ईश्वरी दत्त जोशी ‘ईश्वर’
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में कृषि का रकबा लगातार घट रहा है। जंगली जानवरों के नुकसान के कारण काश्तकार विवश होकर खेती छोड़ रहे हैं। बंजर भूमि का तेजी से विस्तार हो रहा है। पशुपालन घट रहा है। बावजूद इसके सरकारी आंकड़ों में किसानों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ रही है। इससे कृषि विभाग स्वयं अचंभित है। एक तरफ योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु उसे जमीन में काश्तकार ढूंढे नहीं मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के लाभार्थी किसानों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसने सरकार की कार्य प्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। उत्तराखंड की अब तक की सरकारें खेती -किसानी के प्रति कितनी गंभीर रही हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी यह तय नहीं हो पाया हैं कि यहां भूमिहीन किसे कहा जायेगा, किसान की परिभाषा क्या होगी। भूमि बंदोबस्त व चकबंदी के सवाल तो पहले ही नैपथ्य में डाल दिये गये हैं।
उत्तराखंड पलायन आयोग के अनुसार राज्य में 1726 गांव भूतहा हो गये हैं। कुछ गैर सरकारी संगठन यह आंकड़ा तकरीबन 2000 होने का दावा कर रहे हैं। यदि खेती के आंकड़ों को देखें तो पिछले 24 वर्षों में राज्य में 88141 हेक्टेयर कृषि भूमि कम हो चुकी है। राज्य गठन के समय पर्वतीय क्षेत्र में 5,17,628 हेक्टेयर कृषि भूमि थी, जो अब घटकर 4,29, 487 हेक्टेयर रह गयी है। यहां हर साल औसतन 3672 हेक्टेयर खेती की जमीन घट रही है। दूसरी तरफ यहां किसान सम्मान निधि के लाभार्थियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। अकेले अल्मोड़ा जनपद में आज किसान सम्मान निधि हेतु पंजीकृत किसानों की संख्या 1,12,767 हो चुकी है, जो 2018 में तकरीबन 70 हजार थी। आज राज्य में 8 लाख 28 हजार 787 परिवार किसान सम्मान निधि के लाभार्थी हैं।
यहां सवाल उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? दरअसल इसके मूल में योजना के मानकों में अस्पष्टता, वोटों की राजनीति तथा कृषि के सवालों के प्रति शासन प्रशासन का उपेक्षापूर्ण रवैया प्रमुख कारण रहा है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के मूल में किसानों को आय संबंधी सहायता दिये जाने की भावना बताई गयी है। ताकि काश्तकार समय पर खाद, बीज इत्यादि आवश्यक सामग्री क्रय कर सकें तथा साहूकारों पर उनकी निर्भरता को कुछ हद तक कम किया जा सके। किसान सम्मान निधि के मानकों में भूमि की अधिकतम सीमा 2 हेक्टेयर तो तय कर दी गयी, लेकिन न्यूनतम सीमा नहीं बताई गयी। इस प्रकार यदि किसी व्यक्ति के पास आधा नाली भूमि है तो वह भी किसान सम्मान निधि का हकधारक है, चाहे उस आधा नाली भूमि में उसने मकान ही क्यों न बना लिया हो। ऊपर से किसान की परिभाषा राज्य में आज तक तय नहीं की गयी है। यहां किसान सम्मान निधि का लाभ तमाम ऐसे लोग भी ले रहे हैं, जिनका खेती किसानी अथवा पहाड़ से कोई विशेष लेना देना नहीं रह गया है। वे अपने परिवार के साथ पिछले कई दशकों से देश के अन्य हिस्सों में रह रहे हैं। यहां पहाड़ में खेती तो दूर उनके मकान तक खंडहर हो चुके हैं। ऐसे किसानों को चिन्हित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।
एक ही व्यक्ति को एक ही समय में भूमिहीन तथा किसान दोनों का ही दर्जा दिये जाने का अजूबा भी उत्तराखंड में ही देखने को मिल सकता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में किसान सम्मान निधि के लाभार्थियों की बड़ी संख्या ऐसे किसानों की है, जो कानूनन भूमिहीन हैं। दरअसल उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में सवर्ण परिवारों के पास औसतन 08 नाली भूमि रह गयी है। यहां दलित परिवारों के पास औसतन 02 नाली भूमि उपलब्ध है। तमाम ऐसे परिवार जिनके पास आधी नाली अथवा उससे भी कम भूमि है, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के लाभार्थी हैं। अर्थात् ये सभी किसान हैं। दूसरी तरफ यदि भूमिहीन की बात करें तो राज्य में भूमिहीन की परिभाषा को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। कई विभागाध्यक्षों तथा अधिकारियों से बातचीत करने के बाद भी स्पष्ट जानकारी न मिलने पर जब सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगी गयी तो अपील सुनवाई के दौरान हमें बताया गया कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद इस संबंध में की गयी कार्यवाही की जानकारी अथवा इससे संबधित कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। यद्यपि उत्तर प्रदेश के समय 1987 में जारी शासनादेश की प्रति यह कहकर उपलब्ध कराई गयी कि राज्य गठन के बाद कोई नया शासनादेश जारी न होने के कारण यही शासनादेश प्रभावी माना जा सकता है। इस शासनादेश के अनुसार ”राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए 10 नाली या कम भूमि धारण करने वाले व्यक्ति को भूमिहीन के रूप में माना जायेगा।’’ इस दृष्टि से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में तकरीबन 95 प्रतिशत आबादी भूमिहीन की श्रेणी में शामिल है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में कृषि के साथ ही पशुपालन भी लगातार घट रहा है। यद्यपि पशुगणना 2025 के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं, लेकिन बसौली -ताकुला क्षेत्र के 27 गांवों के आंकड़े बता रहे हैं कि यहां पिछले 05 वर्षों में पशुओं की संख्या में 14.09 प्रतिशत की कमी आई है। वर्ष 2020-21 में इन गांवों में पशुओं की कुल संख्या (बकरी को छोड़) 3605 थी, जो 2025 में घटकर 3097 रह गयी है। सकून इस बात का है कि ग्रामीणों का रुझान बकरी पालन की तरफ बढ़ रहा है। जिस अनुपात में गौवंशीय व महिषवंशीय पशुओं की संख्या घटी है लगभग उसी अनुपात में बकरी पालन बढ़ा है। 2020-21 में इन गांवों में बकरियों की संख्या 3640 थी, जो 2025 में बढ़कर 4250 पहुंच चुकी है। इस प्रकार इन पांच वर्षों में 14.35 प्रतिशत बकरियां बढ़ी हैं।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना तथा मुफ्त का राशन ने भी पहाड़ की खेती को हतोत्साहित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इन योजनाओं ने पहाड़ी किसान की खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता को कमजोर कर उनकी निर्भरता सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर बढ़ाकर खाद्य असुरक्षा बढ़ाने का काम किया है। कोई भी योजना जो हमारी आत्मनिर्भरता तथा स्वाभिमान को कमजोर करे दीर्घकालिक हितकारी नहीं हो सकती है।
यह सर्वविदित है यदि पहाड़ के गांवों से पलायन रोकना है तो शिक्षा व स्वास्थ्य के साथ ही यहां आजीविका के अवसर बढ़ाने होंगे। कृषि व पशुपालन जैसे परंपरागत व्यवसाय का विकास आजीविका संवर्द्धन की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इसके लिए भूमि एवं खेती के सवालों को समग्रता में देखने की जरूरत है। सरकार को चाहिए कि सर्वप्रथम किसान की परिभाषा तय कर प्रत्येक किसान को न्यूनतम भूमि उपलब्ध कराये। यह कार्य भूमि बैंक की स्थापना कर किया जा सकता है। गांव में तमाम ऐसी जमीनें उपलब्ध हैं, जिनके भूस्वामी पलायन कर चुके हैं तथा वह अपनी जमीनें बेचना चाहते हैं। सरकार ऐसी जमीनों को भूमि बैंक के लिए खरीद सकती है। इसके साथ ही गांव की सीमा के भीतर उपलब्ध बेनाप, बंजर व कृषि योग्य भूमि को वन भूमि के दायरे से बाहर कर उसे भूमि बैंक अथवा ग्राम पंचायत के नियंत्रण में दिया जा सकता है। जहां तक जंगली जानवरों से फसल सुरक्षा का सवाल है, यदि सरकार गंभीरता से काम करे तो इस समस्या से छुटकारा पाना नामुमकिन नहीं है।
जंगली सुअर, शेही, हिरन आदि जानवरों से फसल सुरक्षा हेतु घेराबंदी के प्रयोग सफल रहे हैं, जिन्हें बड़े स्तर पर किये जाने की आवश्यकता है। विधायक निधि व सांसद निधि को उपयोग इस हेतु किया जा सकता है। किसान सम्मान निधि के अंतर्गत सिर्फ अल्मोड़ा जनपद में ही 1,12,767 किसानों को एक वर्ष में 67 करोड़ 66 लाख दो हजार रूपयों का भुगतान किया जा रहा है। इस राशि का उपयोग कृषि भूमि घेराबंदी अथवा कृषि विकास के अन्य कार्याें में किया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में जंगली सूअरों द्वारा फसलों को अधिक नुकसान पहुंचाया जा रहा हो, वहां प्रशिक्षित शिकारियों के माध्यम से सुअरों की संख्या नियंत्रित की जा सकती है। साथ ही किसानों के मनोबल बनाये रखने हेतु जंगली जानवरों द्वारा फसल क्षति की दशा में मुआवजा राशि बढ़ाये जाने तथा उसका भुगतान समय पर किये जाने की आवश्यकता है। बंदरों की संख्या नियंत्रित करने हेतु व्यापक स्तर पर अभियान चलाकर उनकी नसबंदी करने तथा विकासखंड स्तर पर बंदर बाड़ों का निर्माण इस दिशा में कारगर कदम होगा। जंगली जानवरों को जंगलों में रोके रखने हेतु यहां किये जाने वाले किसी भी वृक्षारोपण में कम से कम 50 प्रतिशत बमौर, पांगर, आड़ू, काफल इत्यादि फलदार पौधों का रोपण अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके साथ ही प्रत्येक जंगल की धारण क्षमता का अध्ययन कर वहां उससे अधिक जानवर होने पर उन्हें अन्यत्र स्थानान्तरित करने की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है।

































