शेखर पाठक
हिमालय ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि मेरे को समझने की कोशिश नहीं करोगे और अपने घमण्ड में जमे रहोगे तो मैं फिर किसी नए रौद्र रूप में प्रकट हो सकता हूं। हिमालय ने यह भी कहा कि तुम कुछ भी गलत नहीं करोगे तो भी अपनी भूभौमिक संरचना और धरती का तापमान बढ़ने के कारण मुझे अनेक बार कांपना, टूटना, रोकना और लुड़कना पड़ता है। इस बार इस चेतावनी का माध्यम बनी वह बड़ी त्रासदी, जिसे सही अर्थों में ‘हिमालयी सुनामी’ कहा जा सकता है। इसने तिब्बत-नेपाल सीमा पर चट्टान और बर्फ पगे उच्च लांगटांग (7245 मी.) पर्वत की उत्तरी तरफ की एक बांह के टूट-खिसक कर नीचे घाटी में गिरकर, लेंडे खोला नदी में एक झील बना और फिर उसे तोड़कर पहले लेंडे खोला, फिर भोटे कोसी, त्रिशूली और नारायणी से होकर पूरी पर्वत घाटी को उजाड़ के रख दिया। जैसा कि ‘हिमाल’ के सम्पादक कनक मणि दीक्षित ने लिखा है कि पहाड़ के टूटकर नदी को रोकने और फिर बाढ़ का रूप लेकर इतना विनाश करने की घटना से पहले ‘यह एक मानवीय त्रासदी है’।
पहले समझें भूगोल
उच्च हिमालय में तिब्बत-नेपाल सीमा पर भूकम्पों और भूस्खलनों के इतिहास से भरा यह क्षेत्र एक जटिल भूगर्भ और एक कठिन भूगोल है। यहां नेपाल की सीमा तिब्बत (चीन) से जल विभाजक धार की नहीं बल्कि नदी के आरपार की है। चर्चित लेंडे खोला (डोंगलिन) तिब्बत के किरोंग क्षेत्र में जन्म लेकर तिब्बत-नेपाल सीमा (लगभग 20 किमी.) बनाती है। रसुवागढ़ी में किरोंग खोला (भोटे कोसी) से संगम बनाकर नेपाल में प्रवेश करती है। रसुवागढ़ी पुराना स्थान है, नेपालियों के लिए महत्व का। जैसे तिब्बतियों के लिए किरोंग। 1792 में यहीं पर नेपाल और तिब्बत का युद्ध हुआ था, जिसमें नेपाल की पराजय हुई थी। पुराना किला था यहां, जिसका जंग बहादुर ने 1855 में पुनर्निर्माण किया था। पंडित नैन सिंह रावत 1864 में यहां और किरोंग आया था। उसने यहां किला देखा। सुवागढ़ी-किरोंग एक ऐतिहासिक मार्ग है और तिब्बत के सातवीं सदी के नामी शासक सौंगस्टन गाम्पो के जमाने से इसकी चर्चा होती है।
यहीं पर यात्री या व्यापारी पुल पार करके तिब्बत में प्रवेश करते हैं। यहां पर आप्रवासन दफ्तर है। आदमी और सामान जो भी आ या जा रहा हो उसकी पड़ताल होती है। भोटे कोसी आगे त्रिशूली बन जाती है। त्रिशूली में बूढ़ी गंडकी, तस्र्यांगडी, सेती और काली गंडकी मिलती हैं। देवघाट में नारायणी (सप्त गंडकी) बन जाती है। फिर चितवन नेशनल पार्क होकर गंडक बन कर भारत में चली आती है।
इस आपदा का जहां जन्म हुआ, वह क्षेत्र बहुत संवेदनशील है। पिछले ही साल 8 जुलाई 25 को यहां पर बाढ़ आई, जिसमें 18 लोगों की मृत्यु हुई थी। नेपाल-तिब्बत मार्ग, चैक पोस्ट, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और ट्रान्समीसन लाइनों को इसने ध्वस्त किया। पार साल तिब्बत में क्या हुआ, इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं है। पर चीन की तरफ से अग्रिम चेतावनी मिली थी। इस बार यह नहीं हो सका। संभव हो एक साफ और वर्षा रहित दिन ऐसा होने की उम्मीद नहीं थी।
जितनी जल्दी यह हुआ उसको सूचना तंत्र में नहीं पिरोया जा सका। पर अगले ही दिन चीन की तरफ से तुरन्त यह सूचना आई कि भोटे कोसी की दो सहायक नदियों -टुश्चेन और पुरेपू- में भूस्खलन के कारण दो ताल बन गए हैं। अतः नेपाल सावधानी रखें। तिब्बत में भी निश्चय ही आदमियों की जान की ख्यानत हुई और सम्पत्ति स्वाहा हुई। इसकी आधिकारिक सूचना का इन्तजार है।
सुनामी का जन्म
