राजीव लोचन साह
विचित्र स्थिति है देश की। सरकारों द्वारा अबूझ काम किये जाते हैं, अनोखे निर्णय लिये जाते हैं और फिर देशवासियों से अपेक्षा की जाती है कि वे बगैर चूँ किये इन निर्णयों को स्वीकार कर ले। अब यदि मनुष्य के पास अपना दिमाग होगा तो वह सोचेगा ही। सोचेगा कि ऐसा कैसे हो सकता है ? यह बात तो समझ में नहीं आ रही है। मगर सरकार चाहती है कि लोग तर्क का प्रयोग करें ही नहीं। ऐसा आप अक्सर अपने चारों ओर देखते होंगे। चीन हमारा दोस्त नहीं है, यह हम होश सम्हालते ही जानने लगे थे। बीते वर्षों में चीन के साथ रिश्ते कभी नरम तो कभी गरम होते रहे। फिर पाँच साल पहले हमसे कहा गया कि चीन हमारा इतना बड़ा शत्रु है कि हमें उसका बनाया सामान नहीं खरीदना चाहिये। टीवी के पर्दों पर चीन निर्मित टेलीविजन सैटों तोड़ने के दृश्य दिखाई देने लगे। अब इधर एक महीने पहले हमारे प्रधानमंत्री चीन की यात्रा पर गये और हमें बताया जाने लगा कि चीन हमारा दोस्त है। अब एकदम ऐसा कैसे हो गया ? जबकि आॅपरेशन सिंदूर के बाद हमारे सेनाध्यक्ष ने कहा था कि उस लड़ाई में चीन पाकिस्तान के साथ डट कर खड़ा था। ऐसा ही पाकिस्तान को लेकर हो रहा है। पाकिस्तान के साथ लगातार तनाव और युद्धों का एक सिलसिला होने के बावजूद हम कभी नहीं चाहते थे कि भारत पाकिस्तान के बीच हाॅकी या क्रिकेट न खेला जाये। इन मुकाबलों का अपना आनन्द होता था। मगर एक दिन तय कर दिया गया कि दोनों देशों के बीच खेल के रिश्ते खत्म। चलो, यही सही। पड़ौसी देश हमारे वहाँ आतंकवादी भेजने से नहीं रुक रहा है। यदि उसके साथ न खेल कर उसे सही रास्ते पर ले आया जाये तो क्या बुरा है। फिर अचानक मालूम पड़ा कि एशिया कप में भारत और पाकिस्तान की क्रिकेट टीमें आमन-सामने होंगी। खेल तो खेलेंगी, बस खिलाड़ी आपस में हाथ नहीं मिलायेगे। गज़ब! यह कौन सा तर्क हुआ भाई ? या तो खेलो या फिर मत खेलो। मगर आपने तो हमें गधा समझ रखा है। है ना ?

































