व्योमेश चन्द्र जुगरान
बदरीनाथ धाम भारत को आदिगुरु शंकराचार्य की महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक देन है। इतिहासकार हिमालय क्षेत्र में शंकराचार्य का आगमन काल सातवीं-आठवीं शताब्दी बताते हैं। तभी यह सुदूर हिमालयी धाम जनमानस की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है और इसके माहात्म्य में निरंतर वृद्धि हुई है। यह वृद्धि सिर्फ समाज की धार्मिक वृत्ति के कारण हुई हो, ऐसा नहीं है। एक बेहतर प्रबंधन प्रणाली ने बदरीनाथ को आधुनिक भारत के श्रेष्ठ मंदिर के रूप में स्थापित करने में सिद्धहस्त भूमिका निभाई है। मंदिर पर अधिकार और हक-हकूक के विवादों और बदलावों का एक इतिहास जरूर है, पर इन सबसे पार पाकर इसके संचालन की जो त्रिआयामी व्यवस्था आज है, वह आधुनिक संदर्भ में किसी भी धार्मिेक स्थल के सुदृढ़ प्रबंधन की एक मिसाल कही जाएगी।
यहां प्रबंधन से तात्पर्य तीर्थयात्रा के आधारभूत ढांचे से संबंधित कठिनाइयों से नहीं है। ये सब तो हर तीर्थस्थल के मामले में कम या अधिक श्रद्धालुओं को पेश आती ही हैं। असल बात उस कौशल की है कि कैसे किसी पुरानी धार्मिक परंपरा में शासकीय हस्तक्षेप की सुधारवादी कारीगरी की जाए। इसी का परिणाम है कि बदरीनाथ मंदिर के प्रबंधन में सरकार का सीधा दखल किसी बड़े टकराव की वजह कभी नहीं बना। हां, अतीत में देवप्रयाग के पंडों/तीर्थ पुरोहितों, स्थानीय डिमरी पुजारियों, गढ़वाल के राजपरिवार और मुख्य पुजारी रावल के बीच शक्ति संतुलन साधने के क्रम में अदालती हस्तक्षेपों के उदाहरण जरूर हैं, मगर 1939 में बनाए गए बदरीनाथ मंदिर अधिनियम और 1949 को टिहरी राजशाही के भारतीय संघ में विलय के साथ ही मंदिर का प्रबंधन एक लोकतांत्रिक बाने से बंध गया। इस नई व्यवस्था में राजपरिवार और रावल की पारंपरिक शोभा तो बनी रही, पर उनके अधिकार सीमित कर दिए गए। वर्तमान में बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति बदरी-केदार और पंच प्रयागों सहित करीब 45 मंदिरों का प्रबंधन देखती है।
कहने को मंदिर समिति एक स्वायत्त निकाय है लेकिन इसके अध्यक्ष की नियुक्ति और संबंधित मामलों में राज्य सरकार का सीधा हस्तक्षेप रहता है। राजस्व इत्यादि की निगरानी के लिए एसडीएम स्तर के एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति की जाती है, वह भी मंदिर समिति के मातहत कार्य करता है। जाहिर है, बदरीनाथ का पूरा प्रबंधन परोक्ष रूप से राज्य सरकार के हाथों में है। मंदिर के मुख्य पुजारी रावल, स्थानीय पुजारियों के रूप में डिमरी ब्राह्मण और पारंपरिक प्रतीकस्वरूप राजपरिवार से जुड़ी प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताएं इतिहास के अध्येताओं के लिए कौतूहल का विषय रही हैं। पुरातात्विक दस्तावेजों और ताम्रपत्रों में राजा ‘बोलादां बदरीनाथ’ यानी सजीव बदरीनाथ जैसी अवतारी पदवी से विभूषित है। आज भी गढ़वाल का राजपरिवार ही हर साल बसंत पंचमी को राजपुरोहितों के साथ पंचांग की गणना कर कपाट खोले जाने की तिथि घोषित करता है। वर्तमान में राजपरिवार से जुड़ी समस्त परंपराएं टिहरी के नरेन्द्रनगर महल में संपन्न होती हैं। मंत्रोच्चार के बीच कपाट खोले जाने पर तिल के जिस तेल से बदरीनाथ जी का प्रथम अभिषेक किया जाता है, वह एक पारंपरिक कलश यात्रा के साथ टिहरी राजदरबार से ही पहुंचाया जाता है।