26 अगस्त 26 एक कठिन दिन था। शुरूआत नीले आसमान के नीचे एक खुले दिन के रूप में हुई। तिब्बत का यह मार्ग चहल पहल भरा था। साफ मौसम में चैक पोस्ट में कैलास मानसरोवर और तिब्बत के अनेक स्थानों की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की भीड़ थी। अनेक सालों से कोदारी-खासा मार्ग के बन्द होने के कारण यही तिब्बत जाने का अकेला मार्ग है। सुबह नेपाली समय के अनुसार 8.37 बजे लांगटांग (7245 मीटर) पर्वत की उत्तरी ढाल में बर्फ और चट्टानों के एक बड़े खण्ड ने लेंडे खोला नदी में तेजी से लुड़क कर एक झील बना दी। 0.2 वर्ग किमी का यह खण्ड सीधे और तेजी से 2270 मीटर (7445 फीट) नदी तक आया। इसके घर्षण और गिरने से वैज्ञानिकों के अनुसार 5.2 रिचर पैमाने का भूकम्प आया, जिसका टैक्टोनिक्स से सम्बंध नहीं बताया गया। फिर यह पानी, मलवा, मिट्टी, चट्टानें आदि की, जिसे बाढ़ का मालमत्ता (फ्लड मैटीरियल) कहा जा सकता है, एक दीवार सी बनकर पूरी घाटी को रौदता-पोछता चला गया। पानी और तमाम चीजों की यह दीवार कहीं कहीं 9-10 मीटर (29-32 फीट) तक ऊपर चली गई थी।
ग्यारह साल पहले 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में 7.8 पैमाने का भूकम्प आया। यह 1934 के बाद का सबसे बड़ा भूकम्प था। इसमें 9000 से अधिक लोग मारे गए और नेपाल, भारत, चीन, बंाग्लादेश में 22000 से अधिक घायल हुए। इस समय भी लांगटांग पर्वत के दक्षिणी ढाल में स्थित लांगटांग गांव एक भूस्खलन के नीचे दब गया और 300 ग्रामीणों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
लांगटांग निरुल शिखर नेपाल में है और उससे लुड़के बर्फ और चट्टानों ने लेंडे खोला को अवरुद्ध कर झील का निर्माण किया। यह झील टूटी तो पानी, मलवा, बर्फ, चट्टानों का एक विशाल और डरावना दैत्य घाटी को ध्वस्त करता हुआ आगे बढ़ा। रसुवागढ़ी पर इस दैत्य ने पहले भोटे कोसी के प्रवाह को रोका और उसे पीछे धकेला। इस पानी-मलवे ने एक और दैत्य बन मुख्य दैत्य की ताकत बढ़ा दी। अनेक गांवों के साथ रास्ते में तिमुरे, वस्त्रावती, सिब्रुवासी, ढंूगे और नुवाकोट जैसे अनेक कस्बे भी इस प्रलय प्रवाह की जद में आये, जो सभी जिला रसुवागढ़ी में थे। नुवाकोट, ढाडिंग तथा नवलपरासी जिलांे के अनेक स्थानों में घरों, पुलों, सड़कों और परियोजनाओं और उनके सामान को साथ ले कर विनाश करता हुआ दैत्य आगे बढ़ा। भारत में गंडक में मृत मानव शरीर तैरते देखे गए।
वैज्ञानिकोें ने प्लेनैट लैब्स और अन्य उपग्रहों से लिए गए चित्रों के आधार पर अपना विश्लेषण किया। पहले भूकम्प आया कहा गया। फिर कहा गया कि बर्फ-चट्टान के लुड़कने के बाद आया। हम इस बहस में नहीं पड़ते। पर यह स्पष्ट है कि अभी पुरानी और ताजा बर्फ अपनी जगह मजबूती से नहीं खड़ी थी। इस प्रक्रिया पर पृथ्वी के बढ़ते तापमान का असर था।
जन धन की हानि
26.8.26 की बाढ़ ने 7 सितम्बर 2026 तक 1400 (1357 नेपाल में और 43 तिब्बत में) से अधिक मानव जीवन लील लिये थे। सरकारी सम्पत्ति (दफ्तर, स्कूल, सड़क, पुल, जलविद्युत और सौर ऊर्जा परियोजनाएं), निजी सम्पत्ति (घर, दुकान, कुटीर उद्योग, होटल तथा रेस्त्रां आदि) तथा सामुदायिक सम्पत्ति (मंदिर, चोर्तन, घरांट, पंचायत घर आदि) का अपार नुक्सान हुआ, जो अरबों डालर (4-5 बिलियन डालर के नुक्सान का अनुमान नेपाल के वित्तमंत्री ने लगाया है) में होगा। पालतू और जंगली जानवर मारे गए। मछलियोें पर क्या गुजरी होगी हमारी सोच में ही नहीं आता। इस आपदा में मारे गए और उजड़े लोग मूलतः खेतीहर किसान, पशुपालक, पशुपालक और व्यवसाई थे। कैलास मानसरोवर यात्रियों और पर्यटकों की संख्या भी अभी अच्छी खासी थी क्योंकि इस मार्ग से हजारों यात्री हर साल कैलास मानसरोवर तथा अन्य तीर्थों की यात्रा में जाते हैं। यह बताया गया कि 32 देशों के 1600 से अधिक लोग (300 भारतीय) अभी लापता हैं। 1000 से अधिक नेपाल में और 600 तिब्बत में। यह आकड़ा बढ़ता और बदलता जायेगा।
