दिनेश शास्त्री
उत्तराखंड में बीती आठ फरवरी के बाद से आंसू विमर्श का केंद्रीय विषय बन गए हैं। यह अलग बात है कि मीडिया ने परेड ग्राउंड के अंदर सुसज्जित पांडाल में बहे आंसुओं को ज्यादा तवज्जो दी, जबकि उससे दो घंटे पहले परेड ग्राउंड के बाहर सड़क पर हुई महापंचायत में चार वर्ष से आंसू बहा रही मां के आंसू महज संदर्भ की बात बन कर रह गई। किंतु न्यू मीडिया में जो विमर्श शुरू हुआ उसने एक महाकाव्य की विषय वस्तु जरूर तैयार कर दी। इस दौरान जितनी सामग्री परोसी गई, उतनी शायद ही इससे पहले चर्चा का विषय बनी हो। सुसज्जित मंच से बहे आंसू सच में मलिक मुहम्मद जायसी की पदमावत से कम नहीं थे, जब नागमती चित्तौड़ के पथ को निहार रही है – “*नागमती चितउर पथ हेरा, पिऊ जो गए पुनि कीन न फेरा”*
यह एक विरहिणी नायिका के आंसू थे, जो करीब चार सौ से ज्यादा साल बाद देश दुनिया ने देखे। नायिका विरह वेदना से पीड़ित है, उसे वसंत अंगारे बरसाता महसूस हो रहा है और सावन की झड़ी भी आग बरसाती लगती है। शरद पूनम की रात भला ऐसे मौके पर कैसे रुचिकर हो सकती है? और तो और शीत ऋतु के झोंके बाण की तरह चुभते प्रतीत होते हैं। गढ़वाली के चितेरे कवि सर्वेश्वर दत्त कांडपाल जी ने पिछली शताब्दी में ही नसीहत दी थी कि अपने आंसुओं को कभी सार्वजनिक मत करना, लोग व्यंग्यबाण चलाएंगे। कांडपाल जी ने ऐसी ही विरह वेदना से जूझ रही नायिका से कहा था -“*दिन ना रोई, रात रोई, रोंदू ना देख कोई*”। उस नायिका का पति फौज में गया था लेकिन युद्ध में बंदी बना लिया गया तो नायिका का विरह चरम को छू गया था, इसके बावजूद उसे ये सलाह दी गई थी कि अपने दुख को कभी सार्वजनिक मत करना, लोग मरहम तो नहीं लगाएंगे अलबत्ता हंसेंगे जरूर। यहां भी यही हुआ। न्यू मीडिया पर प्रतिक्रिया की जैसे बाढ़ सी आ गई, जो अभी तक नहीं थम पाई है। विरहिणी नायिका का दर्द अपनी जगह पर यथावत है और लोग नायक को कोस रहे हैं कि वह कितना निष्ठुर हो गया है जो फौज में भी नहीं है फिर भी नायिका को एक पल भी नहीं दे रहा है।
थोड़ा पीछे चलते हैं, मध्यकाल में जब अस्तित्व रक्षा के लिए स्वदेशी राजा महाराजा आक्रांताओं से मातृभूमि की रक्षा के लिए रण में जाते थे तो राजमहल में उनकी रानियां एकटक युद्ध के समाचार जानने को व्यग्र रहती थीं। कई मौके तो ऐसे भी आए जब महाराजा राजधर्म का निर्वहन करते हुए शहीद हो गए तो रानियों ने जौहर कर लिया। महारानी पद्मिनी का जौहर तो सर्वविदित है। यहां तो जौहर की भी स्थिति नहीं है, बस धैर्य धारण करने की ही तो बात है। लोग आंसुओं को उलाहना न दें, यह ध्यान रखने की जरूरत तो है ही, आंसुओं को संभाल कर रखना भी तो जरूरी है, उनका सम्मान भी उतना ही जरूरी है जितना जीवन। गोपाल दास नीरज जी ने यूं ही नहीं लिखा था -“*आंसू जब सम्मानित होंगे, तब मेरा नाम लिया जाएगा, जहां प्रेम का चर्चा होगा, मुझको याद किया जाएगा”*।
लोग आंसुओं के बहाने चर्चा में डूब जाएं, ये भी तो उचित नहीं है। न्यू मीडिया पर जितनी चर्चा इन दिनों आंसुओं को लेकर है, उतनी शायद पहले कभी हुई होगी। तभी तो कैफ़ी आज़मी ने लिखा – *”मुद्दत के बाद उसने जो की लुत्फ की निगाह, जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े।”*
