पं. घनानन्द पाण्डे
कुमाऊँ की होली गायकी के प्रसंग में बातें होती हैं तो बचपन की यादें लौट आती हैं। इन्ही स्मृतियों के बीच में मन के किसी कोने में राग ‘परज’ के स्वरों में होली का मधुर संगीत गूँज उठता है-
‘‘किन मारी पिचकारी, रे मैं तो सगरी भीज गई।’’
छिपकर पिचकारी चलाने वाले पर कितना उलाहना है ? हठात् होली गायकी का पूरा माहौल मन पर उभर आता है। मुख्य गायक के आसपास बैठे हुए अन्य गायक अपनी गवास नहीं रोक पा रहे हैं। अन्य गायक बीच-बीच में अपनी पारी में गा रहे हैं। कहीं पर भी लय अथवा स्वर भंग नहीं हो रहा है। गायकों की अलग-अलग आवाज में राग का रूप अधिक ही निखर रहा है। गाने का संतुलन इतना कसा हुआ है कि मुख्य गायक अपनी तान जहाँ पर छोड़ता है, वहाँ से उठा कर अन्य गायक अपनी पारी में गाकर ‘किन मारी पिचकारी’ की टेक मुख्य गायक को पकड़ा देता है।
हारमोनियम के साथ वायलिन और सितार के पीछे-पीछे लोटे और मजीरी तबले का ‘टिन-टिन-टिन-क्रीं-क्रीं’ का खटका समाँ बाँधे हुए है। बीच-बीच में ‘वाह-वाह’ की दाद संगीत सरिता में उठती-गिरती लहर सी लग रही है। गाना चाँचर ताल की विलम्बित लय से तीन ताल की बढ़त में सरक गया है। अन्तिम सोपान ‘कहरूवा’ की द्रुतलय में जाने की तैयारी कर रहा है। पुनः विलम्बित लय में आने पर मुख्य गायक ने अन्तरा शुरू कर दी है-
‘‘जाने भिगोई, मोरे सन्मुख आओ नाही मैं दूँगी गारी।’’
संगीत का प्रसंग आने पर कुमाऊँ की होली-गायकी का अनोखा आनन्द बरबस उभर आता है। कुमाऊँ की बैंठकी होली शताब्दियों से प्रचलित है। कुमाऊँ अंचल में होली गाने का श्रीगणेश पौष माह के प्रथम रविवार से किया जाता है। और इसका समापन होली के टीके के दिन होता है। इसको सामूहिक रूप से गाया-बजाया जाता है। बड़े बुजुर्ग तथा मुख्य गायक नये जिज्ञासुओं को गाने का प्रोत्साहन और अवसर देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे किसी घराने के उस्ताद से शिष्यगण अनजाने ही संगीत की शिक्षा-दीक्षा ले रहे हों।
होली के पद भिन्न-भिन्न थाटों के अन्तर्गत प्रायः हर राग-रागिनी में निबद्ध हंै तथा मुख्यतया सोलह मात्रा के चाँचर और धमार ताल में निबद्ध हैं। ये गीत प्रधानतया श्रीकृष्ण एवं राधा की लीलाओं का चित्रण करते हैं। किन्तु सभी होलियाँ राधा-कृष्ण तक ही सीमित हों, ऐसा नहीं है। राग झिंझोटी में यह होली गीत देवी की सुन्दर स्तुति प्रस्तुत करता है-
ऊँचे भवन परत पर बस रही,
अन्त तेरा नहिं पाया है री,
हरियल पीपल द्वार विराजे,
लाल ध्वजा पहराया है री,
ब्रह्मा वेद पढ़ें तेरे द्वारे,
शंकर ध्यान लगाया है री।
राग परज में शिव का स्तवन बहुत सुन्दर बन पड़ा है-
मैं शिव पूजन जाऊँ,
री मोरि सुघर बहुरिया।
अक्षत चंदन बेल की पाती
नरियल भेंट चढ़ाऊँ।
भोले नाथ सदा दुख भंजन,
बार-बार बलि जाऊँ।
मैं शिव पूजन जाऊँ।।
जीवन-जगत की क्षण भंगुरता को राग काफी में कितने ही प्रवाहपूर्ण ढंग से दर्शाया गया है-
क्या जिन्दगी का ठिकाना,
फिरत मन क्यों रे भुलाना,
