बीते दिनों उत्तराखंड में पौड़ी जिले के एराडी गांव की जमीन का मामला सुर्खियों में रहा। यहां 112 नाली कृषि भूमि के बिकने और उस पर हाउसिंग सोसाइटी बनने की बात ने तूल पकड़ लिया। कहा जा रहा है कि इस जमीन पर करीब 250 फ्लैट्स बनाए जाने का प्रस्ताव है और यह काम एक निजी कंपनी कर रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के लिए जो पानी इस्तेमाल किया जाएगा, उससे गाँव वालों के पानी के स्रोत को ही खतरा पैदा हो सकता है।
हालाँकि इस मामले में एक पक्ष उन लोगों का भी है जिन्होंने यह जमीन बेची है। भू कानून के सवालों पर उनका कहना है कि उन्होंने किसी बाहर वाले को नहीं, बल्कि उत्तराखंड के ही एक निवासी को यह जमीन बेची है और जिस कंपनी का यहाँ जिक्र हो रहा है, वह दून हैचरीज लिमिटेड यमकेश्वर निवासी नरेंद्र सिंह के नाम पर पंजीकृत है। हालांकि इस मामले में लैंड यूज बदलवाने का मुद्दा भी सवालों के घेरे में है कि इस कृषि भूमि का लैंड यूज बदलने से पहले ही यहाँ हाउसिंग सोसाइटी बनाने का प्रचार प्रसार कैसे शुरू कर दिया गया। फिलहाल इस मामले में एक जांच समिति गठित कर दी गई है और किसी भी तरह के निर्माण पर फिलहाल रोक लगा दी गई है।
एक विवाद बीते दिनों नैनीताल में भी सामने आया, हालाँकि उस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। प्रसंग यह है कि सांसद अजय भट्ट ने बीते 18 जून को प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र लिख कर बताया कि नैनीताल के रामगढ़ में तरुणेंद्र विक्रम सिंह नाम के व्यक्ति की चाय बगीचा में करीब 3 हेक्टेयर जमीन है, जिसकी पुनः पैमाइश किए जाने की वह मांग कर रहे हैं। मुख्य सचिव आनंदवर्धन ने जिलाधिकारी नैनीताल को इस जमीन की पैमाइश करने का निर्देश दे दिया। इस पत्राचार में यह जिक्र नहीं हुआ कि इस जमीन की पैमाइश तो साल 2019 में की जा चुकी है। उक्त जमीन राज्य सरकार के स्वामित्व की है और इस पर कब्जा उद्यान विभाग का ही है। असल में इस मामले में हुआ यह कि साल 2019 में तरुणेंद्र विक्रम सिंह नाम के व्यक्ति ने दावा किया कि रामगढ़ के चाय बगीचा में उनकी करीब 3.5 हेक्टेयर जमीन है, जिसके सीमांकन के लिए उन्होंने प्रशासन को पत्र लिखा। नैनीताल के तत्कालीन जिलाधिकारी के आदेश पर हुई सीमांकन की प्रक्रिया में राजस्व विभाग और उद्यान विभाग के अधिकारियों के साथ ही स्थानीय लोग और स्वयं तरुणेंद्र विक्रम सिंह भी मौके पर मौजूद रहे। इस जांच में पाया गया कि यह जमीन उद्यान विभाग के कब्जे में है और वही इस जमीन पर बागवानी भी कर रहा है। इस जमीन का स्वामित्व प्रदेश सरकार का ही है।
लेकिन साल 2021 में तरुणेंद्र विक्रम सिंह ने एक बार फिर से इसी जमीन की पैमाइश के लिए आवेदन किया। दूसरी तरफ उद्यान विभाग ने भी इसी साल भवाली थाने और स्थानीय एसडीएम को एक शिकायत लिखी कि तरुणेंद्र विक्रम सिंह ने उक्त जमीन पर अवैध रूप से घेरबाड़ करने की कोशिश की है और इसके लिए लोहे के एंगल भी मौके पर जमा किए हैं। कई स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी नैनीताल डीएम को पत्र लिखे कि इस जमीन पर बाहरी व्यक्तियों द्वारा कब्जा करने की कोशिश की जा रही है। इन सभी लोगों ने यह भी जिक्र किया कि 2019 में की गई जांच में पाया जा चुका है कि जमीन सरकारी है।