सच मानो लोगों ने दरअसल इन आंसुओं को गंभीरता से लेने के बजाय उपहास के रूप में ज्यादा लिया। जबकि आंसू इतने बेशकीमती थे कि उनमें दर्द का समन्दर सा था, जैसे कि आमतौर पर पहाड़ की वीर नारियां, जिनके पिया सेना में हैं और वर्ष में एक बार ही वे घर लौट पाते हैं, इसके विपरीत यहां वेदना कई गुना ज्यादा है। फौज में गया सैनिक तो वर्ष में एक बार घर आ जाता है किंतु रोज नजरों से गुजरने वाला पति जब समय न दे और वर्षों वर्ष बीत जाएं तो वेदना कई गुना अधिक बढ़ जाती है। तब नयनों के कोर गीले नहीं होते बल्कि आंखों से समन्दर बह निकलता है। शायद मुनव्वर राणा ने इसी स्थिति के मद्देनजर लिखा हो – *”एक आंसू भी हुकूमत के लिए खतरा है, तुमने देखा नहीं आंखों का समन्दर होना।”*
वैसे तो राह गुजरते लोग तो यही कहेंगे कि *हमने भी पानी से भरा बादल देखा, कि आंसू में भीगा उसका काजल देखा।*
विरहिणी नायिका के दिल का दर्द बेदर्द जमाना क्या जाने क्योंकि समाज की आज जो स्थिति है, उसमें हृदयहीनता ज्यादा है, आंसुओं पर हंसने का रिवाज सा है। लोग त्याग तपस्या और सेवा का मोल क्या जानें, गुलजार ने यूं ही नहीं लिखा होगा कि “*आंखों से आंसुओं के मरासिम पुराने हैं, मेहमां के घर आएं तो चुभता नहीं धुआं।”* लिहाजा इन आंसुओं को फिलवक्त संजोने की जरूरत है। जिस तरह नायक सेवा भाव के वशीभूत समय नहीं दे पा रहा तो धैर्य इस बात का रखना चाहिए कि रात चाहे कितनी भी लम्बी हो, सुबह तो जरूर होगी। प्रतीक्षा कभी अंतहीन नहीं होती। यह भी तो प्रदेश की जनता की सेवा के रूप में तपस्या ही तो है। मानवीय स्वभाव है कि मौके बेमौके ये आंसू छलक ही जाते हैं किंतु किस मौके पर बहे, ये महत्वपूर्ण बात हो जाती है। हंसी खुशी के मौके पर गाहे बगाहे जब आंसू निकल जाएं तो बात दूर तक चली जाती है, जिसे साहिर लुधियानवी ने कुछ इस तरह व्यक्त किया – *”कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो हर बात पर रोना आया।”*
वैसे तो कवियों ने आंसुओं के झरने की अपने अपने तरीके से व्याख्या की है किंतु मौजूदा मामले में ये कहा जा सकता है कि जिन आंसुओं को मोती बनना था, वे इस बार एक अफसाने की तरह बह गए। इस पर बशीर बद्र का शेर याद आता है, – *”उदास आंखों से आंसू नहीं निकलते हैं, ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं।”* लिहाजा ये कहना गलत न होगा कि “रख न आंसुओं से वस्ल की उम्मीद, खारे पानी से दाल नहीं गलती।” क्योंकि जो आंसू व्यर्थ बह गए एक तो वे लौट कर नहीं आ सकते और दूसरे लोग ऐसे भी नहीं कि उनका मोल समझ सकें। न्यू मीडिया पर सरस्वती नाम की महिला का जो तंज था, निसंदेह वह चुभने वाला ही था। उन भद्र महिला ने विरही नायिका की वेदना के लिए नायक को इस कदर कोसा कि पूरा हिसाब किताब करने की बात तक कर डाली थी। इस पर भी एक शेर याद आना लाजमी है – *”मैं जिसकी आंख का आंसू था, उसने कद्र न की, बिखर गया हूं तो अब रेत से उठाए मुझे।”*
कुल मिलाकर अश्रु पुराण इन दिनों उत्तराखंड में हर जुबान पर छाया है। प्रकट रूप से न सही, लोग आपसी बातचीत में उस प्रकरण का जिक्र जरूर कर बैठे हैं और लगता है यह मामला लम्बा खींचेगा। यानी बात निकली है तो दूर तलक जाएगी। न्यू मीडिया का सार तो फिलहाल यही है।

































