अरविंद सुब्रमण्यम
(लेखक प्रधानमंत्री मोदी के पूर्व आर्थिक सलाहकार 2014-2018 रहे हैं।)
अनुवाद : उमेश तिवारी विश्वास
हेनरी किसिंजर (पूर्व अमेरिकी राजनयिक) ने एक बार यूरोपीय संघ के निर्णय लेने की क्षमता पर यह कहते हुए तंज किया था कि ‘आपात स्थिति में हम वहां (यूरोपीय संघ में) किसका नंबर डायल करें ?’ वही हाल आज भारत का है; जैसे-जैसे रुपया गिर रहा है, देश के लिए आर्थिक चुनौतियां गंभीर हो रही हैं। सवाल उठता है कि ‘आखिर इस देश की बागडोर है किसके हाथ में ?’ इसका जवाब मिलना ही चाहिये और “वो चाहे कोई भी हों (या न हों), उन्हें बदल देना चाहिए।”
क्या कर्मचारीगणों को बदलने में पहले ही काफ़ी देर हो चुकी ?.. आसन्न संकट की स्थिति में पहला संदेश या नैरेटिव होना चाहिए कि यहां की कमान मज़बूत फ़ैसले लेने वाले व्यक्ति के हाथ में है। इस समय भारत को एक ऐसे ही भरोसेमंद व्यक्ति की ज़रूरत है जिसके पास स्पष्ट सोच हो, ठीक मारियो द्राघी (अर्थशास्त्री और इटली के पूर्व प्रधानमंत्री) सरीखे व्यक्ति की, जिसने कहा था, “जो भी करना पड़ेगा, हम करेंगे।”
भारत में आर्थिक फ़ैसले लेने वाले दो मुख्य ध्रुवों (दिल्ली और मुंबई) की बात करें तो नई दिल्ली ने चुप्पी साधी हुई है या एक ढुलमुल रवैया अपनाया जा रहा है। वहीं मुंबई में हालात ऐसे हैं कि वहाँ के अगुवा परिस्थितियों के आगे बेबस नज़र आ रहे हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से की गई किफ़ायत बरतने की अपील ने लोगों में घबराहट ही पैदा की। उसके बाद उनकी लंबी विदेश यात्रा ने तो देश के भीतर इस सोच को और भी बढ़ावा दिया कि फ़ैसले लेने के मामले में एक जड़ता सी आ गई है और ठोस अनुवर्ती कार्यवाही का मसौदा भी नदारद है।
तथापि कर्मचारियों को बड़े स्तर पर बदले जाने का वास्तविक हेतु सरकार के नुकसानदेह क्रियाकलापों को रोकने से संबंधित है न कि और नये काम करने से। यह विचारणीय मुद्दा है।
भारत जैसे ऊर्जा-निर्भर देश पर ईरान युद्ध का असर पड़ना लाज़िमी है परंतु रुपये की गिरती हालत से इसका बहुत लेना-देना नहीं है। दरअसल, यह आर्थिक विकास की संभावनाओं को लेकर बढ़ती हुई चिंताओं को दर्शाता है। इसका एक सबूत यह है कि ईरान युद्ध आरंभ होने से पूर्व ही, उभरते बाज़ारों वाले देशों की मुद्रा के बरक्स रुपया अपना सबसे बुरा प्रदर्शन कर रहा था।
युद्ध से ठीक पहले के दो-तीन सालों में, तुर्की को छोड़कर, बावजूद वहाँ के केंद्रीय बैंक द्वारा अपनी मुद्रा को बचाने की बहुतेरी कोशिशों के, अन्य किसी देश की मुद्रा में इतनी बड़ी गिरावट नहीं आई। भारत में भी 2022 से फरवरी 2026 के मध्य, RBI द्वारा स्पॉट और फॉरवर्ड ट्रेडिंग सेगमेंट में विदेशी परिसंपत्तियों के लगभग 50 प्रतिशत के बराबर पूंजी झोंकने के बावजूद रुपये में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ गई।
रुपये की चाल ने इस बात को उजागर कर दिया है कि निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था में अपना भरोसा खो रहे हैं और इस बात को सरकारी आंकड़ों में कुछ समय से छिपाया जा रहा था। देर से ही सही अब निवेशकों की नज़र उस लाल बत्ती पर पड़ गई है जो निरंतर घटते निजी कॉर्पोरेट निवेश की ओर इशारा कर रही थी। 2000 के दशक की शुरुआत में निजी कॉर्पोरेट निवेश GDP का 17 प्रतिशत हुआ करता था, आज यह उस राशि का आधा रह गया है। कोविड के बाद इसमें थोड़ी तेज़ी आई थी, लेकिन वह भी जल्दी समाप्त हो गई। निजी निवेश में कमी ही आज भारतीय अर्थव्यवस्था की मुख्य समस्या है और इसे पुनः पटरी पर लाना सबसे बड़ी चुनौती है।
