(1974 लखनऊ की प्रवासी पर्वतीयों की सबसे पुरानी संस्था ‘कुमाऊं परिषद’ का रजत जयंती वर्ष था। संस्था ने तय किया कि उस वर्ष रामलीला मंचन के अवसर पर एक स्मारिका प्रकाशित की जाए। युवा कवि महेंद्र पंत को उसका सम्पादक बनाया गया। चूंकि मैं महेंद्र दा के साथ गली-मुहल्लों की छोटी-छोटी कवि गोष्ठियों में कविता पढ़ने जाया करता था, सो उसने मुझे स्मारिका के संपादन में अपना सहयोगी बना लिया। प्रसिद्ध साहित्यकार- समीक्षक शम्भू प्रसाद बहुगुणा ‘कुमाऊं परिषद’के लक्ष्मण भवन स्थित कार्यालय के ऊपर ही रहते थे।हम उनके पास स्मारिका के लिए एक लेख लिख देने का निवेदन करने पहुंचे। उन्होंने आश्वस्त किया लेकिन समय पर कोई लेख तैयार न कर सके। हमें निराश देखकर उन्होंने कहा था- ‘अच्छा रुको, कुछ देता हूं।’ वे भीतर के कमरे में गए और एक पुराना पत्र लाकर हमारे हाथ में दे दिया- ‘इसे छाप देना। यह चंद्र कुंवर का बड़ा रोचक पत्र है जो उसने मुझे पौड़ी की रामलीला के बारे में लिखा था। और, मूल पत्र वापस कर देना।’तब चंद्र कुंवर बर्त्वाल के बारे में इतना ही सुना हुआ था कि शम्भू प्रसाद बहुगुणा जी ने उनकी कविताओं को तलाश कर और प्रकाशित करके हिंदी साहित्य जगत के समक्ष प्रस्तुत करने का बड़ा काम किया था। बाद में यह भी जाना कि दोनों अच्छे मित्र थे और चंद्र कुंवर बर्त्वाल एम ए करने के लिए लखनऊ आकर बहुगुणा जी के साथ ही ठहरे थे लेकिन फिर बीमार हो जाने के कारण जल्दी ही वापस लौट गए थे। बहरहाल, मैंने उस पत्र की प्रति तैयार की, मूल प्रति बहुगुणा जी को वापस की और वह स्मारिका में प्रकाशित हुआ। अभी पुराने कागज पत्र पलटते हुए उस पत्र की प्रति के साथ‘कुमाऊं परिषद’ की रजत जयंती स्मारिका हाथ लगी तो इस पत्र का महत्त्व समझ में आया। बर्त्वाल जी ने पत्र में तारीख भी अवश्य डाली होगी लेकिन हम ही उसे उतारना भूल गए होंगे। खैर, यह रहा वह रोचक पत्र- नवीन जोशी)
प्रिय शम्भु,
जब कभी भी किशोरावस्था का ध्यान आता है, स्कूल की बातें याद आती हैं, तो पौड़ी बिना किसी मतलब के आंखों के आगे आ जाती है। वे ही नीले-नीले देवदार के पेड़, पल्लव-प्रच्छाद-पथ, ओस से भीगी हुई घास, गिरती हुई पहाड़ियां, छोटे-छोटे खेत और छोटे-छोटे मकान। आह! यह वही पौड़ी है। सामने हिमालय का गौर ललाट चमक रहा है। यह वही हवा है, जो हिमानी के आलिंगन से शीतल होकर कितने ही दुर्गम पर्वतों को पार कर, देवदार की नुकीली पत्तियों को एक-एक कर हिला रही है। नागदेव की किसी गुज्जित कुंज में, नवीन बसंत की किरणमयी दोपहरी में, इस स्वप्नमयी किशोर वायु का चलना कितना मधुर है।
इसी पौड़ी की रामलीला का ध्यान आते ही चुपचाप उसी सुनहले अतीत में नयन प्राण डूब जाते हैं। सामने रहता है केवल एक छोटा सा फील्ड, जिस पर स्टेज बना हुआ है। मैदान पर कुछ दरियां बिछी हुई हैं, जिन पर छोटे-छोटे स्कूल के लड़के बैठे हुए हैं। जहाँ से अमला क्वार्टर फील्ड से, बाजार की सड़क को पगडंडी जाती है, उस टाल पर छोटे-छोटे तम्बू तने हुए हैं, जिनके अन्दर कुटुम्ब हैं।
स्टेज के आगे एक डंडे पर लटका गैस जल रहा है,जिसकी आवाज आतुरता पैदा कर देती है। इस नयी रोशनी में, ये छोटे-छोटे बालक, चन्द्र लोक के किसी पर्वत पर बैठे हुए बालकों की तरह प्रदीप्ति शान्त हैं। सबके मुखों में एक हल्की हँसी है, सब व्यग्र हैं कि कब पर्दा खुलेगा, आपस में इसी विषय को लेकर इनकी बातचीतें हो रही हैं।