इस आपदा ने कुछ कम बरबादी की होती यदि तिब्बत और नेपाल में विकास का माॅडल क्षेत्र के भूगर्भ, भूकंपीयता, भूगोल और बाढ़ के इतिहास की पड़ताल करने के बाद बनाया गया होता। राजव्यवस्थाएं अनपढ़ तो नहीं होती पर ज्यादा चतुराई दिखाती हैं और सबक नहीं सीखती हैं। अभियांत्रिकी बदलते पर्यावरण के आलोक में बदल नहीं पाती है। आपदा ने कुछ ही मिनटों में 12 जलविद्यत योजनाओं (जिनमें आठ चालू और शेष निर्माणाधीन थी) को ध्वस्त कर दिया। इनमें 111 मेगावाट की रुसुवागढ़ी, 120 मेवा की रुसुवागढ़ी भोटे कोसी, 216 मेवा की अपर त्रिशूली1, 22 मेवा की चिलमे, 20 मेवा की लांगटांग परियोजना भी थीं। बड़ी मशीनें, बुलडोजर, ट्रक, ट्रान्समीसन लाइनें, बिजली के सब स्टेशन, 41 पुल आदि अधिकांश पूरी तरह बरबाद और बचे हुए बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। नुवाकोट स्थित 25 मेगावाट की सफल सोलर परियोजना मलवे के नीचे दब गई। 100 किमी. से अधिक हाईवे बरबाद हुआ। त्रिशूली हाइड्रो परियोजना तथा अन्य सुरंगों में 917 (70 भारतीय) मजदूर जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। कुल 669 मेवा बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है।
यह अनुमान लगाया गया कि 100 से 200 मिलियन यानी 10 से 20 करोड़ क्यूबिक मीटर मलवा, मिट्टी, साद, पेड़, मशीनें आदि नदी अपने प्रवाह के साथ बहा ले गई। इस प्रवाह की गति 193 किमी. प्रति घंटा निकाली गई है। जिस पर विश्वास नहीं होता है। इस गति से पहाड़ों में कोई वाहन भी नहीं चल सकता। जल्दी ही यह आपदा दैत्य रसुवागढ़ी चैक पोस्ट पर पहुंचा। अगले दिन जब चीनी अधिकारियों ने यह बताया कि भोटे कोसी की दो सहायक नदियांे में दो झीलें बन गईं हैं और टूटने का खतरा है, तो राहत में लगे और बच गये नागरिकों को और भयभीत होना पड़ा।
यह याद दिलाना जरूरी होगा कि नेपाल की यह आपदा जेन जेड आन्दोलन के प्रभाव में नए चुनाव कराये जाने की घोषणा के ठीक एक साल बाद और जनवरी में चुनाव में बालेन्द्र शाह के दल राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की जीत और बालेन्द्र शाह के प्रधानमंत्री बनने के 6 माह बाद आई है। महज 6 माह की सरकार नई चुनौतियों से घिर गई है। यानी खोज, बचाव और पुनर्वास की चुनौतियां। सड़क पर आ गये परिवार और बच्चे। आर्थिक ध्वंश। अभी नेपाल 2015 के भूकंप और पिछले सालों की बाढ़ों के घावों से ही पूरी तरह नहीं उबर सका है।
संवाद और तालमेल
अब नेपाल ने तो सोचना-विचारना है ही कि आपदा के दुष्प्रभावों से कैसे निपटे और आगे के लिए क्या सबक ले और क्या सावधानियां बरतें ? दरअसल अभी सभी हिमालयी देशों-अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, म्यानमार, बांग्लादेश और चीन- के बीच व्यापक संवाद होना चाहिए। क्योंकि हमारेे पर्वत और नदियां साझा हैं। हमारा प्रदूषण साझा है, क्योंकि वह बिना अनुमति के सीमा पार कर सकता है। हमारी नदियां तीन-चार देशों से होकर गुजरती हैं। नदियां तो अनेक देशों में बहने वाली जीवन रेखाएं हैं, जो पानी, ऊर्जा, मिट्टी, साद और मछलियों के साथ प्रवाहित होती है। बाढ़ भी उनके मिजाज का एक रूप है। नदियों के किनारे मेले उत्सव होते है। एक पवित्रता उनके साथ जुड़ी होती है। स्नान से श्मशान तक उनसे जुड़े हैं। नेपाल, अन्य हिमालयी देशों और प्रान्तों को ऐसी रणनीति बनानी होगी जो भूकंप, बर्फ और चट्टानों के गिरने, झील बनाकर प्रलयंकरकारी बाढ़ों को जन्म देने वाली तथा जलवायु परिवर्तन जनित आपदाओं से निपट सके। ये आपदाएं भविष्य में बढ़ती ही जाने वाली हैं। अतः जिन्दगियां बचाने का रास्ता खोजना जरूरी है।
नेपाल का भारत तथा चीन से तो तुरन्त संवाद होना चाहिए क्योंकि हमारी अनेक नदियां तीनों देशों में बहती हैं। पर इसका संदर्भ पूरा हिमालय हो। ब्रिक्स सम्मेलन में इस पर चर्चा होनी चाहिए। चीन भारत तो उसमें होंगे ही, नेपाल भी आमंत्रित देशों में होगा। नेपाल को जलवायु परिवर्तन या पर्यावरण सम्बंधी अन्य सम्मेलनों, फोरमों या संयुक्त राष्ट्र में भी अपनी दिक्कतें प्रभावशाली तरीके से रखनी होंगी। इसी माह नेपाल के युवा प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र में अपना पक्ष रखेंगे।
