विनोद पाण्डे
25 जुलाई 2025 को जिम काॅर्बेट का 150वाँ जन्मदिन था। मुख्य कार्यक्रम रामनगर में मनाया गया, जिसमें वन मंत्री और वन सचिव की अगुवाई में पूरे प्रदेश के जंगलात का महकमा जमा हुआ। एक छोटा सा कार्यक्रम शाम को कालाढूँगी में भी मनाया गया। यह तो कहा जाता है कि रामनगर सर हेनरी रैमजे के नाम पर बसाया गया। कालाढूँगी और नैनीताल तो समझा जा सकता है, मगर रामनगर से काॅर्बेट का क्या सम्बन्ध रहा ?
दरअसल उत्तराखंड का वन विभाग कभी काॅर्बेट को समझा ही नहीं। जब उसकी समझ में नहीं आया तो वह जन सामान्य को क्या समझा पायेगा! इसीलिये लोग उस जिम एडवर्ड काॅर्बेट को नहीं पहचानते, जिसने आज से सौ साल पहले वन्यजीवों से प्रेम करना सिखाया था। अंगे्रजों के समय में जंगली जानवरांे को मानव जाति के लिए बड़ा खतरा माना गया था। इसलिए इनके संहार को खुली सरकारी स्वीकृति थी। इसके लिए शिकारियों को ईनाम दिया जाता था। अभिजात लोगों के लिये जंगली जानवरों का शिकार करना प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। औद्यौगिक क्रांति ने यूरोप के देशों के जंगल और प्राकृतिक संसाधनों को निगल लिया था। भारत जैसे देशों में उनका शासन था, जहाँ उनके लिए जंगल और जंगली जानवरों की कल्पनातीत विविधता थी। आधुनिक बंदूकें आ चुकी थीं। वन्यजीवों की प्रचुरता उनके शिकार करने के शौक के लिए असीमित अवसर देती थीं। गोरों की नृशंसता और जानवरों की निरीहता इस कदर थी कि इन्हें हाँका लगा कर, घेर कर मारा जाता था। बड़े अफसरों, राजाओं-ताल्लुकेदारों, अमीरों के लिए शिकार पार्टियाँ आयोजित की जाती थीं। मारे गये शेर के ऊपर बन्दूक रखकर फोटो खिंचवाना, शेर-हिरनों के सिरों में भूसा भर कर ड्राईंग रूम में सजाना बहुत गर्व की बात थी। इन्हें ट्राॅफी कहा जाता था। जाड़ों में आने वाले असंख्य प्रवासी पक्षियों को मारना मनोरंजन माना जाता था। खूबसूरत पक्षियों में भूसा भर कर विदेशों में निर्यात करना शौक और धंधे के रूप में चलता था। भारत का पहला लकड़ी का ठेकेदार विलसन पक्षियों को मार कर निर्यात करने के लालच में ही इंग्लैड से भारत आकर बसा था। उसने अकूत संपत्ति जोड़ी।
जिम काॅर्बेट इसी कालखंड की उपज थे। बचपन में ही शिकारी बन कर वे जंगल की भाषा को इतनी गहराई से समझने लगे कि जंगल के साथ ही एकात्म हो गये। उन्होंने यह समझ लिया कि एक आदमखोर जानवर खलनायक नहीं, बल्कि परिस्थितियों से लाचार होता है। ऐसी समझ ने एक शिकार पार्टी में सैकड़ों पक्षियों के शिकार को बहादुरी नहीं, बल्कि नामसझी बताया। उन्होंने इसे ‘वांटन किलिंग’ यानी ‘निरर्थक हत्या’ का नाम दिया। वे इस ‘वांटन किलिंग’ से इस कदर चिन्तित थे कि भारत में वन्य जीवन के बर्बाद होने को लेकर आशंकित हो गये थे। संभवतः इसी डर से उन्होंने केनिया (अफ्रीका) में बसने की ठानी। हालाँकि भारत में उन्होंने वन्य जीवन बचाने के अपने प्रयास आजीवन जारी रखे। उन्होंने नैनीताल में उन्होंने एक पक्षी अभयारण्य बनाने का सुझाव दिया था, जिसे यदि मान लिया गया होता तो नैनीताल का मूल स्वरूप शायद आज बचा रहता। जिम काॅर्बेट के प्रयासों से ही धीरे-धीरे वन्य जीव संरक्षण की अवधारणा मजबूत हुई। इसी समझ से उन्होेंने सन् 1934 के आसपास यूनाइटेड प्राॅविंसेज के गवर्नर सर मैलकम हैली को एक वन्यजीव अभयारण्य बनाने का सुझाव दिया। हैली ने चयन का जिम्मा उन्हीं को सौंप दिया और उनके सुझाव पर 1935 में पातली दून यानी ढिकाला का क्षेत्र एशिया का पहला वन्यजीव अभयारण्य ‘हैली नेशनल पार्क’ बना। 1955 में काॅर्बेट के देहान्त के बाद इसे ‘काॅर्बेट पार्क’ का नाम दे दिया गया।