राजा कनकपाल ने सातवीं-आठवीं शताब्दी में इस हिमालयी क्षेत्र में अपना शासन स्थापित किया था। आदि शंकराचार्य के इस क्षेत्र में आगमन का समय भी यही है। ऐसी मान्यता है कि तिब्बत से लगे इस क्षेत्र में बौद्धों का प्रभाव समाप्त करने के लिए दोनों ने मिलकर अलकनंदा के किनारे बदरीनाथ की प्राण प्रतिष्ठा की। कनकपाल के वशंजों ने समय-समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार किया। कालांतर में देवप्रयाग के पंडों ने देशभर में घूम-घूम कर मंदिर के माहात्म्य से परिचय कराया और बदरीनाथ यात्रा का मार्ग प्रशस्त कर इसे भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक थाती बना दिया। यह पंडों का ही प्रताप था कि रजवाड़ों और रईसों ने मंदिर को जमकर दान-दक्षिणा से नवाजा और यात्रा मार्ग पर धर्मशालाएं व सदाव्रत खोले। मंदिर के ऊपर जो स्वर्णजडि़त छत्र है, वह मालवा की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने शासन काल (1767- 1795) में दान दिया था।
बदरीनाथ की पूजा पद्धति में स्थानीय डिमरी पुजारियों की महति भूमिका है। वे मंदिर के प्राचीन हक-हकूकधारी हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में 1776 में जब ‘रावल प्रथा’ प्रारंभ हुई, तो गढ़ नरेश महाराजा प्रदीप शाह के निर्देश पर पं॰ गोपाल डिमरी को प्रथम रावल बनाया गया। उन्होंने नौ वर्ष तक यह दायित्व निभाया। रावल परम्परा से पूर्व बदरीनाथ धाम की पूजा दण्डी स्वामी संपन्न कराते थे। कालांतर में शैव-वैष्णव में विवाद के कारण गढ़वाल के राजा ने आद्य शंकराचार्य की जाति नंबूदरी ब्राह्मणों के ही किसी सदस्य को केरल से गढ़वाल आमंत्रित रावल का दायित्व सौंप दिया। तब से लेकर आज तक रावल ही यहां के मुख्य पुजारी हैं। पद पर बने रहने तक रावल अविवाहित रहते हैं और पद खाली होने के उपरांत बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति टिहरी नरेश और नंबूदरी समाज के परामर्श से नए रावल का चयन करती है। पिछले साल जुलाई में ही बदरीनाथ धाम के 21वें रावल के रूप में अमरनाथ नंबूदरी जी की नियुक्ति हुई। उनके पूर्ववर्ती ईश्वर प्रसाद नंबूदरी ने पारिवारिक और स्वास्थ्य कारणों से रावल के पद से इस्तीफा दे दिया था। रावल की उपस्थिति के बिना कपाट खोले जाने का पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न नहीं हो सकता क्योंकि बदरीनाथजी की प्रतिमा को छूने का एकमात्र अधिकार रावल को ही है।
हाल के वर्षों में दो ऐसे मौके आए हैं, जब स्थानीय डिमरी पुजारियों ने बदरीनाथ मंदिर पर अपने हक-हकूकों की खुलकर वकालत की। पहला तब, जब 2018 में सरकार ने चारधाम देवास्थानम बोर्ड का गठन कर मंदिर के प्रबंधन में आमूलचूल बदलाव करना चाहा और दूसरा 2020 के कोराना काल में, जब रावल की अनुपस्थिति में मंदिर के कपाट तयशुदा समय पर नहीं खोले जा सके। देवस्थानम बोर्ड का निर्णय तो सरकार को वापस लेना पड़ा लेकिन रावल के बिना बदरीनाथ के कपाट खोलने की बात नहीं मानी गई। स्थानीय धर्माचार्यों और तीर्थ पुरोहितों ने इसका खुलकर विरोध किया और कहा कि रावल जैसी परंपराएं प्रभुत्वकारी और व्यवस्थागत अधिक हैं, इन्हें परिस्थितिवश लचीला बनाया जा सकता है। जैसा कि 1817 में चौथे रावल सीताराम जी के निधन के बाद नए रावल के आने तक डिमरी ब्राह्मण ने मुख्य पुजारी के रूप में भगवान बदरीनाथ जी की पूजन परम्परा को अखण्ड रखा था।
सरकार रावल व्यवस्था की पुरानी परिपाटी से छेड़छाड़ कर विवाद को जन्म नहीं देना चाहती। उसे लगता है कि मंदिर पर सर्वाधिकार के दोषारोपण से बचने में रावल की पदवी एक कवच का कार्य करती है। इससे वह स्थानीय डिमरी पुजारियों के हक-हकूकों का भी संतुलन साधती है। जहां तक राजपरिवार की बात है तो ‘बोलांदा बदरी’ जैसा स्वयंभू अलंकरण और मंदिर पर उसके अधिकार तो 1939 में बदरीनाथ मंदिर अधिनियम बनते ही तिरोहित हो गए। इस प्रकार राजा की प्रतीकात्मक और रावल की धार्मिक भूमिका के बीच बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के रूप में राज्य सरकार का शक्तिमान रुतबा बदरीनाथ के वर्तमान प्रबंधन का सच है।

