आपदा ने नेपाल के राजनैतिक, सामाजिक, सामुदायिक और सांस्कृतिक-धार्मिक नेताओं को भी यह मौका दिया है कि वे अपने देश के लिए विकास का अधिक सुरक्षित और सर्वमान्य माॅडल विकसित करंे। सबसे ज्यादा युवाओं ने इस पर सोचना है। नेपाल में टिकाऊ खेती, कुटीर उद्योग, पशुचारण-मौसमी प्रवास, तीर्थाटन-पर्यटन के साथ ऊर्जा उत्पादन इस माॅडल के केन्द्र में होने चाहिए। कहीं और के लिए बनी परियोजनाएं नेपाल या अन्य हिमालयी क्षेत्रों पर थोपने की गलती फिर नहीं की जानी चाहिए। ‘स्माल इन ब्यूटीफुल’ और ‘जी.एन.एच.’ (सकल राष्ट्रीय खुशहाली) का विचार पहाड़ों और नाजुक क्षेत्रों के लिए ही है। हो सकता है कि ये विचार शत प्रतिशत लागू न हो सकें पर जितना संभव हो कोशिश होनी चाहिए। अभियांत्रिकी और तकनीकें पहाड़ों की दिक्कतों को सुलझाने के लिए इस्तेमाल हों, उन्हें चुनौती देने के लिए नहीं।
पर्यटन, तीर्थाटन के साथ कुटीर या मझले उद्योगों को विकसित कर, जो नेपाल या पर्वतीय क्षेत्रों का मूल धन और मूल प्रवृत्तियां हैं उन्हें सुरक्षित रखना जरूरी है। ये मूल धन है खेती, पशुपालन, बागवानी, जड़ीबूटी, स्थानीय संसाधनों से जुड़े कुटीर उद्योग। ये दरअसल पर्यटन-तीर्थाटन के आधार भी हैं।
आपदाएं और बाढ़ मनुष्य से पुरानी
विभिन्न आपदाएं और बाढ़ प्राकृतिक घटनाओं की तरह पृथ्वी में मनुष्य के आने से पहले से प्रचलन में हैं। यह पृथ्वी की अनेक ऊर्जाओं की टकराहट का परिणाम भी हैं। हिमालय एक बड़ी भूगर्भीय यात्रा के बाद बना है। अभी भी बनने और ऊपर उठने में है। भूकंप, भू तथा हिमस्खलन, ग्लेशियरों का पीछे सरकना, बर्फीले तूफान, बाढ़, दावानल आदि उसके स्वभाव के हिस्से हैं। मनुष्य ने इनको नियंत्रित करने में आंशिक सफलता भी नहीं पा सकी है। इसलिए वह बचाव और जानमाल की हिफाजत के रास्ते ढूढने की कोशिश करता है।
पहाड़ों में बसासतों और खेती के विकास के साथ पहला मनुष्यकृत मिट्टी अपरदन शुरू हुआ होगा। मानसून द्वारा संचालित ईको तंत्र में बाढ़ के अनेक मायने हैं। बाढ़ भूआकृति को बदल सकती है। बाढ़ निश्चय ही बर्षा और जलचक्र के साथ जलागम की स्थिति, अति वर्षा, भूजल की स्थिति, वानस्पतिक आवरण, ढाल और भूकंपीयता से प्रभावित होती है। नदी के प्रवाह क्षेत्र में मनुष्य द्वारा बनाई गई संरचनाएं या किए गए काम-जैसे बांध, बैराज, अनियंत्रित खनन, वन विनाश, जलागम का कमजोर होना, नदी तटों पर अनेक प्रकार की घुसपैठ का होना और सर्वाधिक जलवायु परिवर्तन का असर भी नदी के व्यवहार को बदलता है। ये सभी कारक नदी को आक्रामक बनाने में योगदान देते हैं।
मनुष्य नदी के व्यवहार, पानी की मात्रा और रंग में फर्क आदि को बहुत ध्यान से देखता आ रहा है। बाढ़ को समझते हुए वह नदी के पाट या प्रवाह क्षेत्र में घुसपैठ नहीं करता। एक समय छोटी बाढ़ों का मैदानों में इन्तजार किया जाता था क्योंकि वह बहुत उर्वरा मिट्टी को साथ लेकर आती थीं। पहाड़ों में बाढ़ें ही सेरों या बगड़ों की रचना करती हंै। इसी तरह उच्च हिमालय के निवासी ग्लेशियरों या हिमस्खलनों के मिजाज को समझते हैं। लेकिन मनुष्य अतिक्रमण करने का भी शौकीन है। कभी कभी यह विवशता भी होती है। वह उन अलिखित नियमों और परम्पराओं को भी अनेक बार मानने से इन्कार कर देता है, जिनको वह अर्से से बिना संशय के मान रहा था। इसलिए सामाजिक, सामुदायिक तथा राजनैतिक नेताओं की सदा जरूरत बनी रहेगी, जो लोगों को लगातार ‘लक्ष्मण रेखा’ न लांघने की याद दिलाते रहें। यह काम शिक्षा तथा पारिवारिक संस्कारों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। बच्चों और युवाओं के बीच भी यह विचार जाना जरूरी है।