यह लीजिए। यह रस्सी खिंची, परदा उठने लगा, पांव दिखाई देने लगे, घुटने तक परदा उठ गया, कुछ सुन्दर चमकती हुई साड़ियाँ हैं। कुछ सुन्दर-सुन्दर मर्दानी धोतियाँ, परदा और ऊपर खिसका, कमर, वक्ष, मुख और सर्राता हुआ, बहुत ऊपर। ये लो-कुछ देवियां हैं, कुछ देवता, सबके बाल लम्बे-लम्बे हैं, चेहरे सबके गोरे हैं, और सबके हाथ जोड़े हुए हैं। ये लोग गाना गा रहे हैं-एक हारमोनियम, एक जोड़ी तबला, बस ये दोनों ही गाने का साथ दे रहे हैं। बालक सब चित्र लिखित से रह गये हैं। बातें करना भूल गये हैं। तारों के समूहों के बीच में चाँद निखर आया है, हिमालय के अधर खुल गये,पर्वतों से हवा चलने लगी है, नीले आकाश से पृथ्वी पर ओस गिर रही है। इस सुन्दर समय रामलीला का पहला गाना स्टेज पर गूंज रहा है। शायद संसार भर में इस समय यही एक ध्वनि हो रही है, जिसके सौन्दर्य सिन्धु में वे कुछ दर्शक चाँदनी में छोटे-छोटे पर्वतों की तरह डूब गये हैं।
स्टेज पर जल्दी-जल्दी दृश्य बदल रहे हैं। कुछ राक्षस जिनके मुख बाँझ के कोयलों की तरह काले हैं, सींगों वाले मुख से विचित्र कर्कश आवाज कर रहे हैं। अरे रे… एक नकाब, उसके मुँह से खुला और लो,गिर गया। अरे यह तो ‘….. कुमार’है! तो क्या यह राक्षस का पार्ट खेल रहा था! उसे सबने पहचान लिया, तालियाँ पिटीं और वह चुपचाप ग्रीन रूम में खिसक गया। पर, कोई (कुछ) बात नहीं, इससे दर्शकों की उत्सुकता घटी नहीं, खेल चल रहा है।
राम-लक्ष्मण। पर यह क्या! राम, कद में लक्ष्मण से छोटे हैं। लक्ष्मण बीस वर्ष के हैं और राम करीब पन्द्रह वर्ष के, पर कोई इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दे रहा है। रामचन्द्र का गला अच्छा है और उन्हें गाना भी बहुत है।
बारह बज गये। बालों में ओस जम गयी। ओस से पलकें झपक रही हैं, जम्भाइयाँ आ रही हैं, सोने का जी करता है, पर यह रामलीला! रामलीला को देखना ही अच्छा है, सोने के लिए फिर समय मिल जावेगा। इस समय सूर्पनखा नासिका भेदन हो रहा है। यह सूर्पनखा बड़ी शैतान की बच्ची है, कैसी उछल कूद मचा रही है,कैसी भद्दी आवाज में गा रही है और यह राम, अरे! ये तो धनुष के भार से झुके जा रहे हैं, शूर्पनखा से डर रहे हैं, पर खैर! शूर्पनखा मारी तो जरूर ही जायेगी, चाहे कितनी ही तगड़ी हो। यह लीजिये, तीर चला और शूर्पनखा चिल्लाती हुई स्टेज के भीतर घुस गयी। खेल खत्म।
आज बस। कपड़ों को झाड़ कर घर को चले। आधी रात में मानव कण्ठों के अनेक स्वर गूंज उठे। सबके सब घर को चले आये। यह पहली रात है ।
अक्टूबर का सुन्दर प्रभात। सोने की किरणें सोई हुई आँखों पर गिर रही हैं, घर भर में सौरभ भर गया है, सारे वन के फूलों के यौवन सन्देश शय्या के आस पास मंडरा रहे हैं। धीरे-धीरे आँखें खुल रही हैं। कल रात की रामलीला की याद आ रही है, रसीली रात, सुकुमार चाँदनी, जो कुरूप वस्तु को भी सुन्दर कर देती है, तारिकाओं का ग्रन्थित मालती-कुंज, बादलों का अलिकित वितान, कद्दाकार राक्षसों की हू-हू। पलकों में रस छलक रहा है, शरीर में पुलक, पर जुकाम लग गया। अच्छा, आज की रात तम्बू में।
तम्बू में आराम है। ऐक्टर्स ऐसे लगते हैं जैसे हिमालय के तुषार पर किरात विचरण कर रहे हों। आज शरीर सुख से है इसलिये कोई चुभती याद नहीं मिल सकती,जो जीवन भर हृदय में कसक कर आनन्द की धारा बहा सके।
आज रामलीला का अन्तिम दिन है। अब रामलीला समाप्त हो जायेगी। आज कुछ लड़के ढोल पीटते हुए सारे बाजार का चक्कर लगा रहे हैं। सन्ध्या का समय है, हिमालय की छाती पर ज्योति रेखा बुझ गयी है (जैसे वासन्ती के अंचल में फूल भर गया हो।) हवा तीक्ष्ण हो गयी है क्योंकि नवम्बर की बर्फीली ऋतु नजदीक ही है। सचमुच आज कुछ उत्साह नहीं है, कोई भी बाहर झाँक कर नहीं देखता ।
पौड़ी में रात पड़ गयी है। दशहरे समाप्त हो गये हैं। अंधेरी सड़क से कुछ कंठ विश्रान्त स्वरों में गा रहे हैं- ‘घड़ी आज की प्यारी-प्यारी मुबारक।’
तुम्हारा
चंद्र कुंवर बर्त्वाल
फोटो इंटरनेट से साभार