लेकिन अब सांसद अजय भट्ट के हालिया पत्र के बाद मामला फिर से गर्मा गया। लोग आरोप लगा रहे हैं कि एक तरफ तो यह सरकार दावा कर रही है कि हमने कई एकड़ जमीन अतिक्रमण से और कई-कई प्रकार के जिहादियों से मुक्त करवाकर वापस सरकार में निहित करवा ली है और दूसरी तरफ इनके सांसद ही सरकारी जमीन को लुटवाने की पैरवी करते नजर आ रहे हैं। अगर तरुणेंद्र विक्रम सिंह का दावा सही है तो उन्हें 2019 में हो चुकी जांच को कोर्ट में चुनौती देनी चाहिए। लेकिन वह ऐसा करने की बजाय वे नेताओं के माध्यम से जांच के आदेश क्यों करवा रहे हैं ?
स्थानीय लोगों के मन में संदेह पैदा होना वाजिब है।
बीते पखवाड़े उत्तराखंड की एक और खबर ने देश भर में जगह बनाई, जब अल्मोड़ा के युवा इनोवेटर रवि टम्टा ने एक सिंगल सीटर फ्लाइंग कार प्रोटोटाइप का सफल परीक्षण करते हुए एक वीडियो जारी किया। बीते कुछ सालों से वह एक फ्लाइंग कार बनाने पर काम कर रहे थे। 7 अगस्त को उन्होंने अल्मोड़ा के एक ग्राउंड में अपनी इस फ्लाइंग कार का सफल परीक्षण किया और हवा में उड़ती ये मशीन जब लोगों ने सोशल मीडिया पर देखी तो यह वीडियो तुरंत ही देश भर में वायरल हो गया। इस वीडियो के वायरल होने के कई घंटों बाद डीआईपीआर अल्मोड़ा पेज से यह पोस्ट किया गया, जिसमें बताया गया कि स्थानीय हेमवती नंदन बहुगुणा स्टेडियम में आयोजित ट्रायल उड़ान के दौरान जिलाधिकारी श्री अंशुल सिंह एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री चंद्रशेखर उपस्थित रहे। उनकी मौजूदगी में रवि टम्टा ने हैपिड स्काई नेक्स को सफलतापूर्वक उड़ान भरते हुए अपने नवाचार को साकार रूप दिया। इस दौरान सुरक्षा के सभी आवश्यक मार्गों का ध्यान रखा गया तथा प्रशासन की निगरानी में पूरी प्रक्रिया संपन्न करवाई गई। कहने का मतलब यह है कि रवि टम्टा जब देश भर में सुर्खियों में आ चुके थे, तब शासन प्रशासन को होश आया कि उनसे संपर्क करना चाहिए। इसके बाद वह वीडियो भी सामने आया जब मुख्यमंत्री ने रवि से फोन पर बात की और संभवत तभी स्थानीय प्रशासन को भी यह ख्याल आया कि इस परीक्षण को अपने सामने ही होता हुआ दिखाना पड़ेगा और सबको बताना होगा कि हमने सुरक्षा मानकों के साथ उनका पूरा ध्यान रखते हुए यह परीक्षण अपने सामने करवाया है।