सवाल पूछा जाएगा कि इस कारण कर्मचारियों को बदलने की मांग क्यों की जा रही है, जबकि नीतिगत “सुधारों” मात्र से काम चल जाना चाहिये। परंतु समस्या यह है कि सरकार ने हाल में शाबासी बटोरने वाले ऐसे सुधार किए भी हैं जिनका मकसद कारोबार की लागत को कम करना है; सरकार ने गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स (GST) को कम किया और आसान बनाया, श्रम कानूनों को तर्कसंगत बनाकर उनमें सुधार किया, ज़्यादा से ज़्यादा क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)की शर्तों को उदार बनाया है और सबसे बढ़कर, यूरोपीय संघ के साथ एक मुक्त व्यापार समझौता किया। अमेरिका के साथ भी एक व्यापार समझौते पर शुरुआती सहमति जताई है। इसके अलावा, अर्थव्यवस्था को नियंत्रण-मुक्त (deregulate) करने का काम दो समितियों को सौंपा गया है। ऐसे में सरकार हाथ खड़े करके यह तर्क ज़रूर दे सकती है कि, ‘बताइए हम इससे अधिक क्या कर सकते हैं ?’ तथापि, इन सुधारों के बावजूद, निवेशकों के भरोसे में वृद्धि नहीं हुई। इस विरोधाभास की कुंजी और घटते निजी निवेश की गुत्थी, सरकार द्वारा कारोबार करने की लागत को प्रभावित करने के लिए कागज़ों पर उठाए गए कदम और सरकार के गहरे मंतव्यों, जिनसे ज़मीन पर कारोबार के जोखिम जुड़े हैं, के मध्य के अंतर में छुपी हुई है।
इन मंतव्यों या प्रवृत्तियों में शामिल हैं : नियामक हदों को गिनती के बड़े कॉर्पोरेट घरानों के पक्ष में झुका देना, जिसका नुकसान अन्य निवेशकों (चाहे वे घरेलू हों या विदेशी) को उठाना पड़ता है ; संसाधनों के बंटवारे और निवेश के प्रवाह को निर्देशित करने के मामले में, बीजेपी शासित राज्यों को विपक्ष की सरकारों वाले राज्यों से ज़्यादा तरजीह देना ; सरकारी एजेंसियों का हथियार की तरह इस्तेमाल कर राजनीतिक विरोधियों और व्यवसायियों को निशाना बनाना ; टैक्स कानूनों को बहुत ज़्यादा सख्ती और मनमाने ढंग से लागू करना ; और भारत के संघीय निर्णय लेने वाले ढांचों को कमज़ोर करना—ये सब ऐसे काम हैं जो न तो भरोसा पैदा करते हैं और न ही विश्वास।
नीतिगत सुधारों को ‘प्रस्तावित कामों’ (to-do list) की सूची में बढ़ोतरी करने जैसा है, इसके विपरीत, ‘बुरी प्रवृत्तियों’ की समस्या से निपटना ‘वर्जनाओं की सूची’ (not-to-do list) की तरह समझा जा सकता है। मंत्रियों, शिल्पवैज्ञानिकों, और नौकरशाही के स्तर पर लोगों को बदलना ही शायद एकमात्र तरीका है जिससे सरकार इन बुरी प्रवृत्तियों और आदतों से हटने का संकेत दे सकती है। सरकार को नई प्रतिभाओं को भर्ती करना चाहिए—ऐसी प्रतिभाएं जिनकी कद्र उनकी गुणवत्ता, स्वतंत्रता और नए विचारों के लिए हो, न कि उनकी वफादारी या सिर्फ़ सरकार की जय-जयकार करने के लिए। अधिकारियों को मौजूदा चुनौतियों को स्वीकार करने के मामले में ज़्यादा खुला और यथार्थवादी नज़रिया अपनाना होगा।
लोगों का एक जैसा होना और विचारों का पुराना पड़ जाना सभी राजनीतिक व्यवस्थाओं के लिए घातक होता है। यहाँ तक कि राजनीतिक रूप से मज़बूत शासकों को भी ‘संदेश व्यवस्थापन’ (message management) को सख़्ती से सीमित करना चाहिए और बदलाव को अपनाना चाहिए। सच तो यह है कि इस “तेंदुए” को अपनी आदतें बदलनी ही होंगी, वरना भारतीय अर्थव्यवस्था का पतन निश्चित है।
(26 मई 2026 को इंडियन एक्सप्रेस में छपे लेख का हिन्दी अनुवाद)
फोटो इंटरनेट से साभार