हिन्दुकुश हिमालय क्षेत्र में एक और बड़ी समस्या है। वह है खेती की जमीन का कुल 5 प्रतिशत होना। ज्यादातर उपजाऊ जमीन नदी घाटियों में है और शेष खेती सीड़ीदार खेतों में होती है। यही जमीन व्यक्तिगत स्वामित्व की है। अनेक बार इस दबाब में अतिक्रमण होता रहा है और उसकी कीमत भी चुकाई जाती रही है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस जमीन पर सबसे बड़ा अतिक्रमण तथाकथित ‘विकास’ का है। जमीन, जंगल और पानी के साथ वन्यता और जैवविविधता पर लगातार हमले हो रहे हैं। से सभी हिमालय के आधारभूत संसाधन हैं, पर इन पर ‘विकास’ का प्रहार है। विकास जरूरी है पर विकास के अधिकांश माॅडल हिमालय की पारिस्थितिकी के खिलाफ हैं। ये हिमालयी प्रकृति और मनुष्य पर थोपे जाते हैं।
आधुनिक अभियांत्रिकी कई मामलों में उपयोगी है पर हिमालय के लिए उसका कुछ उदार और समावेशी रूप चाहिए। हमारी अति केन्द्रीकृत राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं कभी भी वैकल्पिक माॅडल पर विचार नहीं करती हैं। हमें विकास की ऐसी पद्धति चाहिए जो उस हिमालयी क्षेत्र के लिए माकूल हो, जो एक युवा, नाजुक, भूकम्प, भू और हिमस्खलनों से पीड़ित होने के साथ दुर्गम, पवित्र, सुन्दर और तमाम भूगर्भीय भ्रंशों के उपर बैठा हुआ है। ऊपर से जलवायु परिवर्तन की धारदार तलवार लटकी है। ये कठिन स्थान मुख्य केन्द्रीय भ्रंश यानी एम.सी.टी. के आसपास हैं, जो हिमालय का सबसे हलचल भरा भ्रंश माना जाता है।
तिब्बत तथा हिमालय या कि भारतीय उपमहाद्वीप अनेक भू-भौमिक, जलवायुगत, पारिस्थितिक तथा कृषि क्षेत्रों में विभाजित है। अलग अलग क्षेत्रों में इसकी नदियों का मिजाज अलग अलग है। उच्च हिमालय में ज्यादातर ट प्रकार की घाटियां हैं, जो सकरी हैं। बर्फ और चट्टानें टूटकर जब नीचे लुड़कती हैं तो कुछ समय के लिए नदियों को रोक देती हैं। यह झील टूटने के बाद नीचे घाटी में कहर ढाती है। ऐसे उदाहरण अब प्रत्येक व्यक्ति को पता हैं। होने चाहिए। उनको गिनाने की जरूरत शायद नहीं है। तिब्बत एक पठार है और वहां तक मानसून की पहुंच नहीं है। नेपाल और उत्तराखण्ड के अनेक क्षेत्र भूविज्ञानियों और भूकम्प विशेषज्ञों के अनुसार भूकंपीय अन्तराल क्षेत्र (सैस्मिक गैप एरिया) हैं। अर्से से कोई बड़ा भूकम्प आकर भूगर्भीय ऊर्जा को मुक्त नहीं कर सका है। इस ऊर्जा का जमा होते जाना नये बड़े भूकंप के जन्म का कारण बन सकता है। यह भी स्पष्ट है कि बर्फ, हवा और सूरज अपने प्रभाव से चट्टानों को चटखा और झीला कर सकते हैं।
पिछले जून माह में मेरी कोलोराडो विश्वविद्यालय के भूविज्ञानी और भूकंप विशेषज्ञ प्रोफेसर रोजर बिल्हम से उनकी स्टडी-प्रयोगशाला में मुलाकात हुई। वे 24 जून 26 को सैन्फ्रैन्सिसको और नवादा में आये भूकम्प की रिकार्डिग अपने भूकंप मापक यंत्र में हमें दिखा रहे थे। उनका कहना था कि दुनियां के अनेक क्षेत्र भूकंप से पीड़ित-प्रभावित हैं। सरकारें बहुत कम संवदेनशील हैं। सरकारें अमेरिका की हो या चीन, भारत और नेपाल की, वे आपदा के आने के बाद जागती हैं। कभी कभी आपदाओं का निर्माण भी करती हैं। वे नेपाल के पश्चिमी और उत्तराखण्ड के उत्तर-पूर्वी हिस्से को ‘सैस्मिक गैप ऐरिया’ के अन्तर्गत रखते हैं। जिस खतरे को प्रोफेसर विनोद गौड़ और प्रोफेसर के.एस. वल्दिया भी दोहराते रहे हैं। ‘सैस्मिक गैप ऐरिया’ वे क्षेत्र हैं, जहां पिछली सदियों में कोई बड़ा भूकम्प नहीं आया है। भूगर्भीय ऊर्जा मुक्त न होकर इकट्ठा होती रहती है। और कभी वह 8 पैमाने के भूकंप को जन्म दे सकती है।
कुछ उदाहरणों से समझें
पुरानी आधारभूत बर्फ (पर्माफ्राॅस्ट), ताजा बर्फ और पानी का फर्क समझते हुए बात करें। उच्च हिमालय और गलों में आधारभूत बर्फ के ऊपर ताजा बर्फ बैठ जाती है। पर पानी अपने बहने की राह खोजते हुए निकल जाता है। अगर तापमान बढ़ने से उच्च स्थानों पर ओलों या बर्फ के स्थान पर बारिश होने लगे तो पानी की ध्वंशात्मक शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
