केशव भट्ट
सिस्टम की लापरवाही से अपने मासूम बच्चे को खोने से दु:खी एक फौजी ने अपना दुख बीते दिनों सोशल मीडिया पर बयां किया तो हर किसी की आंखें नम हो गई – ‘मैं सरहद पर खड़ा हूं, लेकिन अपनों के लिए बेबस हूं, एक बुखार ने मेरा बेटा छीन लिया, क्योंकि यहां बीमारी से ज़्यादा सिस्टम मरा हुआ है. मेरा डेढ़ साल का शुभांशु जोशी मरा नहीं, उसे मारा गया.. रेफर सिस्टम ने, 108 की सुस्त एंबुलेंस ने और उस अडियल मानसिकता वाले डॉक्टरों ने जिन्हें अब यह भ्रम है कि कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता.’
ये शब्द उस पिता के हैं जो देश के लिए जान हथेली पर लेकर सीमा पर तैनात है, लेकिन अपने ही बेटे को सरकारी अस्पतालों की चौखट पर दम तोड़ते देखता रहा. ये सिर्फ एक मौत नहीं है, एक सिस्टम की शवयात्रा ही है. ग्वालदम, बैजनाथ, बागेश्वर, अल्मोड़ा से हल्द्वानी तक पांच अस्पताल. हर अस्पताल में एक ही स्क्रिप्ट, यहां इलाज संभव नहीं, रेफर कर दो.
रेफर?
मतलब उस मासूम को पहाड़ की उन सड़कों पर घसीटना, जहां सड़कें खुद बीमार हैं, जहां बीमार हो चकुी एंबुलेंस कभी वक्त पर नहीं आती, जहां इलाज से ज़्यादा सलाह मिलती है, यहां से निकलो, कहीं और बाहर को जाओ..?? लेकिन शुभांशु कहीं नहीं गया. वह गया… सिर्फ मौत की तरफ. या कहें कि उसे सिस्टम ने मौत की ओर धकेलने में कोई कसर नही छोड़ी.
इलाज की गुजारिश करने पर बागेश्वर जिला अस्पताल के डाक्टर की अड़ियल मानसिकता ने एक परिवार का मासूम छीन लिया. ऐसे डॉक्टर सिर्फ अपने पेशे का नहीं, हर उस डॉक्टर का भी अपमान करते हैं जो नि:स्वार्थ भाव से वर्षों से पहाड़ में सेवा दे रहे हैं. क्योंकि जब एक डॉक्टर का व्यवहार बदतमीज़ होता है, तो सवाल सब पर उठ ही जाता है. ये बड़ा सवाल है कि, कुछ डॉक्टर कई बार संवेदनहीनता के शिखर पर क्यों पहुंच जाते होंगे.? ऐसे डॉक्टर सिर्फ अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागते, वो उस सफेद कोट की गरिमा पर भी कीचड़ फेंकते हैं जिसे लाखों मरीजों ने आज भी उम्मीद का प्रतीक मान रखा है. हर अस्पताल या क्लिनिक में ऐसे कुछेक डॉक्टर मिल ही जाते हैं, जिनकी मानसिकता विकृत और व्यवहार असंवेदनशील होता है. यदि ऐसे चिकित्सकों की मानसिक जांच और सुधार समय पर हो जाए, तो न केवल मरीजों को बल्कि उनके परिजनों को भी बड़ी राहत मिल सकती है.
दुर्भाग्यवश, कुछ डॉक्टर अपने पेशेवर अहंकार में इस कदर डूबे रहते हैं कि बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग मरीजों तक के साथ अपमानजनक व्यवहार करने से भी नहीं हिचकिचाते. उनके चेहरे पर किसी को नीचा दिखाकर जो आत्मसंतोष झलकता है, वह चिकित्सा पेशे की गरिमा पर एक गहरी चोट है. रेफर के समाधान के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन पहाड़ के लिए ये सब दावे ही रह जाते हैं. सिस्टम के जिम्मेदार हुक्मरानों के पास जनता के इस सवाल का कोई जबाब नही है कि, कब तक हम हर बीमार व्यक्ति को लेकर हल्द्वानी, बरेली या दिल्ली की दौड़ लगाते रहेंगे.? क्या पहाड़ के लोग सिर्फ पर्यटकों के लिए फोटो खींचने, रील बनाने के लिए ही रह गए हैं? या सिस्टम को लगता है कि यहां के जिंदा लोग इलाज के लायक ही नहीं हैं.? क्यों हर बार बीमारी के साथ एक लंबा सफर, कर्ज, और हार जुड़ी होती है..? अगर यहां अस्पताल हैं, तो उनमें इलाज क्यों नहीं? अगर डॉक्टर हैं, तो जिम्मेदारी क्यों नहीं.? कब तक यहां के लोगों की जिंदगी, तीर्थ यात्रा की तरह अस्पताल दर अस्पताल भटकने में बीतेगी.?
लेकिन पहाड़ का ये दुर्भाग्य ही है कि, उत्तराखंड बनने के बाद सरकारें बदलती रही, घोषणाएं भी आती रही लेकिन हालात वहीं के वहीं हैं. हर घटना के बाद किसी का बयान आ जाता है, जांच होगी, दोषियों को सजा मिलेगी. फिर मामला ठंडा पड़ जाता है और जनता फिर लाइन में लग जाती है, इलाज के लिए नहीं, मौत के इंतजार की लाइन में.
पहाड़ में अब इस त्रासदी से निपटने के लिए सभी आदत डाल चुके हैं, मरने की, सहने की, चुप रहने की. इनसे तो अब ये भी कहना गुनाह हो गया कि, पहले सिस्टम का इलाज करिए, वरना मरीज नहीं, केवल लाशें संभालनी होंगी…

































