राजीव लोचन साह
एक युग था, जब संसद के सत्रों की प्रतीक्षा की जाती थी। माननीय सांसदों की तकरीरें न सिर्फ ज्ञानवर्द्धन करती थीं, बल्कि अनेक बार हास्यबोध भी पैदा करती थीं। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने एक बार संसद में यह कह कर सनसनी पैदा कर दी थी कि भारत में प्रति व्यक्ति औसत दैनिक आय मात्र तीन आना है। सरकार इसे पन्द्रह आना बतला रही थी। लोहिया की लम्बी बहस के बाद सरकार इसे साढ़े छः आना तक मानने को तैयार हो गयी। इसी तरह तारकेश्वरी सिन्हा जब एक बार सरकार की ओर से बयान दे रही थीं कि ‘मेरे फिगर बतलाते हैं..’ तो फीरोज गांधी ने खड़े हो कर टोक दिया कि यह सदन माननीया मंत्री जी के फिगर देखना चाहता है। इस पर जोर के ठहाके छूटे थे। उस दौर में माननीय सांसदों, चाहे वे सत्ता पक्ष के हों या प्रतिपक्ष के, पर अनावश्यक प्रतिबन्ध नहीं लगा करते थे। ‘व्हिप’ का दबाव भी बहुत अधिक नहीं होता था और सत्तापक्ष के सांसद अपनी सरकार के विरोध में मुखर हो सकते थे। फिर धीरे-धीरे उदार लोकतंत्र की वह भावना तिरोहित होनी शुरू हुई और अब तो सरकारों को संसद के सत्र करवाना बबाल जैसा लगने लगा है। खुल कर बात-बहस करने का लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच, जहाँ बहुत सारी अच्छी बातें निकल कर आती थीं, कानून बनते थे, अब अखाड़ों से भी बदतर हो गया है। सरकार की कोशिश होती है कि प्रतिपक्ष उसके निर्णयों पर कोई सवाल न करे और इसके लिये वह उच्च और निम्न सदन के अध्यक्षों को लठैतों की तरह तैनात कर देती है। उधर अपनी आवाज दबाये जाने से बौखलाया हुआ विपक्ष लगातार हंगामा काटता है। प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार संसद में आने पर उसकी चौखट पर मत्था टेकने वाले नरेन्द्र मोदी भी संसद की गरिमा को कम करने के लिये कम दोषी नहीं हैं। अब या तो वे संसद सत्र के दौरान विदेश यात्राओं पर निकल जाते हैं या स्वदेश में रहते भी हैं तो सदन में आने से कन्नी काटते हैं। लोकतंत्र के इस प्रहसन पर अरबों रुपये का अनावश्यक व्यय होता है।
































