कमल जोशी
कौसानी में स्थित प्रसिद्ध लक्ष्मी आश्रम नाम में विगत 14 जून, रविवार को स्वर्गीया कांति बहन की स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ।
आजीवन सर्वोदयी विचारधारा व बालिकाओं की शिक्षा के लिये समर्पित लक्ष्मी आश्रम परिवार की वरिष्ठ सदस्य कांति भट्ट का दिल की बीमारी के कारण 3 जून को 90 वर्ष की परिपक्व आयु में देहांत हो गया था। इसी साल मार्च महीने में लक्ष्मी आश्रम के एक अन्य वरिष्ठ सहयोगी डेविड हाॅपकिंस का आकस्मिक निधन हुआ था। इन दोनों के चले जाने से लक्ष्मी आश्रम को बहुत गंभीर क्षति हुई है क्योंकि वे दोनों संस्था के महत्वपूर्ण स्तम्भ होने के साथ ही आश्रम परिवार, विशेषकर बालिकाओं के साथ बहुत गहरा स्नेह रखते थे। यह श्रद्धांजलि कार्यक्रम कांति बहन को श्रद्धांजलि देने के लिये आयोजित किया गया था लेकिन उपस्थित लोगों ने बाबूजी डेविड भाई को भी याद किया जिन्हें आश्रम की बालिकायें प्यार से बाबूजी कहती थीं।
आजीवन सर्वोदयी विचारधारा व बालिकाओं की शिक्षा के लिये समर्पित लक्ष्मी आश्रम परिवार की वरिष्ठ सदस्य कांति भट्ट का दिल की बीमारी के कारण 3 जून को 90 वर्ष की परिपक्व आयु में देहांत हो गया था। इसी साल मार्च महीने में लक्ष्मी आश्रम के एक अन्य वरिष्ठ सहयोगी डेविड हाॅपकिंस का आकस्मिक निधन हुआ था। इन दोनों के चले जाने से लक्ष्मी आश्रम को बहुत गंभीर क्षति हुई है क्योंकि वे दोनों संस्था के महत्वपूर्ण स्तम्भ होने के साथ ही आश्रम परिवार, विशेषकर बालिकाओं के साथ बहुत गहरा स्नेह रखते थे। यह श्रद्धांजलि कार्यक्रम कांति बहन को श्रद्धांजलि देने के लिये आयोजित किया गया था लेकिन उपस्थित लोगों ने बाबूजी डेविड भाई को भी याद किया जिन्हें आश्रम की बालिकायें प्यार से बाबूजी कहती थीं।
स्वर्गीया कांति भट्ट प्रसिद्ध गांधीवादी समाज सेविका राधा बहन (जमनालाल बजाज पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित) की चार बहनों में उनके बाद दूसरे नम्बर पर थीं। चारों बहनें लक्ष्मी आश्रम से छात्रा/सेविका के रूप में जुड़ी जिसकी स्थापना महात्मा गांधी की अंग्रेज शिष्या सरला बहन ने बालिकाओ की शिक्षा के उद्देश्य से 1946 में की।
कांति बहन नैनीताल जिले के रामगढ़ में पैदा हुईं जहां उनका बचपन व्यतीत हुआ तथा प्रारंभिक शिक्षा हुई। उनकी उच्च शिक्षा लखनऊ (यहां उन्होंने एम.ए. की पढ़ाई की) सहित अन्य जगहों मे ंहुई। उन्होंने आजीवन लक्ष्मी आश्रम कौसानी में रह कर बालिका शिक्षा के साथ ही इस क्षेत्र में सामाजिक व शैक्षिक जागरूकता आंदोलनों में अपने को समर्पित कर दिया। पद, सम्मान या प्रतिष्ठा जैसे प्रलोभनों से हमेशा दूर रह कर कर्तव्य पालन करने वाली कांति बहन को आश्रम परिवार के सदस्य स्नेह से ओदी कह कर पुकारते थे।
कांति बहन का राधा बहन के साथ इतना ज्यादा था कि लोग उन्हें राधा बहन की परछाई कहते थे। राधा बहन ने उनको श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ’’यह महसूस करना कठिन है कि बिना परछाई के कैसे रहा जा सकता है!’’
