मंगला कोठियाल
उत्तराखंड में आये दिन वन्य जीवों का आवासीय क्षेत्रों में धमकने से ग्रामीण बेहद आतंकित हैं। हाल की कई घटनाओं में तो भालू और गुलदार ने कई लोगों पर झपटा मारकर बुरी तरह से रक्त रंजित कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ बंदर, लंगूर और जंगली सूअरों ने लोगों की सारी फसलें बर्बाद कर दी हैं। जिसके परिणाम स्वरूप, ग्रामीण पलायन करने को ही अपना सुरक्षात्मक समाधान मान रहे हैं। मानव और वन्य जीवों के संघर्ष के कारण और निवारण के लिए सी पी भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र द्वारा, दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह में तीन दिवसीय शोध यात्रा की गई। वनाग्नि की रोकथाम एवं मानव वन्य जीव संरक्षण की तथ्यात्मक जानकारी हेतु, गैरसैण के अंतरवर्ती खनसर क्षेत्र के दर्जनों गांव का स्थलीय निरीक्षण परीक्षण व अध्ययन किया गया।
शोध यात्रा में शामिल ओम प्रकाश भट्ट, मंगला कोठियाल व विनय सेमवाल ने ग्रामीणों से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित कर कई बिंदुओं पर बातचीत की चर्चा में ग्रामीणों ने बताया कि वर्तमान स्थिति के लिए वनागनी मुख्य कारण है —
क्योंकि हर वर्ष जंगलों में लगने वाली आग की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है परिणाम स्वरूप वन्य जीव अपने इलाकों से विचलित होकर भड़कने के लिए मजबूर हुए हैं और वे आवासीय इलाकों में प्रवेश करने लगे है अग्नि की प्रचंडता में कई वनस्पति की प्रजातियां भस्म हो गई है जिनका का अब पुर्न उत्पादन पूर्णता या बंद हो चुका है। शाकाहारी छोटे जीव पशुओं का यही आहार होता था। आहार श्रृंखला के खंडित होने के कारण इन जीवों ने बस्तियों की तरफ रख कर दिया है और उनके पीछे मांसहारी जीव भी आने लगे हैं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि आग़ से जंगलों के छोटे पशु जो मांस हारी जीव के आहार होते थे वे खत्म हो गए हैं इसी कारण वन्य जीवों का गांव में आना अब आम बात हो गई है।
पिछले एक दशक से ग्रामीण जीवन शैली में तेजी से बदलाव आया है। जिसका सीधा प्रभाव खेत खलियान पर पड़ा है। लोगों ने पशुपालन और खेती किसानी का कम कर दी है। सदियों से बरसात के दिनों में लोग अपने मवेशियों के साथ सुदूर जंगलों के बीच खरक में रहते थे इन्ही झोपड़ों के आसपास गोबर के ढेर लगे रहते थे। इन में पलते कीड़ों को जंगली सूअर बड़े चाव से खाता था जो कि बड़ा पौष्टिक भी होता है परन्तु अब यह प्रथा बंद हो गई है।
जंगलों में लोगों की आवाजाहि एकदम खत्म हो चुकी है। यह भी देखा गया कि गांव के पास एकांत में खुले स्थानों में लोगों द्वारा फेंके कूड़े करकट में भी वन्य जीव अपना भोजन बीनते हैं। शादी समारोह में बचा भोजन भी होता है। वन्य जीव इनका स्वाद लेता है और उन्हें चस्का लग जाता है फिर उनका क्रम बन जाता है। गांव की तरफ आना इस प्रक्रिया के बीच यदि उन्हें कोई मानव दिख जाता है तो वह आक्रामक हो जाता है।
मडुवा की फसल पर अब किसान कम ध्यान दे रहे हैं जो कि भालू का पसंदीदा भोजन होता था। यही नहीं भमोरा के फल भी अब जंगलों में बहुत कम हो रहे हैं जो भालुओं का भरपेट खाना होता था। भोजन की पर्याप्त उपलब्धता के कारण भालू बस्तियों में कम आता था।
अध्ययन में एक बात और देखने को मिली गांव में लैंटाना व जंगली झाड़ियां उग गई है। हिंसक जानवर इन्हीं की आड़ में छुपे रहते हैं। ग्रामीणों का कथन है कि मनरेगा के तहत यदि इन झाड़ियां को साफ करने का कार्य भी शामिल किया जाना चाहिए।
इस आतंक से डरे सहमे ग्रामीणों में सरकार के प्रति बड़ा गुस्सा है। वे इन हिंसक जानवरों को मारने तक की बात करते हैं। आज लोग व उनके खेत खलियान कुछ भी सुरक्षित नहीं है। ग्रामीणों का कहना है की इनसे खेत और फसलें तभी बच सकते हैं जब इन के चारों तरफ सुरक्षा दीवार हो।
शोध एवं जन जागरूकता अभियान में सी पी भट्ट पर्यावरण एवं विकास केंद्र गोपेश्वर के अलावा वन विभाग के वन दरोगा सरिता देवी, वन दरोगा जगम सिंह, मैथन पुलिस चौकी के हेड कांस्टेबल धनपाल सिंह, होमगार्ड धन सिंह, फायर ब्रिगेड सर्विस गैरसैन के प्रभारी शौकीन सिंह रमोला, धर्मेंद्र सिंह कंडारी के साथ वन दरोगा स्वरूप सिंह, वन बीट अधिकारी विनय सिंह नेगी, सतीश कुमार, वन दरोगा विनोद कुमार, मोहित शुक्ला, सूरज सिंह नेगी आदि मौजूद थे।

































