राजीव लोचन साह
नैनीताल में होली के दौरान पर्यटकों की भीड़ बढ़ जाती है। हमें आश्चर्य होता है कि इतने महत्वपूर्ण मौके पर लोग अपने घर, परिवार और समाज को छोड़ कर एक अजनबी जगह पर क्यों आते होंगे ? क्या वे अपने समाज से अब इतने भयभीत रहने लगे हैं कि साल में एक बार आने वाले रागरंग, उल्लास और मेलजोल के इस पर्व पर भाग खड़े होते हैं ? होली का शायद एक रूप यह भी है, ‘डरना’। हम बचपन में होली से तब डरते थे, जब अश्लीलता सीमा पार कर जाती थी। फिर डरने लगे, जब नगर में कई स्थानों पर एकत्र होकर कोरे-सूखे अबीर-गुलाल से होली खेलने की जगह पानी की भरमार हो गयी। नैनीताल ठण्डी जगह है और होली तो जाड़ों के बीच में ही आती है। कई बार तो होलियों के दौरान शहर बर्फ से ढँका हुआ भी देखा। ऐसे में कौन रणबाँकुरा होगा, जो बर्फीली बौछारों को झेलता हुआ बाजार से निकलने की हिम्मत करेगा ? पता नहीं कौन शैतानी दिमाग नैनीताल की होलियों के बीच पानी को ले आया और आतंकित लोग होली में अपने घर और पास-पड़ौस तक ही सीमित रहने लगे। होली का बहुत सारा मजा खत्म हो गया। फिर पचास साल पहले नैनीताल समाचार का युग आया। अपने बुजुर्गों को जिस तरह देखा था, हमने होली जूलूस निकालने की खंडित परम्परा फिर चालू की। हमारी खुशकिस्मती थी कि हमारे साथ गिरदा जैसा व्यक्तित्व था, जो सड़क को रंगमंच बना देने की काबिलियत रखता था। कर्णप्रिय, आकर्षक खड़ी होलियों के साथ इन जुलूसो की एक विशेषता थी, इनकी आशीष, जिसमें समसामयिक राजनैतिक विषयों पर टिप्पणी के साथ प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों तक की चुटकियाँ ले ली जातीं। आज जिस तरह की असहिष्णुता हमारे समाज में व्याप्त हो गयी है, यह सम्भव ही नहीं है कि ऐसी आशीष दे सकें ? लोगों की भावनाओं को ऐसी ठेस पहुँचेंगीं कि हम हवालात के भीतर होंगे। गिरदा की असामयिक मृत्यु के साथ यह भय भी है, जिसने नैनीताल समाचार के होली जुलूसों पर पूर्ण विराम लगा दिया है।

