नाॅर्वे से आयीं कांतिदी की छोटी बहन देवी ने स्वरचित कविता के माध्यम से उन्हें याद किया जो वह उन्हें सुनाना चाहती थीं लेकिन नहीं सुना पायीं। इस कविता में कांति बहन को अनमोल रत्न बताती है जिसने समझ और मज़बूती से संघर्षों का सामना किया और जीवन भर संपर्क में आये सब लोगों पर प्रेम उड़ेला।
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक कल्याण मनकोटी ने याद किया कि कैसे कांति बहन ने आश्रम की बालिकाओं के साथ गांव में शराब के विरोध में उनके अहिंसक आंदोलन में साथ दिया। ’’ओदी के साथ आश्रम की बालिकाएं महिला संगठन बनाने पहुंची। उनका काम करने का तरीका ऐसा था कि गांव में जो व्यक्ति शराब का कारोबार करता था उसी के घर में सबसे पहले मीटिंग आयोजित की। इसके मूल में महात्मा गांधी का यह विचार था कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।’’
दिल्ली से आये वरिष्ठ गांधीवादी कार्यकर्ता संजय ने वर्धा तथा अन्य जगहों पर ओदी के साथ व्यतीत किये लंबे वक्त को याद करते कहा कि वह बहुत ही ज़िदादिल इंसान थीं। उन्होंने कहा कि जैसे जैसे समय और दुनिया आगे जा रहे हैं ऐसे जिंदा दिल लोग कम होते जा रहे हैं। ओदी के साहस और सूझबूझ के बारे में उन्होंने एक रोचक किस्सा भी सुनाया। वर्धा में एक कुआं साफ कर रहे थे लेकिन नीचे ज़मा गाद को साफ कैसे करें यह नहीं सूझ रहा था। तब ओदी ने सुझाव दिया कि बांस की टोकरी में उन्हें बैठा कर रस्सी के सहारे नीचे उतार दिया जाय। सबसे पहले हलके वज़न की ओदी टोकरी में तथा बाद में कुछ अन्य लोग लोहे के पाइप के सहारे नीचे गये और कुंआ साफ कर दिया।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता भुवन पाठक सहित अनेक लोगों ने कांति बहन की नाटकों, संगीत तथा नृत्य में अत्यधिक रुचि को याद करते हुए बताया कि नाटकों में ओदी हरेक किरदार को खुशी से करने को तत्पर रहतीं। शिविरों के दौरान कभी वह दिन में सो जाती थीं लेकिन शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होते ही वह इतनी चंगी हो जाती कि उनकी नींद, थकान सब भाग जाते। उनकी छोटी बहन कृष्णा बिष्ट ने बताया कि डेनमार्क में दोनों ने मिल कर नाटक किये थे। नाटकों मे ओदी ने पुरुष पात्रों की भूमिका इतनी बखूबी निभाई कि दर्शकों को यकीन ही नहीं हुआ कि वह वास्तव में पुरुष नहीं बल्कि महिला है।
लक्ष्मी आश्रम की वर्तमान व पूर्व छात्राओं सहित प्रायः सभी वक्ताओं ने कांति बहन के बाल सुलभ व्यक्तित्व तथा गुणों का उल्लेख किया जिसमें जीवन के प्रति उत्साह तथा सबके प्रति प्रेम व सद्भाव ही झलकता था। आश्रम मे ंरह कर 12वीं कक्षा की पढ़ाई कर रही एक छात्रा ने कहा, ’’पहले दिन मुझे देखते ही ओदी बहुत खुश इुई। वह आश्रम में आने वाली हरेक नयी बालिका को बहुत खुशी से गले लगाती थीं।’’ पूर्व में लक्ष्मी आश्रम की छात्रा रही एक युवा महिला ने कहा कि ओदी के साथ एक अलग सम्बन्ध था। उन्हें संगीत बहुत पसंद था। वह कहीं से भी कोई गाना सीख कर आतीं तो मुझे अकेले बैठा कर सिखातीं तथा फिर औरों को सिखाने को कहतीं।
लंदन मे ंरह रही आश्रम की कार्यकत्री हंसी और स्वर्गीय डेविड भाई की पुत्री दीपिका ने अपने संदेश में उल्लेख याद किया कि किस तरह कांति दी बालिकाओं को नाटकों व रामलीला का मंचन कराती थीं।
लंदन मे ंरह रही आश्रम की कार्यकत्री हंसी और स्वर्गीय डेविड भाई की पुत्री दीपिका ने अपने संदेश में उल्लेख याद किया कि किस तरह कांति दी बालिकाओं को नाटकों व रामलीला का मंचन कराती थीं।
कांति बहन की जिंदादिली और बच्चों जैसा स्वभाव अंतिम दिनों तक बना रहा। बीमार होने पर उन्हें कुर्सी पर बैठा कर किसी की पीठ पर नीचे मोटर रोड तक ले जाना पड़ा था। इस बारे में उन्होंने नाॅर्वे में रह रही छोटी बहन देवी को हंसते हुए कहा, ’’पता है, आज मैं हेलीकाप्टर में बैठ कर नीचे गयी!’’ जब डाक्टरी जांच में दिल की बीमारी का पता चला तब भी उन्होंने बच्चे की तरह ऐसे बताया मानो खुशखबरी हो- ’’मालूम है, जांच में दिल की बीमारी पता लगी है! मैं जब मरूंगी तो सब कहेंगे कि हार्ट अटेक से मरी!’’ ऐसी बातें कांति बहन ही कह सकती थीं। इसी से उनके साहस, सरलता, सहजता और विनोदी स्वभाव का अनुमान लगाया जा सकता है।
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