16-17 जून 2013 को याद करें जब केदारनाथ में बारिश हुई। संभवतया चोराबाड़ी ताल में भी, जहां मोरेन और बड़े पत्थरों से बना प्राकृतिक बांध टूट गया। ताल छोटा था लेकिन बारिश बहुत थी। फैलाव होने के बावजूद केदारनाथ का बड़ा हिस्सा बह गया। लेकिन अधिक विनाश रामबाड़ा और गौरी कुंड में हुआ, जहां मंदाकिनी सकरी घाटी में बहती है। वहां से नीचे बैराज और सुरंगोें के मक-मलवे ने त्रासदी को बहुगुणित कर दिया। पर याद रहे विनाश का नेतृत्व 24 घंटे में हुई 400 मिमी. बारिश ने किया। ऐसा ही बिरही में 1970 में हुआ, जब 77 साल पहले एक बड़े भूस्खलन से बने गौनाताल के टूटने से पूरी अलकनन्दा घाटी व्यापक ध्वंश का शिकार हुई। हरिद्वार तक उसका असर गया।
दूसरा उदाहरण रौंटी पर्वत से बर्फ और चट्टानों के लुड़कने के बाद ऋषिगंगा में 7 फरवरी 2021 को बनी झील के टूटने के बाद हुए विनाश से जुड़ा है। ऋषिगंगा नन्दादेवी अभयारण्य से आने वाली अकेली नदी है और रेणी में यह धौली से मिलती है। जैसे ही ऋषि गौर्ज से नदी बाहर निकली पहले उसने रेणी स्थित छोटी बिजली परियोजना को ध्वस्त किया। फिर तपोवन विष्णुगाड़ परियोजना को ध्वस्त करते हुये उसकी लगातार निर्मित हो रही सुरंगों में साद-मिट्टी भर दी। 220 से अधिक श्रमिक सुरंगों में मारे गए। आगे भी बाढ़ ने कटान किया। वैज्ञानिकों ने यह बताया कि 27 क्यूबिक मीटर बर्फ और चट्टानों ने जो झील बनाई उसके मलवे, मिट्टी, चट्टानों ने दैत्याकार होकर बहना शुरू किया। धौली के पानी ने उसे अतिरिक्त गति दी। यह दैत्याकार मालमत्ता 24 फीट पर लटके विष्णु प्रयाग के पुराने झूला पुल के पट्टे भी बहा ले गया। हो सकता है धंसते जोशीमठ पर भी इसका असर गया हो। फिर श्रीनगर बैराज तक जाकर ही अलकनन्दा शांत हुई।
इसी तरह की घटना 1978 की भागीरथी बाढ़ थी। एक छोटी और गैर बर्फानी कनोडिया गाड़, जिसको पहले एक भूस्खलन ने रोक कर झील बना दी थी, ने भागीरथी को अनेक घंटों तक अपनी टूटी झील के मलवे से रोक कर और फिर विशाल मालमत्ते (फ्लड मैटीरियल) के साथ अपने बनाये बांध को तोड़कर भागीरथी घाटी को विनष्ट किया। 2011 में ऐसा ही असीगंगा ने किया था।
पृथ्वी का तापमान बढ़ने और उच्च हिमालय में कम बर्फवारी होने से अनेक बार ग्लेशियरों के छोटे छोटे ताल बड़े होने लगते हैं। कभी कभी एक दूसरे से मिल कर खतरा बनते हैं। 3-4 अक्टूबर 2023 को ऐसा तीस्ता नदी के दक्षिणी ल्होनक ग्लेशियर की झील के फटने से सिक्किम में हुआ। जान माल की हानि के साथ रु. 14000 करोड़ लागत का और 1200 मेगावाट बिजली उत्पादन की उम्मीद वाला तीस्ता 3 बांध ध्वस्त हो गया। यह स्पष्टतः ळस्व्थे (ग्लेशियर झील के टूटने से आई बाढ़) का मामला था। इस झील की जानकारी थी, पर उसके खतरे को नहीं समझा गया। दूसरी तरफ उस इलाके के वाशिन्दों यानी लेप्चा समुदाय के निवेदन को नहीं सुना गया। यह समुदाय तीस्ता के बाढ़ भरे अतीत से सुपरिचित था।
तापमान बढ़ने से पिघले बर्फ से निकले पानी की मात्रा सामान्य ग्लेशियर से निकल रहे पानी से 1.6 गुना ज्यादा हो जाती है। इससे ग्लेशियर झील विस्फोट (ळस्व्थ्े) होने का जोखिम अपरिहार्य है। हिमालय में यह बढ़ता ही जायेगा। ऐसी ही घटना 5 मई 2012 को नेपाल में हो चुकी थी, जब अन्नपूर्णा क्षेत्र में झील टूटने से पोखरा में आई बाढ़ में 60 लोगों की मौत हुई। सन् 2100 तक बिना ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित किए हिमालय की 66 प्रतिशत बर्फ समाप्त हो सकती है, ऐसा निष्कर्ष 200 वैज्ञानिकों ने 5 साल के अध्ययन-विश्लेषण के बाद चेताया है। यह एक डराने वाला कठिन अनुमान है।
हिमाचल की ब्यास और पार्वती नदियों की चर्चा करें। ब्यास रोहतांग दर्रें के पास ब्यासकुड नामक ग्लेशियर ताल से और पार्वती पिन-पार्वती दर्रे के पास मनतलाइ ग्लेशियर से निकलती है। कुल्लू में दोनों का संगम होता है। दोनों नदियों के जलागम और किनारों में बहुत अतिक्रमण पिछले दशकों में होता रहा है। ब्यास की सितम्बर 1995 की बाढ़ ने जनधन की बहुत हानि की। 1996 में न्यायालय (एम.सी. मेहता वनाम कमलनाथ केस) के हस्तक्षेप से इस पर रोक लगी। अखबारों में यह हेडलाइन छपी थी कि नदियां मंत्रियों के लिए नहीं होती हैं, क्योंकि प्रभावशाली नेता के परिवार ने यह अतिक्रमण किया था। इन दोनों नदियों में बाढ़ का मुख्य कारण नदी के किनारे राजमार्ग बनने, निर्माण कार्य होने, और रोहतांग दर्रे के नीचे बड़ी सुरंग आदि से निकले मक-मलवे का नदी में जाना था। जलागम में निर्माण, भूकटाव और जलवायु परिवर्तन भी इससे जुड़ा था। 1 अगस्त 2024 को पार्वती नदी में स्थित मलाणा बांध के टूटने ने इसमें योगदान दिया। इस घाटी में 2022 से 25 तक लगातार चार साल आपदा आई। जानमाल की अपार हानि हुई। स्पष्ट ही इसमें ळस्व्थ् कारण नहीं था।
