(सोशल मीडिया में भाजपा के एक पूर्व विधायक की कथित पत्नी उर्मिला सनावर द्वारा बहुचर्चित अंकिता हत्याकांड में भाजपा के बहुत बड़े नेता दुष्यन्त गौतम का नाम लेने के बाद उत्तराखंड में उबाल आ गया है। जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। 4 जनवरी को देहरादून में भाजपा को छोड़ कर सभी राजनैतिक दलों और जन संगठनों द्वारा बहुत बड़ी रैली की गई, जिसमें समाज के तमाम चिंतित लोगों ने भाग लिया। हजारों लोगों ने मुख्यमंत्री का घेराव करने के लिये कूच किया, मगर भारी पुलिस बन्दोबस्त ने उन्हें हाथी बड़कला पर रोक लिया। अनेक अन्य नगरों से भी ऐसे विरोध की खबरें आ रही हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने तो इसे सबसे बड़ा राजनैतिक मुद्दा बना लिया है और सत्ताधारी भाजपा किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी है।
ज्ञातव्य है कि अंकिता हत्याकांड के बाद यह चर्चा आम थी कि किसी को स्पेशल सर्विस देने से इन्कार करने के कारण उसकी हत्या की गयी। मगर प्रदेश सरकार द्वारा गठित एसआईटी द्वारा इस दिशा में गंभीरता से जाँच नहीं की गयी। अब उर्मिला सनावर के रहस्योद्घाटन के बाद उस वीआईपी के नाम से पर्दा हट गया है। साथ ही यह भी लगने लगा है कि हत्या वाली रात कथित वीआईपी वनंतरा रिजॉर्ट में ही था। पूरे प्रदेश से इस घटना की सीबीआई जाँच की मांग की जा रही है, लेकिन प्रदेश सरकार इस मुद्दे पर अनिर्णय की स्थिति में है। – सम्पादक, नैनीताल समाचार)
खुर्शीद अहमद सिद्दीक़ी
“अगर धन चला जाए तो कुछ नहीं जाता, अगर स्वास्थ्य चला जाए तो बहुत कुछ चला जाता है, लेकिन अगर चरित्र चला जाए तो सब कुछ चला जाता है।”
अंकिता भंडारी हत्याकांड में आज उत्तराखंड सरकार केवल प्रशासनिक असफलता के कारण नहीं, बल्कि अपनी नैतिक विश्वसनीयता को लेकर भी गंभीर सवालों का सामना कर रही है। जनता की चिंता सिर्फ इस जघन्य अपराध तक सीमित नहीं है। लोगों को ज्यादा परेशान यह कर रहा है कि सच्चाई को देर से, अधूरी या जानबूझकर दबाकर पेश किया गया। जब न्याय धीमा या पक्षपातपूर्ण दिखाई देता है, तो जनता का भरोसा टूटने लगता है।
भारतीय संविधान कानून के सामने समानता (अनुच्छेद 14) और जीवन व सम्मान के अधिकार (अनुच्छेद 21) की गारंटी देता है। ये राज्य के लिए सिर्फ आदर्श नहीं, बल्कि अनिवार्य जिम्मेदारियाँ हैं। जब एक युवा लड़की की जान जाती है और सिस्टम की प्रतिक्रिया संदेह के घेरे में आती है, तो संवैधानिक शासन की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि जांच को कहीं न कहीं रोका जा रहा है। सबूतों का नष्ट होना, शुरुआती स्तर पर प्रशासन की निष्क्रियता और राजनीतिक रूप से जुड़े लोगों पर चुप्पी—इन सबने यह विश्वास मजबूत किया है कि पूरी सच्चाई सामने नहीं आने दी जा रही। ऐसे मामलों में केवल मौखिक आश्वासन काफी नहीं होते। न्याय स्वतंत्र, पारदर्शी और निडर दिखना चाहिए।
हाल के जन-आंदोलन केवल गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं थे। वे एक लोकतांत्रिक चेतावनी थे। ये सत्ता और जनता के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था—नैतिकता के बिना सत्ता अपनी वैधता खो देती है। जब राजनीतिक सुविधा, सार्वजनिक नैतिकता से ऊपर रखी जाती है, तो नागरिकों को बोलना पड़ता है। लोकतंत्र सवाल पूछने से कमजोर नहीं होता, वह तब कमजोर होता है जब सत्ता जवाब देने से बचती है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि सत्ता जनता की अमानत है। इस भरोसे को तोड़ना शासन की नींव को कमजोर करता है। न्याय और संवैधानिक मूल्यों के हित में मांगें जनता का भरोसा बहाल करने के लिए निम्न कदम आवश्यक हैं:
सभी नामजद और संदिग्ध व्यक्तियों को राजनीतिक या सरकारी पदों से तुरंत हटाया जाए, ताकि जांच प्रभावित न हो।
हाईकोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच हो और मामला सीबीआई को सौंपा जाए।
जांच और मुकदमा समय-सीमा में पूरा हो, और कानूनी रूप से नियमित जानकारी जनता को दी जाए।
सबूत नष्ट करने, देरी या लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई और आपराधिक मुकदमा चले।
पीड़िता के परिवार और गवाहों को पूरी सुरक्षा और सहायता मिले, ताकि वे बिना डर के सच बोल सकें।
उत्तराखंड सरकार के सामने असली चुनौती केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक है। भरोसा तभी लौटेगा जब सरकार सच्चाई को सामने आने देने का साहस दिखाए—चाहे उसमें कोई भी शामिल हो। अगर शासन का असली पैमाना चरित्र है, तो यह समय दृढ़ और ईमानदार कार्रवाई की मांग करता है। इससे कम कुछ भी न केवल एक केस, बल्कि लोकतंत्र की नैतिक शक्ति को खो देने जैसा होगा।

































