हिमांशु जोशी
बद्रीनाथ मंदिर के पीछे स्थित झंडा मोहल्ला गांव के निवासी अंबिका प्रसाद कोटियाल कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में यहां के मौसम, पर्यावरण और लोगों की जीवनशैली में तेजी से बदलाव आया है।
अंबिका प्रसाद कोटियाल (छह भाई) के पिता की बद्रीनाथ में कपड़ों की दुकान और रेस्टोरेंट था, जिसे अब वह संभाल रहे हैं। वह बताते हैं कि पहले यहां बादलों की गर्जना बहुत कम सुनाई देती थी, लेकिन पिछले दस-पंद्रह वर्षों में मौसम का मिजाज बदल गया है। अब अक्सर तेज गर्जना के साथ बादल आते हैं और बेमौसम बारिश भी होने लगी है।
पहाड़ों से घटती बर्फ और सूखते जलस्रोत
अंबिका प्रसाद कोटियाल बताते हैं कि करीब चालीस साल पहले मंदिर के पीछे की पहाड़ियों में अप्रैल और मई के दौरान एक से डेढ़ फुट तक बर्फ पड़ती थी। अब बर्फबारी मुख्य रूप से अक्टूबर से जनवरी तक सीमित रह गई है। अप्रैल-मई में यदि बर्फ गिरती भी है तो उसकी मात्रा चार-पांच इंच से ज्यादा नहीं होती।
उनका कहना है कि कम होती बर्फबारी का असर नदियों और जलस्रोतों पर भी दिखाई दे रहा है। पहले जिन धाराओं में भरपूर पानी रहता था, उनमें अब पानी कम होता जा रहा है।
धार्मिक पर्यटन बढ़ने के साथ बद्रीनाथ के बाजारों का स्वरूप भी बदल गया है। वह कहते हैं कि पहले श्रद्धालु पूजा-पाठ और मंदिर से जुड़े सामान अधिक खरीदते थे, लेकिन अब गर्म कपड़ों और पर्यटन से जुड़े सामान की मांग तेजी से बढ़ी है।
खेतों से कमरों तक बदलती गांव की अर्थव्यवस्था
खेती में आए बदलाव पर अंबिका प्रसाद कोटियाल कहते हैं कि आसपास के गांवों में पहले आलू, मूली और फाफर जैसे मोटे अनाज की खेती बड़े स्तर पर होती थी। लेकिन पिछले करीब दस वर्षों में खेती लगातार कम होती गई है।
अब कई लोगों ने अपने खेतों में अस्थायी कमरे और झुग्गियां बनाकर उन्हें यात्रियों को किराये पर देना शुरू कर दिया है। वह कहते हैं कि स्थानीय अर्थव्यवस्था अब तेजी से पर्यटन पर निर्भर होती जा रही है और पारंपरिक खेती पीछे छूट रही है।
प्लास्टिक के बढ़ते ढेर और अलकनंदा की चिंता
स्थानीय लोगों का कहना है कि बद्रीनाथ में बढ़ते निर्माण और कूड़े ने पर्यावरण पर दबाव बढ़ा दिया है। अंबिका प्रसाद कोटियाल बताते हैं कि लगभग तीस साल पहले यहां बहुत कम कूड़ा निकलता था। उस समय अधिकतर लोग मालू के पत्तों से बनी प्लेटों जैसी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल करते थे, जिन्हें बाद में जमीन में दबा दिया जाता था।
अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। बद्रीनाथ से ट्रकों में भरकर प्लास्टिक का कूड़ा बाहर भेजना पड़ रहा है।
वह तप्त कुंड को लेकर भी चिंता जताते हैं। उनके मुताबिक श्रद्धालु पहले इस कुंड को पवित्र और औषधीय गुणों वाला जलस्रोत मानते हैं, कई लोग वहां साबुन और शैंपू का इस्तेमाल करने लगे हैं। यह पानी सीधे अलकनंदा नदी में मिल रहा है, जिससे प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ रही है।
तुलसी की खुशबू कम हुई, बढ़ने लगे कीट-पतंगे
भास्कर डिमरी, बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं, वह कहते हैं कि पिछले पंद्रह वर्षों में यहां की तुलसी में भी बदलाव महसूस किया गया है। उनके मुताबिक पहले तुलसी की खुशबू दूर तक फैलती थी, लेकिन अब उसकी महक और आकार दोनों कम हो गए हैं।