नेपाल तथा हिन्दुकुश हिमालय क्षेत्र
नेपाल की यह सुनामी उच्च हिमालय में बर्फ और चट्टानों के लुड़कने से बनी झील के टूटने से आई बाढ़ के परिणामों को समझने का मौका देती है ताकि भविष्य के लिए सबक लिये जाय। यह आपदा हिमालय के उन खतरों से भी जुड़ी है जो ग्लेशियरों में झील बन जाने और उनके जल्दी टूट जाने और उन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव होने की संभावना के कारण पहले से सावधानी बरतने का और विज्ञान सम्मत नियोजन करने का संदेश देती है। सितम्बर 2024 में नेपाल में 170 नागरिक वर्षा और बाढ़ के कारण मारे गए थे। भूस्खलनों में अन्य अनेक जानें गईं। अकेले काठमाण्डू में ही बाढ़ से 48 नागरिक मारे गए। कोसी और गण्डक ने कितनी ही बार खतरे के निशान को पार किया। 30 लाख नागरिकों पर बाढ़ का असर गया। उत्तर प्रदेश बिहार में भी विनाश हुआ।
मई-जून 2015 में ज्यादा सुपरिचित दूसरी भोटे कोसी नदी में भूकंप के कारण भूस्खलन हुए और बाढ़ आई। जिससे तातोपानी/कोदारी-झोगमू/खासा मार्ग की आव्रजन चैकी, बड़ा सा भवन, मैत्री पुल, सूखी गोदी (ड्राइ पोर्ट) नष्ट हो गए थे और सभी मार्ग अवरुद्ध। 2015 से 26 तक मानसून के समय भूस्खलन, बाढ़ से काठमाण्डू-कोदारी आर्निको राजमार्ग लगातार अवरुद्ध रहा। कोदारी में ही नेपाल का आर्निको राजमार्ग चीन के राजमार्ग जी 318 से जुड़ता है, जो ल्हासा और कैलास दोनों ओर को जाता है।
हिमालय में भूकम्प सदा से भूस्खलन और बाढ़ को आक्रामक बनाते रहे हंै। 26.8.26 की सुनामी भी इस सबके संयुक्त दबाव से जन्मी थी। ऐसे ही अन्य मामले नेपाल में मेलम्ची (2021), थामे (2024) तथा भोटे कोसी (2025) में प्रकट हो चुके हैं। वैज्ञानिक बताते रहे हैं कि तापमान बढ़ोत्तरी के विश्व औसत से हिमालय में दुगुना तापमान होता है। इसलिए हिमस्खलन, भूस्खलन और बाढ़ का यहां अधिक खतरा है। संयुक्त राष्ट्र ने 2023 में कहा था कि नेपाल के हिमालय ने अपने बर्फ भण्डार का एक तिहाई खो दिया है। यह भी जानना जरूरी है कि नेपाल में 2000 से अधिक ग्लेशियर झीलें हैं, जिनमें से 21 को अत्यन्त खतरनाक बताया गया है।
तीन खतरे और तीनों के भीतर अनेक खतरे
हिमालयी देश और प्रान्त तीन तरह के खतरों से जूझ रहे हैं। पहला पारिस्थितिक, दूसरा आपदा से जुड़ा और तीसरा जलवायु परिवर्तन से संचालित। ये तीनों अन्तर्सम्बंधित हैं। तीनों के अनेक आयाम और टहनियां हैं। कोई भी पारिस्थितिक क्षति आपदाओं को बहुगुणित करती है। दोनों जलवायु परिवर्तन से संचालित होते हैं। नेपाल के बारे में यह कहा जा सकता है कि नेपाल का कार्बन उत्सर्जन (वैश्विक उत्सर्जन का मात्र 0.1 प्रतिशत) बहुत कम है पर वह भारतीय उपमहाद्वीप के अपने पड़ोसियों के द्वारा वायुमण्डल में भेजे गये और भेजे जा रहे ब्लैक कार्बन और भूरी धूल की कीमत चुका रहा है। जिसने हिमालय के तापमान को बढ़ाने में योगदान दिया है। उसके पहाड़ों में भी धुंध होने लगी है। हिमालय की वन्यता और सुन्दरता पर इस कार्बन और धूल ने धब्बा लगा दिया है। हिमालय एक चाक्षुस संसाधन (वीजुुअल रिसोर्स) भी है। इसलिए उसकी शुद्धता और सौन्दर्य की हिफाजत होनी चाहिए। हिमालय के सबसे बड़े उद्योगों में एक तीर्थाटन और पर्यटन का यही आधार है। कोई भी हिमालय में भूस्खलन या बाढ़ देखने नहीं आता।
