चन्द्रशेखर तिवारी
उत्तराखण्ड के अनेक पर्व व त्यौहारों ने स्थानीय गीत, नृत्य, गायन और संगीत को जन्म देकर यहां की सांस्कृतिक परम्परा को समृद्ध करने का कार्य किया है। यहां के पर्व त्यौहारों में धर्म, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम तो दिखायी ही देता है साथ ही साथ इनमें सामूहिक सहभागिता, लोक जीवन की सुखद कामना और प्रकृति के साहचर्य में रहते हुए उसके प्रति संरक्षण की भावना भी परोक्ष तौर पर परिलक्षित होती है।
उत्तराखण्ड खासकर कुमाऊं अंचल में मनाई जाने वाली होली भी कुछ ऐसी विशिष्टताओं के लिए जानी जाती है। शिशिर ऋतु के अवसान होते ही सम्पूर्ण पहाड़ में बसंत की सुगबुगाहट होने लगती है। ऊंचे शिखरों में खिले लाल बुरांश के फूल पहाड़ के लोगों को बसन्त आगमन की सूचना देने लगतेे हैं। गुलाबी ठण्डी बयार में सीढ़ीदार खेतों में फूली सरसों इठलाने लगती है। आंगन के आस-पास खडे़ आडू-खुबानी व पंय्या के पेड़ जहां सफेद-गुलाबी फूलों से लकदक हो जाते हैं वहीं यत्र-तत्र उगे प्योंली के नन्हें पीत पुष्प भी अपनी छटा बिखरने को आतुर जान पड़ते हैं। प्रकृति के इस अलौकिक बासन्ती रुप को देखकर पहाड का जन-मानस प्रफुल्लित हो उठता है और उसके अंतर्मन में भी प्रेम,श्रृंगार और रंग की कोंपले फूटने लगती हैं। पूष के पहले रविवार ,बसंत पंचमी शिवरात्रि उसके बाद आमलकी एकादशी से यहांघर-घर में बैठी होलियां और मंदिरों व घर आंगन में जाकर होली गायन का सामूहिक दौर चलने लगता है जिसमें बसन्ती बयार के बीच समूचे वातावरण में होली गीत गूंजने लगते हैं।
कुमाउनी होली की अगर बात करें तो स्वतः ही सतराली की होली का नाम भी सामने आ जाता है। अल्मोड़ा के समीप सतराली क्षेत्र के अंतर्गत सात गांवों को स्थानीय समाज ने चिन्हित किया है वह हैं ताकुला, खाड़ी लोहना, काण्डे, कोतवालगांव, थापला एवं पनेरगांव इसमें ताकुला के अंतर्गत झाडकोट,बीना, अमखोली भी शामिल हैं। संस्कृतिकर्मी तथा लोक के अध्येता कुमाऊं की खड़ी होलियों में सतराली की होली का नाम भी प्रमुखता से लेते हैं। सतराली के गांवो में आज भी यह परम्परा बची हुई कि होली गायन में भाग लेने के लिए परिवार के कोई न कोई सदस्य जो प्रवास पर गये होते हैं समय निकालकर लेकर गांव जरुर पहुंचते हैं। सतराली के सातों गांवों के हर घर आंगन में बारी-बारी से खड़ी होली गायन की परम्परा बहुत पहले से चली आयी है। चतुर्दशी के दिन ऊंचे पहाड़ पर स्थित गणनाथ के शिव मंदिर में सातों गांव के होल्यार अपने-अपने निर्धारित गायन स्थल (खोले) में शिव की होली गाते हैं। पूरा मंदिर षिवमय हो जाता है। होली गायन के बाद ढोल वादन प्रतियोगिता भी होती है। सतराली की होली की एक और विषेषता है कि सात गांवों के होल्यार एक दूसरे के गांव जाकर भी उनके खोले में यानि मुख्य सामूहिक जगह पर होली गाने जाते हैं। पूर्णिमा के दिन सभी होल्यार ताकुला के प्राचीन त्रयम्बकेष्वर मंदिर में एकत्रित होकर होली का गायन करते हैं। यह नायाब परम्परा पूरी तरह आपसी सामाजिक व सामूहिक एकता को मजबूत करती है। यहां की होली कुमाऊं के अन्य क्षेत्रों की तुलना में अलग ही लय व अन्दाज में गायी जाती है।
परम्परानुसार सतराली के होल्यार मुख्य होली पर्व से पहले शिवरात्रि के दिन बागेश्वर के बागनाथ मन्दिर में जाकर सामूहिक रुप से खड़ी होली की शुरुआत करते हैं। बागेश्वर के बागनाथ मन्दिर में इस होली की छटा दर्शनीय होती है। सतराली के सात गांवो के होल्यार जब अपने-अपने खोले में आकर खडी़ होली के रंग में सारोबार हो जाते है। यहां सामूहिक रुप से शिव की होली का गायन होता है। साममहिक ढोल की गमक और झांझर की झनकार के साथ जब सामूहिक होली के गीत मंदिर परिसर में गूंजने लगते हैं तो लगता है कि देवलोक के देवगणों के साथ शिव भगवान भी होल्यारों के साथ होली गायन में शामिल हो गये हैं।
पुराने समय में जब मोटर सडक की सुविधा नहीं थी और पैदल यात्रा से ही बागेश्वर पहुंचा जा सकता था तबके समय में सतराली के होल्यार शिवरात्रि के दिन बागनाथ मन्दिर में होली गायन करने जाते थे। कई सालों के अन्तराल के बाद सतराली के उत्साही होल्यारों ने पिछले तीन-चार साल से इस अनोखी सांस्कृतिक व सामाजिक परम्परा को पुनः जीवित किया है,जो निश्चित ही महत्वपूर्ण पहल है।सतराली की होली की तरह कुमाऊं अंचल में काली कुमांऊ (चम्पावत-लोहाघाट), की बनजारा होली गंगोली, सोर घाटी, चौगढ़, छखाता, चैखुटिया-गिंवाड, बोरा-रौ, कत्यूर व दानपुर क्षेत्र की खडी होलियां भी प्रसिद्व मानी जाती हैं।
कुमाऊं के होली गीत श्रंगार,प्रेम वियोग ही नहीं अपितु भक्ति, आध्यात्म और प्रकृति से भी जुडे़ हैं यहां गायी जाने वाली होलियों का यदि विश्लेषण करें तो हमें इनके मूल में विविध भाव और संदेश दिखायी देते हैं। निर्वाण व भक्ति प्रधान होली गीत जहां समाज को सासांरिक माया-मोह से उबरने तथा ईश्वरीय शक्ति को अनुभूति करने का संदेश देते हैं तो वहीं श्रृंगार व रसभरी होलियां प्रकृति के साथ ही सम्पूर्ण मानव जगत में राग-रंग, उल्लास व प्रेम के भाव को संचारित करती हैं। परम्परागत तौर पर वर्षों से सतराली की होली सामाजिक समरसता ,सामूहिक एकता व भाई-चारे का भी प्रतीक रही हैं। होली के पर्व-आयोजन में सभी वर्ग व संप्रदाय के लोग समान रुप से हिस्सा लेते हैं, इसे एक समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा के तौर पर देखा जाना चाहिए।
(आशा है सतराली के होल्यार इस बार भी बागनाथ मंदिर में होली गायन कर इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे होंगे )

































