राजीव लोचन साह
लोकतंत्र का स्तर हमारे देश में किस तरह गिर रहा है, इसे संसदीय परम्पराओं के लगातार क्षरण के रूप में देखा जा सकता है। संसद को लोकतंत्र का मन्दिर कहा जाता है, मगर इस मन्दिर में उपासना करने वाले बहुत कम होंगे। हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2014 में पहली बार संसद में प्रवेश करने पर बाकायदा संसद की देहरी पर साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया था। मगर उनके अब तक के कार्यकाल को देखा जाये तो वे शायद संसद की सबसे अधिक अवहेलना करने वाले प्रधानमंत्री होंगे। संसद के सत्र के दौरान विदेश यात्राओं पर चले जाना या उद्घाटन कार्यक्रमों में व्यस्त हो जाना उनके लिये सामान्य बात है। जबकि लोकतंत्र के मन्दिर में पूजा के इन पवित्र दिनों में उनके लिये संसद में उपस्थित रहना सबसे जरूरी होना चाहिये। वे राजधानी में भी रहते होंगे तो संसद में सशरीर उपस्थित नहीं होते। शायद संसद भवन में ही अपने कार्यालय से कार्रवाही देख लेते हों। आँकड़े बतलाते हैं कि 2014 से 2023 के बीच के दस वर्षों में उन्होंने 30 बार संसद में भाषण दिये, यानी साल में औसतन 3 बार। जबकि उनके ही गठबंधन के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने छः वर्षों में 77 बार संसद में भाषण किये थे, अर्थात् औसतन साल में 12 बार से अधिक। इस बार तो प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस का लोकसभा में जवाब ही नहीं दिया। वे लोकसभा में आये ही नहीं। उनकी अनुपस्थिति को सही ठहराते हुए लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि उन्होंने ही प्रधानमंत्री को लोकसभा में न आने की सलाह दी थी, क्योंकि सदस्यों के हंगामी व्यवहार से उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता था। कैसा वाहियात तर्क है! जिस लोकतंत्र में आदर्श स्थिति में एक प्रधानमंत्री को खुल कर जनता के बीच में होना चाहिये, संसद में नेता प्रतिपक्ष लगातार ऐसा करते भी हैं, वहाँ वे 147 करोड़ देशवासियों द्वारा निर्वाचित 543 व्यक्तियों के सामने उपस्थित होने में भी भय महसूस करें। लोकतंत्र के लिये इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है!

