मगर वन्यजीवों के उजड़ने की जिम काॅर्बेट की आशंका अभी खत्म नहीं हुई है। काॅर्बेट पार्क का एक प्रमुख हिस्सा कालागढ़ बाँध के माध्यम से नष्ट किया जा चुका है। इसके चारों ओर के जंगलों में सागौन का रोपण किये जाने से वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं और बची-खुची कसर इसके आसपास अनियंत्रित पर्यटन ने पूरी कर दी है।
रामनगर के चारांे ओर खुल गये बेहिसाब होटल-रिजाॅर्ट्स से काॅर्बेट पार्क को अपूरणीय क्षति हुई है। झुलसाती गर्मी में भी रामनगर ठसाठस भरा रहता है। वहाँ शादियाँ और डांस पार्टियाँ होती हैं! काॅरपोरेटों की दावतें होती हैं। रामनगर में सब कुछ काॅर्बेट के नाम से बिकता है, सिवाय काॅर्बेट के ‘विचार’ के। रामनगर अब काॅर्बेट पार्क का पर्याय हो गया है। मेरे परिचित जब मुझे बताते हैं कि फलाँ शादी ‘काॅर्बेट’ में हुई थी तो मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ कि ‘काॅर्बेट’ नहीं ‘रामनगर’ कहो। अनियंत्रित और संवेदनाशून्य पर्यटन से यह बात पूरी तरह भुला दी गई है कि जिम काॅर्बेट प्रकृति और वन्य जीवन संरक्षण के लिये एक ज्योतिपुंज थे। दुर्भाग्य यह है कि इस प्रकृतिद्रोही पर्यटन को वन विभाग और तथाकथित पर्यावरणविदों की स्वीकृति प्राप्त है। ऐसा न होता तो जिम काॅर्बेट के 150वें जन्मदिन पर वन विभाग की रस्म अदायगी रामनगर में न होती।
मानवजन्य दबाव से काॅर्बेट पार्क और बाहर के जंगल में बचे’-खुचे वन्यजीवों पर कितना खतरनाक प्रभाव पड़ता है, इस बारे में वन विभाग ने कभी सोचा भी नहीं है। वन विभाग का पर्यावरण संरक्षण पूरी तरह दिशाहीन है। उसका कामकाज बतला देता है कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में वह घोर अज्ञानी है। यह अज्ञान कई तरह के लालच और दबावों के कारण है। क्या यह विडम्बना नहीें कि इस क्षेत्र में अनन्त काल से रह रहे ग्रामीण, जो अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिये जंगलों पर आश्रित हैं, कई बार ये जंगल जिनके लिये रोजगार का भी सहारा बनता है, वन विभाग को पर्यावरण के दुश्मन और घुसपैठिये लगते हैं तथा प्रकृति का विनाश करने वाला पर्यटन पर्यावरणसम्मत। वन विभाग में जो वर्तमान कार्य संस्कृति चल रही है, उसमें गहराई से कुछ सोचना गुनाह जैसा है। कर्तव्यनिष्ठ, जानकार और ईमानदार अधिकारी वहाँ किनारे कर दिये जाते हैं अथवा मनोज चन्द्रन, अरूप बनर्जी या धनंजय मोहन की तरह नौकरी छोड़ कर भाग खड़े होते हैं।
कुछ साल पहले इंग्लैंड की रिग्बी राइफल बनाने वाली कम्पनी ने जिम काॅर्बेट की एक तथाकथित बन्दूक को रामनगर लाकर वन विभाग के सहयोग से एक भव्य आयोजन किया था। बाद की जाँच में पाया गया कि ये कम्पनी दरअसल अफ्रीका में वन्यजीवों के शिकार के नीलाम में सहयोगी है। अपनी बंदूक को काॅर्बेट से जोड़ कर कम्पनी अपनी बिक्री चमकाने का अभियान चला रही थी और उस कार्यक्रम को करवा कर वन विभाग अपने को धन्य समझ रहा था। जिस शौक को काॅर्बेट अलविदा कह चुके थे, उसके प्रचार के लिये उत्तराखंड का वन विभाग अपना इस्तेमाल होने दे रहा था!
क्या वन विभाग इस बात का उत्तर देगा कि काॅर्बेट का जन्मदिन उस नैनीताल में क्यों नहीं मनाया जा सकता था, जहाँ वे पैदा हुए और जहाँ की नगरपालिका के वे उपाध्यक्ष तक रहे ? जिस तरह वन विभाग ने जनता को भ्रमित किया है, इसके लिए कलीम आजिज का एक शेर काफी है:-
दामन पे कोई छींट, न खंजर पे कोई दाग,
तुम कत्ल करे हो कि करामात करे हो।
फोटो इंटरनेट से साभार

