कहाँ गये भीम कहाँ दुर्योधन,
कहाँ पारश बलवाना
कहाँ गये भीष्म-द्रोण-करण से,
पल में जात न जाना।।
और राग परज जगत की स्वार्थता पर अनूठे ढंग से दृष्टि डालता है-
काहु से प्रीत न किरयो रे
ऐसे झूठे जगत में,
चाहने वाले की चाकरि कीजै अनचाहन सू बिसारिए।
झूठी माया, झूठी ममता, संभल-संभल पग धरिए।।
रंग भरी एकादशी से छरड़ी तक शिष्ट-श्रृंगार की होली, धूम की होली के गीत गाये जाते हैं। गीत के भावों में गोपियों द्वारा परस्पर स्नेहसिक्त-रोली, अबीर, गुलाल उड़ाते हुए कृष्ण को रंगने का मनोहारी दृश्य मानस पटल में छा जाता है। अब देखिए, राग भैरवी में होली का वातावरण कितना सुन्दर और जीवंत बन गया है-
बृज में खेलत नन्द किशोरी,
धूम मची है गोकुल नगरी।
रंग बरसत कहीं अबीर उड़ावत,
जैसे इन्द्र घर बदरा छायो री।।
और धूम की होली तो सचमुच ही धूम मचा देती है-
ऐसी चतुर ब्रजनार,
रंग में हो रही बावरी,
एक मन उड़त गुलाल,
सवा मन केसर रोरी।
राधा पै छिड़कत श्याम, श्याम पर राधा गोरी,
राधे चली मुसकात,
श्याम ने बैहिया मरोरी।
राग देस में होली खेलने के दाँव पंेच हृदयग्राही है-
पीताम्बर वाको लेहु छुड़ाई,
नीलाम्बर पहिराओं रे।
छीन झपट वाको गुलाल मलो री,
हाय कहो तब छोड़ो रे।
वाको रंग ही में बोरो रे।।
और राग जोगिया में बिरह के मार्मिक भाव हृदयतंत्री में तारों को छूकर अपना जादू छोड़ जाते हैं-
पिया गए परदेस री,
कैसे कटे अब बिरहा की रतियाँ।
मधु-ऋतु आई पिया नहीं आये
बीती जाति मोरी बालि उमरिया।
रंग अबीर से क्या करूँ सजनी
अँसुवन भिगोदीनी मोरि चुनरिया।।
कुमाउँनी होली गायकी सोलह मात्रा के चाँचर ताल में गाई जाती है। बढ़त होने पर तीन ताल में और द्रुत लय में कहरुवा ताल में आ जाती है। कभी-कभी सितारखनी की मस्ती भी देखने में आती है।
ऐसी भी मान्यता है कि चाँचर ताल किसी घराने के ‘जस-ताल’ से मिलता-जुलता है। जो भी हो, जाड़ों में चाँचर ताल की थापें कानों में पड़ते ही होली गायकी का संकेत दे देती है। जबकि इतर होली चैदह मात्रा की ‘दीपाचन्दी’ में गाई जाती है। दुगुन होने पर, लग्गी लगने पर सोलह मात्रा में आ जाती है।
इस प्रसंग के बीच में हठात् हमारा ध्यान अपने विज्ञ पूर्वजों की ओर चला जाता है। शताब्दियों पूर्व इस पर्वतीय अंचल में यातायात की कठिनाइयाँ रही होगीं। विषम भौगोलिक स्थित में दुर्गम एवं दुरूह पर्वत श्रेणियों और घाटियों में दूर-दूर पर ग्राम बसे हुए थे। संचार माध्यम का अभाव था। उस समय इस क्षेत्र में संगीत की कोई शिक्षण संस्था नहीं थी। संभवतया प्रेस और प्रकाशन की भी व्यवस्था नहीं रही होगी। महान आश्चर्य होता है कि हमारे पूर्वजों ने इन विषम परिस्थितियों में तथा साधनों के अभाव में किस प्रकार होली गायकी का मनोहारी रूप का सृजन किया होगा ? विभिन्न रागों में गीतों की रचना तथा चांचर, धमार ताल का मौलिक सृजन उनकी कल्पना और सूजबूझ का द्योतक है। इस गायकी को पूर्वजों की देन ही कहा जायेगा।

































