- इन्द्रेश मैखुरी
प्राथमिक शिक्षा निदेशक अजय कुमार नौडियाल पर भाजपा विधायक उमेश शर्मा काऊ और साथियों द्वारा हमले के मामले में शिक्षक कर्मचारी मांग कर रहे हैं कि विधायक की गिरफ्तारी हो. लेकिन अखबारों में खबर है कि मारपीट के मामले में गिरफ्तार हिस्ट्रीशीटर समेत चार आरोपियों को अदालत से जमानत मिल गयी है. चौबीस घंटे से भी कम वक्त लगा आरोपियों को जमानत मिलने में !
कल 23 फरवरी को जिस समय अधिकारी- कर्मचारी शिक्षक मोर्चा के प्रतिनिधिमंडल को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकारी दफ्तरों में सुरक्षा की एसओपी की पुड़िया थमा रहे थे, लगभग उसी समय अदालत में हिस्ट्रीशीटर समेत मारपीट के आरोपियों के जमानतनामे भरे जा रहे थे !
एफआईआर दर्ज होना बड़ी बात है पर उससे बड़ी बात है एफआईआर में सही धाराओं का लगना. देहरादून की पुलिस ने उमेश शर्मा काऊ को सिर्फ एफआईआर में नामज़द करते हुए ही सम्मान सहित “माननीय विधायक” नहीं लिखा, उसने धाराएं लगाते हुए भी उनके माननीय होने का ख्याल करते हुए हल्की धाराएं लगाई.
प्राथमिक शिक्षा निदेशक अजय कुमार नौडियाल ने अपनी शिकायत में लिखा कि उन पर जानलेवा हमला हुआ, उन्हें जान से मारने के लिए ईंट तक विधायक के साथ आए गुंडे लेकर आए थे. लेकिन पुलिस ने हत्या के प्रयास की धारा यानि 109 बीएनएस लगाई ही नहीं.
हत्या के प्रयास की धारा छोड़िये, पुलिस ने तो गंभीर चोट की धारा तक नहीं लगाई. भारतीय न्याय संहिता में लोकसेवक को गंभीर चोट (grievous hurt) पहुंचाने की धारा है 121(2), जिसमें एक से दस साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है.
लेकिन पुलिस ने लगाई बीएनएस की धारा 121(1) यानि लोकसेवक को सामान्य चोट पहुंचाना, जिसमें अधिकतम सजा पांच वर्ष है. अजय कुमार नौडियाल का खून सना चेहरा सबने देखा, उन्होंने पुलिस को दिये प्रार्थना पत्र में भी लिखा कि उनकी आंख और चेहरे पर गंभीर चोटें आई पर पुलिस ने धारा सामान्य चोट की ही लगाई !
इसके अलावा बाकी धाराएं भी ऐसी लगाई गयी हैं, जिनमें एक साल, दो साल तक की सजा का प्रावधान है. केवल एक धारा- 351(3) गंभीर आपराधिक धमकी (criminal intimidation) की है, जिसमें 7 साल कारावास, जुर्माना या दोनों ही का प्रावधान है.
7 साल से कम सजा वाली धाराओं में तो पुलिस अदालत का हवाला देते हुए आम तौर पर गिरफ्तारी ही नहीं करती. यहां तो दिखाने के लिए गिरफ्तारी कर दी गयी.
शिक्षक- कर्मचारी गणों और उनके नेताओं को समझ लेना चाहिए कि मुख्यमंत्री या सरकार, उनको कितने ही बड़े सुरक्षा की एसओपी के गोले भले ही क्यों न थमाए, भाजपा सरकार का एसओपी यानि स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यही है कि यदि हमला करने वाले उनकी पार्टी के हैं तो वह जबानी जमाखर्च पीड़ितों के पक्ष में भले ही कितना भी कर ले, बचाव वो अपनी पार्टी वालों का ही करेंगे !

































