से चल सकते हैं और जिनमें संचार की सुविधा मौजूद है। इसलिए दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में बिजली पर निर्भरता कम करने की दिशा में तकनीकी विकल्प उपलब्ध हैं।
लेकिन अंततः कोई भी तकनीक भवन को सुरक्षित नहीं बनाती। भूकंप के समय कुछ सेकंड की चेतावनी तभी जीवन बचा सकती है जब भवन स्वयं इतना मजबूत हो कि उन कुछ सेकंडों में व्यक्ति सुरक्षित रह सके।
उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौती यहीं है।
देहरादून से लेकर हल्द्वानी, ऋषिकेश से लेकर उत्तरकाशी और श्रीनगर से लेकर चमोली तक तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने निर्माण का दबाव बढ़ाया है। पहाड़ों में होटल, होमस्टे, विद्यालय, अस्पताल और बहुमंजिला भवन बन रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि विकास क्यों हो रहा है। सवाल यह है कि विकास भूकंपरोधी मानकों के अनुसार कितना हो रहा है। पुराने कमजोर भवनों का सर्वे होना चाहिए। विद्यालयों और अस्पतालों की संरचनात्मक सुरक्षा की जांच होनी चाहिए। नए भवनों में भूकंपरोधी निर्माण के नियमों का वास्तविक पालन होना चाहिए। केवल नक्शा पास कर देना पर्याप्त नहीं है। निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।
हर जिले में नियमित अभ्यास होना चाहिए। स्कूलों में बच्चों को यह पता होना चाहिए कि भूकंप आने पर खिड़की के पास नहीं जाना है, लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करना है और घबराकर सीढ़ियों की ओर नहीं भागना है। उन्हें सरल तरीके से झुकना, मजबूत मेज या संरचना के नीचे सुरक्षित होना और उसे पकड़कर रखने का अभ्यास कराया जाना चाहिए।
गांवों में स्थानीय स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, क्योंकि किसी बड़े भूकंप के बाद सबसे पहले मदद अक्सर पड़ोसी ही पहुंचाता है। सड़कें टूट सकती हैं, संचार बंद हो सकता है और सरकारी दलों को पहुंचने में समय लग सकता है। ऐसी स्थिति में प्रशिक्षित स्थानीय लोग जीवन बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
उत्तराखंड को भूकंप से उतना खतरा नहीं है जितना भूकंप के प्रति हमारी लापरवाही से है।
भूकंप प्राकृतिक घटना है, लेकिन उससे होने वाली तबाही का स्तर काफी हद तक मानव निर्मित होता है। कमजोर भवन, गलत निर्माण, अवैज्ञानिक ढंग से पहाड़ काटना, आपदा मार्गों का अभाव और तैयारी की कमी प्राकृतिक घटना को बड़ी आपदा में बदल देते हैं।
1991 ने हमें चेताया था। 1999 ने फिर चेताया। नेपाल का 2015 का भूकंप भी हिमालय की भूगर्भीय शक्ति की एक बड़ी याद है। इतिहास हमारे सामने है। वैज्ञानिक अध्ययन हमारे सामने हैं। तकनीक हमारे पास है। अब कमी यदि है तो उसे तैयारी और क्रियान्वयन में दूर करना होगा।
इसलिए 10 अगस्त की रात उत्तरकाशी में आया 4.2 का भूकंप केवल एक समाचार नहीं है। उसके बाद आए छोटे झटके भी केवल आंकड़े नहीं हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि जिस हिमालय को हम स्थिर समझकर उसके ऊपर शहर और बस्तियां बसाते जा रहे हैं, उसके भीतर भूगर्भीय प्रक्रियाएं लगातार चल रही हैं। हमें यह भी समझना होगा कि हर छोटा भूकंप बड़े भूकंप का संकेत नहीं होता। लेकिन हर छोटा भूकंप हमें अपनी तैयारी जांचने का एक अवसर जरूर देता है।
यही इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात है।
भूकंप कब आएगा, यह हम नहीं जानते। कितना बड़ा होगा, यह भी पहले से नहीं जानते। लेकिन यह जरूर जानते हैं कि उत्तराखंड भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है। यह भी जानते हैं कि अतीत में यहां बड़े भूकंप आ चुके हैं। यह भी जानते हैं कि हिमालय की भूगर्भीय प्रक्रिया अभी रुकी नहीं है। और अब हमारे पास चेतावनी देने वाली तकनीक भी है।
तो फिर तैयारी क्यों अधूरी रहे?
किसी अगले भूकंप का इंतजार करके तैयारी शुरू करना सबसे बड़ी भूल होगी। तैयारी का सही समय वही है जब धरती शांत हो। क्योंकि भूकंप को रोका नहीं जा सकता, उसकी तारीख बताना अभी संभव नहीं है, लेकिन उसके बाद होने वाली तबाही को कम करना हमारे हाथ में है। धरती कब हिलेगी, यह हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन धरती हिले तो उत्तराखंड कितना हिलेगा—इसका फैसला काफी हद तक हमारी तैयारी करेगी। यही इन छोटे-छोटे झटकों का सबसे बड़ा संदेश है।
संदर्भ:
1. भारत सरकार, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय — राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र।
2. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर — राष्ट्रीय भूकंप अभियांत्रिकी सूचना केंद्र।
3. उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण — चमोली भूकंप संबंधी तकनीकी अभिलेख।
4. वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून — हिमालय की भूकंपीय संवेदनशीलता संबंधी वैज्ञानिक अध्ययन।
5. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की — उत्तराखंड भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली।
6. उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण — भूकंप पूर्व चेतावनी सेंसर एवं सायरन व्यवस्था।
7. उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण — ‘भूदेव’ भूकंप पूर्व चेतावनी एवं सूचना अनुप्रयोग।































