विजय सिंह ठकुराय
आइस स्तूप की इस फोटो को लगा कर कई लोगों को सोनम वांगचुक का मजाक उड़ाते देखा – ये भी कोई आविष्कार है कि बर्फ का गोला बना कर जमा दिया? ऐसी चीजों को ईनाम कब से मिलने लगा?
पानी के संकट से जूझ रहा लदाख एक शुष्क शीत मरूभूमि है – वार्षिक वर्षा 50 MM से भी कम। जब शीत ऋतु के बाद खेती का समय आता है तो सिंचाई के लिए जल की समस्या खड़ी हो जाती है। ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर जमें रहते हैं पर निचले इलाकों में बर्फ भी पिघल चुकी होती है। जो थोड़ा बहुत ग्लेशियर से बह कर नीचे पानी आता है, वह भी हर गांव और हर खेत तक पहुंचा पाना संभव नहीं। बड़ी विकट समस्या थी।
अक्टूबर, 2013 में सोनम वांगचुक ने “आइस स्तूप” प्रोजेक्ट शुरू कर के एक बीस फुट ऊंचे आर्टिफिशियल ग्लेशियर को बनाया। आईडिया बेहद आसान था – बर्फ की “एल्बिडो इंडेक्स” सबसे हाई होती है। अर्थात बर्फ सूर्य की 90% किरणों को बिना अवशोषित किये रिफ्लेक्ट कर देती है। शंकु के आकार में ज्यादा से ज्यादा बर्फ इकट्ठी रहेगी और “ब्लेंकेट इफ़ेक्ट” के कारण पिघलने की रफ्तार बेहद कम। हुआ भी कुछ ऐसा ही – सोनम द्वारा बनाया ये बर्फ स्तूप 20 डिग्री तापमान में भी अगले 8 महीने अस्तित्व में बना रहा।
Salt water is the great conductor of electricity – पढा सबने था, पर अप्लाई किया रणछोड़दास श्यामलदास छांछड़ ने। इसीलिए वो काबिलेतारीफ था।
अब तक लदाख में पचासों ऐसे स्तूप बनाये जा चुके हैं, जो डेढ़ लाख लीटर से लेकर 8 लाख लीटर तक सिंचाई जल उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। अर्थात एक तरह से सोनम ने एक झटके में करोड़ों लीटर पानी बचा कर हजारों लदाखियों की जिंदगी बदल दी।
आपको ये तारीफ के काबिल न लगे तो कोई बात नहीं। सोनम ने कम से कम इतना तो किया। आप सोनम पर बात मत करिए। लदाख में 35 गीगावाट की सोलर परियोजना स्थापित कर चारागाह भूमि छीन लेने पर बात मत करिए, इस योजना के ग्लेशियर पर होने वाले इम्पैक्ट पर बात मत करिए, पर कम से कम इतना ही बता दीजिए कि इस परियोजना के लिए पानी कहाँ से आएगा?
अगर इस परियोजना के शुरुआती हिस्से में लगने वाले 9 गीगावाट सोलर बिजली उत्पादन की ही बात करें तो सोलर पैनल क्लीनिंग के लिए ही हर हफ्ते बीस करोड़ लीटर जल चाहिए। लदाख जैसे इलाके में यह और ज्यादा हो सकता है। कितना भी AI लगाओ, रोबोटिक्स घुसेडों, ड्राईक्लीनिंग आजमाओ, पानी बचाओ – पानी खपत 99% भी घटा दी तो भी हर हफ्ते बीसियों लाख लीटर पानी चाहिए ही चाहिए।
पहले से ही जलसंकट से जूझ रहे लदाख में कहाँ से लाओगे ये पानी? किसी नेता ने बताया है? नीति आयोग ने बताया है? सोलर प्रोजेक्ट में इसका जिक्र है? हो तो दिखाओ। फिर पूछते हो कि लदाख तुम्हारी परियोजनाओं का विरोध क्यों करता है? छठी सूची क्यों मांगता है?
या तो सिंधु नदी से पानी लाओगे पर उसके लिए रेज़र्वेयर बनाना, पानी सप्लाई बढाना दूर की कौड़ी है। ऊपर से ऐसा करते ही पाकिस्तान और चीन तुम पर चढ़ने लगेंगे। इनसे निपटने की तुम्हारे अंदर कितनी इच्छाशक्ति है, ये तुम अमेरिका से आई एक फोन कॉल पर सरेंडर कर के और फट से जिनपिंग से झप्पियाँ डाल कर दिखा चुके हो।
दूसरा तरीका भी है – बर्फ के स्तूप बनाओ।
पर दूसरा तरीका अपनाया तो आंखों में थोड़ी शर्म होगी या नहीं?
यह पोस्ट फेसबुक से साभार ली है।

































