प्रयाग पाण्डे
पिछले कुछ समय से देवभूमि उत्तराखंड की जनसांख्यिकी में परिवर्तन का विषय विमर्श का प्रमुख बिंदु बना हुआ है। लोगों का मानना है कि पृथक उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद पहाड़ की जनसांख्यिकी परिवर्तन की प्रक्रिया यकायक तेज हुई है। जिस कारण यहाँ के कुछ नगर-क्षेत्रों की जनसंख्या के आकार और मूल संरचना बुरी तरह प्रभावित हुई है। सैलानी नगरी नैनीताल के संदर्भ में यह बात सौ फीसद सही है। विगत तीन-साढ़े तीन दशकों से नैनीताल की जनसांख्यिकी बहुत परिवर्तित हुई है। इस कारण नैनीताल के न केवल सामाजिक एवं भौतिक पर्यावरण में ऋणात्मक परिवर्तन हुआ है, बल्कि यहॉं का मूल चरित्र भी बदल गया है। कुछ अंग्रेजों द्वारा करीब 180 वर्ष पूर्व ‘कंट्री रिट्रीट’ यानी ‘उच्च वर्ग के लिए शांत और एकांत’ नगर के रूप में बसाए गए नैनीताल की स्थिति आज मैदानी क्षेत्रों के अव्यवस्थित कस्बों- नगरों से भी बुरी हो गई है। प्रकृति प्रदत्त सुंदरता एवं स्वास्थ्यवर्धक आबोहवा के लिए दुनिया भर में ख्यात नैनीताल का प्राकृतिक सौंदर्य और सुरक्षा आज दोनों गंभीर संकट से जूझ रहे हैं।
यक्ष प्रश्न यह है कि एक दौर में जिस नैनीताल नगर की सीमा में बिना स्वास्थ्य परीक्षण के कोई इंसान प्रवेश नहीं पा सकता था और जहाँ फल- सब्जियां भी ‘पोटेशियम परमैंगनेट’ के घोल में धुले बगैर नगर में लाई और बेची नहीं जा सकतीं थीं, उस अभिजात नगर की जनसांख्यिकी में आए परिवर्तनों के लिए जिम्मेदार कौन है? इस बुनियादी प्रश्न का ईमानदारी से सामना किए बिना यहाँ की जनसांख्यिकी में आए और आ रहे परिवर्तनों की पड़ताल नहीं की जा सकती है। इसके साथ ही नैनीताल को अन्य नगरों से अलहदा पहचान दिलाने वाले नियम- कानूनों को जानना आवश्यक है। यहाँ के लिए बने विशिष्ट कायदे-कानूनों के प्रति घोर उपेक्षा ने आज नैनीताल को मौजूदा मुकाम पर ला खड़ा कर दिया है। यहाँ की जनसांख्यिकी में आए बदलाव के चलते नैनीताल के मूल चरित्र के साथ ‘नैनतालियत’ को भी खतरे में डाल दिया है।
प्रारंभिक दौर में नैनीताल आने-जाने के मुख्यतः तीन पैदल मार्ग थे। वाया खुर्पाताल, वीरभट्टी और सेंट-लू। इन मार्गों पर टोल चौकियां बनी हुई थीं। इन टोल चौकियों में नैनीताल आने वाले प्रत्येक नागरिक, उनके जानवर और पाँच सेर से अधिक सामान पर निश्चित प्रवेश शुल्क वसूला जाता था। इन टोल चौकियों में करीब दर्जन भर वेक्सीनेटर तैनात रहते थे। वेक्सीनेटर नगर में प्रवेश करने वाले प्रत्येक नागरिक का स्वास्थ्य परीक्षण किया करते थे, स्वस्थ पाए जाने के बाद ही लोगों को नगर में प्रवेश दिया जाता था। अस्वस्थ लोगों का नैनीताल नगर में प्रवेश वर्जित था। कालांतर में जब नैनीताल सड़क मार्ग से जुड़ गया। तब वाहनों से नैनीताल आने वाले यात्रियों से यात्री कर वसूलने की व्यवस्था बनी। नैनीताल नगर में बीमारों के प्रवेश संबंधी नियम बने। जिस मोटर कार या अन्य वाहन से बीमार या बुखार से पीड़ित मरीज को इलाज के लिए नैनीताल लाया जाता, संबंधित वाहन चालक को टोल चुंगी पर मरीज का नाम, पता, नैनीताल में रुकने का समय आदि जानकारियां दर्ज करानी होती थीं। नगर में रहने वाले क्षयरोग पीड़ित रोगी के बारे में 48 घण्टे के भीतर नगर स्वास्थ्य अधिकारी को सूचित करना अनिवार्य था।
अंग्रेजी शासनकाल में नैनीताल में बिक्री के लिए आने वाले फल एवं सब्जियों की स्वास्थ्य निरीक्षक बाकायदा जाँच करते थे। इसके लिए नगर के प्रवेश द्वारों में चौकियां बनी हुई थी। इन चौकियों में ‘पोटेशियम परमैंगनेट’ युक्त पानी के बड़े-बड़े टब होते थे। नगर में लाने से पहले फल और सब्जियों को इन टबों में धोया जाता था। इसके बाद ही फल – सब्जियां बिक्री के लिए नैनीताल आ सकती थीं। नगर सीमा में नियमित दूध की जाँच की जाती थी। दूध के नमूने लिए जाते थे। टोल टैक्स अदा किए बगैर इंसान और उनके जानवर कोई भी नैनीताल नगर में प्रवेश नहीं कर सकता था।