वह बताते हैं कि पिछले दो वर्षों से बद्रीनाथ क्षेत्र में मक्खियां और अन्य छोटे कीट-पतंगे भी दिखाई देने लगे हैं। उनका मानना है कि बढ़ते कूड़े और बदलते पर्यावरणीय हालात इसके पीछे एक बड़ी वजह हो सकते हैं।
त्रियुगी नारायण में बदलता मौसम और बढ़ती भीड़ का असर
देहरादून से लगभग 255 किलोमीटर दूर स्थित त्रियुगी नारायण गांव धार्मिक आस्था और हिमालयी संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। श्री केदारनाथ धाम आने वाले यात्री सोनप्रयाग से होकर यहां पहुंचते हैं। समुद्र तल से करीब 1,980 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस गांव को भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह स्थल के रूप में जाना जाता है।
मंदिर परिसर में जल रही अखंड धूनी को उसी विवाह की अग्नि माना जाता है। हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ और बदलते मौसम ने गांव के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
कई फीट बर्फ से मामूली बर्फबारी तक का सफर
मंदिर के तीर्थ पुरोहित कैलाश चंद्र गैरोला कहते हैं कि पिछले चार-पांच वर्षों में गांव का मौसम तेजी से बदला है। पहले दिसंबर से फरवरी तक यहां पांच-छह फीट बर्फ गिरती थी और लोग कई दिनों तक घरों में रहने को मजबूर हो जाते थे।
अब स्थिति यह है कि इस साल फरवरी में मुश्किल से एक से डेढ़ फीट बर्फबारी हुई।
वह कहते हैं कि मौसम का चक्र बदल रहा है और मई में ही जून जैसी गर्मी महसूस होने लगी है।
गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर तोषी क्षेत्र में समय-समय पर भूस्खलन की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क के पास एक जगह पानी लगातार जमा हो रहा है, जिसे भविष्य के खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
खेती का दायरा घटा, सीमित हुई फसलें
कैलाश चंद्र गैरोला बताते हैं कि गांव की खेती पहले की तुलना में काफी सिमट गई है। पहले यहां कई तरह की फसलें उगाई जाती थीं, लेकिन अब खेती मुख्य रूप से आलू और राजमा तक सीमित रह गई है।
हालांकि गांव के आसपास जंगलों में आग की घटनाएं अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती हैं और पानी के स्रोत अभी भी कुछ हद तक सुरक्षित माने जाते हैं।
गांव में पलायन भी बहुत कम है, क्योंकि अधिकांश परिवार मंदिर और धार्मिक गतिविधियों से जुड़ी आजीविका पर निर्भर हैं।
सोशल मीडिया से बढ़ी पहचान, सफाई बनी चुनौती
गांव के लोग कहते हैं कि सोशल मीडिया के कारण पिछले कुछ वर्षों में त्रियुगी नारायण की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं, लेकिन इसके साथ गंदगी और बदबू जैसी समस्याएं भी बढ़ी हैं।
कैलाश चंद्र गैरोला बताते हैं कि साफ-सफाई की व्यवस्था सीमित है। जिला पंचायत की ओर से पंद्रह-बीस दिन में सफाई कर्मचारी आते हैं, लेकिन बढ़ती भीड़ के सामने यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।
वन्यजीवों का बढ़ता खतरा
त्रियुगी नारायण मंदिर के तीर्थ पुरोहित राजेश भट्ट कहते हैं कि गांव में वन्यजीवों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। भालू और शेर अक्सर पशुओं पर हमला कर रहे हैं। इस साल एक ही गौशाला में सात मवेशियों को मार दिया गया, जबकि पूरे गांव में पंद्रह-बीस मवेशी वन्यजीवों का शिकार हो चुके हैं।