बहरहाल रवि को बधाई कि उन्होंने खालिस अपने जुनून के चलते कुछ ऐसा इनोवेट कर दिखाया है जो कई तरह के संसाधन मिलने के बाद भी लोगों के लिए कर पाना मुमकिन नहीं होता। वैसे समय बीतने के साथ कुछ लोग रवि के इस इनोवेशन को यह कहते हुए नकारने का भी कोशिश कर रहे हैं कि इस तरह के इनोवेशन कुछ साल पहले देश और विदेश में अन्य जगह भी अन्य लोगों ने किए हैं। यह बात सही भी है लेकिन इस आधार पर रवि टम्टा के प्रयोग को खारिज करना कतई सही नहीं है। पहाड़ में रहते हुए बेहद सीमित संसाधनों और अपनी लगन के चलते उन्होंने ऐसा प्रयोग कर यह साबित किया है कि अगर उन्हें हमारी सरकारों का समर्थन मिलता है तो वह इससे आगे और बेहतर कर सकते हैं। उनके प्रयोगों को समर्थन देना और उनका हौसला बढ़ाया ही जाना चाहिए ताकि हमारे युवाओं को ऐसे इनोवेशंस के लिए और प्रोत्साहन मिल सके।
बीते दिनों एक और अच्छी खबर सुप्रीम कोर्ट से भी आई, जहां कोर्ट ने मोदी सरकार के उस फैसले को असंवैधानिक माना, जिसके तहत किसी भी परियोजना के लिए पर्यावरण स्वीकृति को बैक डेट में भी लिया जा सकता था। मोदी सरकार साल 2021 में एक मेमोरेंडम लेकर आई थी, जिसके तहत किसी भी बड़ी परियोजना के लिए जरूरी एनवायरमेंट क्लीयरेंस को परियोजना शुरू होने के बाद भी लिए जाने का रास्ता खोल दिया गया था। यानी कोई भी बड़ी परियोजना शुरू करने के लिए आप पहाड़ों को खंडहर बना दीजिए और बाद में जब चाहे पर्यावरण से जुड़े सवालों की जरूरी अनुमतियां लेते रहिए। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि किसी अपवाद स्वरूप ऐसा किया तो जा सकता है लेकिन मेमोरेंडम के माध्यम से एनवायरमेंटल लॉस को पूरी तरह बाईपास कर देना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है।
बीते दिनों कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का उत्तराखंड दौरा भी सुर्खियों में रहा। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि उनकी रैली में आने वालों को पुलिस रोक रही है और नैनीताल के एसएसपी पर तो कांग्रेस ने सीधा-सीधा भाजपा के एजेंट होने का भी आरोप लगा दिया। किसी भी आईपीएस ऑफिसर पर ऐसा आरोप लगना एक गंभीर मामला है। लेकिन इसकी गंभीरता कांग्रेस ने खुद ही तब कमजोर कर दी, जब कांग्रेस नेता एसएसपी ऑफिस में दाखिल हुए और वहां उनके कुछ लोगों ने एसएसपी को खोजते हुए अपशब्द कह डाले। कांग्रेस को अगर यह लगता था कि एसएसपी उनकी रैली को कमजोर करने के लिए दुर्भावना से काम कर रहे हैं तो उन्हें गंभीर मामले को उसी गंभीरता से उठाना भी चाहिए था। जोश-जोश में एसएसपी को अपशब्द कहना उनके लिए ही काफी हद तक उल्टा पड़ा और एसएसपी को एक बड़े वर्ग की सहानुभूति मिल गई। उसके बाद भाजपा प्रदेश भर में कांग्रेस नेताओं का पुतला फूंकने लगी।
वैसे और भी मजेदार बात है कि यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। खबर मिली कि खड़गे जी के जाने के बाद कुछ हिन्दुत्ववादी संगठनों ने रामलीला मैदान, जहाँ श्री खड़गे का कार्यक्रम हुआ था, को गंगाजल से धोकर वहाँ शुद्धिकरण यज्ञ किया और अगले दिन मल्लिकार्जुन खड़गे, जो दलित वर्ग से सम्बन्ध रखते हैं, ने यह मामला राज्य सभा में उठा दिया।
इस प्रकरण को लेकर अब एक और राष्ट्रव्यापी बहस चल पड़ी है।
(यू ट्यूब चैनल ‘बारामासा’ से साभार)