“भीड़ से था परेशां अब सुनसानी से बेहाल है ,
खाके झापड़ सन्न SSS पड़ा है शहर मेरा आजकल
किनारों में कैद कश्तियां किनारे क्या लगाएंगी
लबालब तालाब खाली खिलखिला रहा है आजकल
खाके झापड़ सन्न SSS पड़ा है शहर मेरा आजकल
न कोई मांगेगा स्ट्रोवरी न कोई काफल खाएगा
इंतजार में दांतों के भुट्टा हो गया है बासी आजकल
खाके झापड़ सन्न SSS पड़ा है शहर मेरा आजकल
निकल आए हैं फड़ में गुज़रे जाड़ों के ताश
सर अपना खुजला रही है फाके कशी आजकल
खाके झापड़ सन्न SSS पड़ा है शहर मेरा आजकल
कुछ निगाहों में डर लिखा है कई आंखो में खून है
बच्चों की केवल यही पढ़ाई चल रही है आजकल
खाके झापड़ सन्न SSS पड़ा है शहर मेरा आजकल
ना पानी की तासीर मीठी न बहती ठंडी हवा की बयार
फिज़ाओं में पहाड़ की बस जहर बह रहा है आजकल
खाके झापड़ सन्न SSS पड़ा है शहर मेरा आजकल “
— दिनेश उपाध्याय
पहले से पहाड़ के अधिकांश लोग जाड़ों का मौसम शुरू होते ही अपने परिवार सहित मौसमी प्रवास के लिए भाबर को पलायन कर जाते थे। ग्रामीणों के साथ रोजमर्रा के घरेलू उपयोग की आवश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त पशुधन भी होता था। नैनीताल नगर सीमा से होते हुए भाबर जाने वाले ग्रामीणों को मनुष्यों, पशुओं और सामान की चुंगी अदा करनी पड़ती थी। 1929 में जिला पंचायत के अनुरोध पर नगर पालिका प्रशासन ने नगर सीमा से होते हुए भाबर जाने वाले ‘भाबरियों’ के लिए सशुल्क ट्रांजिट पास जारी करने का नियम बनाया। इन ग्रामीण यात्रियों को नगर सीमा में प्रवेश करते समय उस सीमा में अवस्थित पालिका की टोल चुंगी से अपने सभी परिजनों, सामान और पशुओं का सशुल्क ट्रांजिट पास लेना होता था। यह पास अहस्तांतरणीय होता था। ट्रांजिट पास प्राप्त करने के बाद उन्हें दो घण्टे के भीतर नैनीताल नगर की सीमा को पार कर लेना अनिवार्य होता था। तय समयसीमा के भीतर नगर की सीमा पार कर लेने की स्थिति में नगर के निकास द्वार पर स्थित पालिका टोल चुंगी में ट्रांजिट पास दिखाने पर उनके द्वारा भुगतान की गई संपूर्ण धनराशि वापस कर दी जाती थी। दो घण्टे से अधिक समय बीत जाने की सूरत में टोल टैक्स के रूप में वसूली गई राशि वापस नहीं होती थी।
इस प्रवेश कर व्यवस्था के दोहरे लाभ थे। पहला, नगर में प्रवेश करने वालों की संख्या ज्ञात रहती थी। दूसरा, इस व्यवस्था से नगर पालिका को धनार्जन होता था। आज नैनीताल में मानवों की संख्या तो दूर, इंतजामिया को मकानों और दोपहिया- चौपहिया वाहनों की ठीक-ठीक संख्या तक ज्ञात नहीं है।
उस दौर में घर या बाहर, नगर में कहीं भी किसी भी किस्म की गंदगी बर्दाश्त नहीं की जाती थी। नगर में साफ- सफाई एवं स्वच्छ वातावरण को बनाए रखने के लिए समय- समय पर नगर के सभी घरों का निरीक्षण किया जाता था। इस काम के लिए चार स्वास्थ्य ओवरसियर नियुक्त किए गए थे। नगर पालिका घर-घर जाकर वैक्सिनेशन करती थी। नगर वासियों का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाता था। संक्रामक रोग से ग्रसित रोगी नगर के भीतर नहीं रह सकता था। संक्रामक रोगों के इलाज के लिए नगर से बाहर मनोरा नामक स्थान में संक्रामक रोग चिकित्सालय बनाया गया था। धोबी, नगर के भीतर कपड़े नहीं धो सकते थे। कपड़े धोने के लिए अलग से धोबीघाट बने हुए थे। नगर के सभी घरों की यथासमय पुताई सुनिश्चित की जाती थी। इसे अमलीजामा पहनाने के लिए बाकायदा कमेटियां बनी हुई थीं।
अंग्रेजों ने नैनीताल की बसावट के प्रारंभिक दौर में ही इस नगर को अति मानव भीड़ से बचाने और यहाँ के भंगुर पर्यावरण को संरक्षित करने के प्रयास प्रारंभ कर दिए थे। नैनीताल नगर को दीर्घकाल तक संरक्षित रखने के लिए ब्रिटिशकालीन उपरोक्त व्यवस्थाओं की अनदेखी को लेकर बौद्धिक विलाप तो खूब हुआ और हो रहा है लेकिन इन तमाम समस्याओं की असल वजह पर कोई भी विमर्श करने को राजी नहीं है।

