अतः एक संतुलित नीति और एक समझदारी भरा सामाजिक व्यवहार ही पारिस्थितिक, आपदा जन्य और जलवायु परिवर्तन के बीच संतुलन रख सकता है। हिमालयी देशों तथा उनके और विश्व संस्थाओं के बीच एक इमानदार संवाद, समन्वय और समझदारी बहुत जरूरी है। विचारों का मंथन और विश्लेषण राजनैतिक, सामाजिक और बौद्धिक हलकों में होना चाहिए। हिमालय की क्षेत्रीय या राष्ट्रीय समझदारियां और शोध कार्य भी साझा होने चाहिए। वैज्ञानिकों के बीच संवाद और देशों के बीच अपने साझा संसाधनों, जैसे कि नदियों, के बाबत समझौते होने चाहिए। आपदा और बाढ़ सम्बंधी पारम्परिक ज्ञान और अनुभव को भी साझा किया जाना चाहिए। नेपाल में भूस्खलन से बनी झील के टूटने से आने वाली बाढ़ को ‘बिष्यारी’ कहा जाता है। सामान्य भूस्खलन को ‘पहिरो’ कहा जाता है। उत्तराखण्ड में इसे ‘पैरा’ कहा जाता है।
नदियांे को लेकर भारत के पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश के साथ समझौते हैं। जैसे सिन्धु, कोसी और फरक्का जल संधि आदि। लेकिन चीन तथा भारत के बीच समझौता नहीं है। हम एक नाजुक मामला ले सकते हैं। यह पारेचू या पारंग नदी से सम्बंधित है, जो हिमाचल से जन्म लेकर लद्दाख और तिब्बत होकर फिर हिमाचल को लौट कर समदो में स्पीति नदी में मिलती है। स्पीति नदी खाब में आकर तिब्बत से आने वाली सतलज मंे मिलती है। जून अंत या जुलाई 2004 के शुरू में एक भूस्खलन ने इस नदी को तिब्बत वाले हिस्से में रोककर एक झील बना दी, जो धीरे-धीरे 200 हैक्टेयर में फैल गई। इसकी गहराई भी 40 से 60 मीटर तक बताई गई। खतरा भारत के लिए हो गया क्योंकि नदी हिमाचल के रामपुर बुशहर क्षेत्र में आती थी।
26 जून 2005 को झील टूटी तो जानें तो बचा ली गई लेकिन रु. 800 करोड़ की सम्पत्ति (10 पुल, हिन्दुस्तान-तिब्बत रोड, हाईवे 22 और मकानों) का विनाश हुआ। एक साल का समय बीता पर सूचना के आदान प्रदान का प्रोटोकाल आपदा के बाद हो सका। कम से कम भविष्य में सूचना का आदान प्रदान होगा। एक संधि के न होने से भारत ने कीमत चुकाई। अब चीन अरुणाचल की सीमा पर बड़ा बांध बना रहा है। पर भारत के साथ कोई संवाद नहीं हुआ है। यह वही क्षेत्र है, जहां 12 जून 1897 और 5 अगस्त 1950 को बहुत बड़े भूकंप आ चुके है, जिनका उपरिकेन्द्र (ऐपी सैन्टर) तिब्बत के इसी क्षेत्र में था।
हम पुराने राजतंत्रों और सामन्ती जमानों में नहीं हैं
यह सही है कि हिमालय के इन कठिन इलाकों में मनुष्य जोखिम लेकर रहता है। बहुत से ऐतिहासिक कारण उसको विवश करते हैं। मनुष्य बहुमुखी जोखिमों को कम करने के प्रयास कर सकता है पर वे सभी नियंत्रित हो जाय यह जरूरी नहीं है। पर्वतवासियों को आश्चर्य नहीं होता जब इस तरह की विपत्ति जाने अनजाने कारणों से आ जाती है। आज इसमें भूगर्भीय और भौगोलिक के साथ जलवायु परिवर्तन का कारण भी जुड़ गया है।
लेकिन आज हम पुराने राजतंत्रों या सामन्ती जमानों में नहीं हैं। हमारे पास प्रजातांत्रिक राज्य व्यवस्थाएं हैं। कम से कम भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में संकटों के बावजूद प्रजातंात्रिक व्यवस्थाएं हैं। चीन अपेक्षाकृत बन्द पर शक्तिशाली देश है और आरोपित संवाद करता है। इन प्रजातांत्रिक देशों की कमियां होंगी पर संवाद की संभावना भी होती है। अपने अपने राष्ट्रवादों से पीड़ित इन देशों की पारिस्थितिक जिम्मेदारियां हैं। आधुनिक समय में सभी देशों में विकास कार्य सड़कों, ऊर्जा परियोजनाओं, कृषि, शिक्षा, चिकित्सा के रूप में प्रस्तुत या विकसित होते हैं। प्रकृति पर पूरे हस्तक्षेप वाली परियोजनाएं समझदारी से पूरी न की जाने पर आपदाओं में बढोत्तरी करती हैं। विकास के कार्य जिस तरह हम अन्य भूगोलों-जैसे मैदानों, पठारों या रेगिस्तानों- में करते हैं, वैसे पहाड़ों में नहीं कर सकते हैं। नहीं करनी चाहिए। समाज इन आपदाओं को देरी से भूलता है पर सरकारें जल्दी भूल जाती हैं और इससे कोई सीख नहीं लेती है। आगामी आपदा फिर आम लोगों को ही उजाड़ती है।
फोटो इंटरनेट से साभार































