सुवर्ण रावत
शनिवार की शाम देहरादून के नगर निगम के प्रेक्षागृह में सौरभ शुक्ला के लिखे मूल नाटक ‘बर्फ़’ के गढवाली रुपांतरण का शानदार मंचन किया गया. इस नाटक की परिकल्पना एवं निर्देशन, सुपरिचित रंगकर्मी डॉ. सुवर्ण रावत का था .नाटक में मुख्य बात यह रही कि सारा नाटक मात्र तीन ही पात्रों के मध्य घूमता रहा.मंच पर गाँव की एक सहज व भोली गृहणी उषा के किरदार में अभिनेत्री सुषमा बड़थ्वाल व टैक्सी चालक जगदीश की भूमिका वरिष्ठ रंगकर्मी दिनेश बौड़ाई ने सशक्त रूप से निभाई.डॉक्टर सिद्धांत का किरदार स्वयं सुवर्ण रावत ने निभाया है.
बर्फ नाटक की कहानी रोमांचकता से भरपूर दिखती है. पहाड़ की किसी बर्फीली रात के परिदृश्य में तीन मुख्य पात्रों के इर्द-गिर्द यह नाटक चलता रहता है. निचले मैदानी शहर से आया एक चिकित्सक डॉ. सिद्धांत रावत, पहाड़ी टैक्सी चालक जगदीश, और उसकी पत्नी उषा का अभिनय अंत तक दर्शकों को बांधे रखता है.
डॉ. रावत, लैंसडौन-कोटद्वार में एक चिकित्सा सम्मेलन ‘मेडिकल कॉन्फ्रेंस’ में भाग लेने आता है. जो जगदीश के साथ उसके दुर्गम गांव ‘नागतल्ला’ पहुंचते हैं। गांव आकर पर डॉक्टर को पता चलता है कि जगदीश का बेटा ‘संजू’ बीमार है।
प्राकृतिक आपदाओं व आदमखोर गुलदार के डर से गांव गांव वीरान पड़ा है। सिर्फ जगदीश और उसका ही परिवार यहाँ रहता है. नाटक में ज़ब कहानी आगे बढ़ती है तो डॉ. रावत को अहसास होता है कि जगदीश की पत्नी उषा, मनोविकार से जकड़ी है, और वह एक बेजान गुड्डे को ही अपना बच्चा समझती है।
नाटक में इन तीन पात्रों के आपसी संवादों के माध्यम से ही सत्य, विश्वास और मानवीय मनोविज्ञानिक सवाल उपजते हैं, एक ऐसा सत्य जो व्यक्ति के अनुभव और विश्वासों से बनता है, हकीकत में यह नाटक पहाड़ के मौजूद प्रकृति के प्रति मनन करने को उकसाता है. कुल मिलाकर यह नाटक एक मनोवैज्ञानिक रोमांच को गहन सवालों के साथ लाने का उपक्रम करता है.
इस नाटक का सम्यक गढ़वाली रूपान्तरण फ़िल्म व रंगकर्म से जुड़े बद्रीश छाबड़ा ‘पहाड़ी सरदार’ ने किया है .नाटक की मंच परिकल्पना व ध्वनि प्रभाव श्रीवर्णा रावत, अभिनव गोयल, प्रकाश परिकल्पना टी. के. अग्रवाल, सहायक प्रकाश व्यवस्था,हितेश थपलियाल की थी.
वेशभूषा परिकल्पना जयश्री रावत, मंच निर्माण व सामग्री वीरेन्द्र असवाल ,सहायक मंच व्यवस्था अमित सेमवाल व वैभव तिवारी की थी. जबकि रुप सज्जा ऐश्वर्या रावत,पोस्टर, ब्रोशर सुजय रावत का था. फ़ोटोग्राफी दीना रमोला ने की. मेडिकल सलाहकार के तौर पर डॉ. पवन व मोनिका रावत का योगदान रहा . इस नाटक का सफल मंच संचालन पंडित उदयशंकर भट्ट ने किया.
निश्चित ही यह नाटक अपनी कथा वस्तु, बेजोड़ अभिनय, संवाद प्रस्तुति से असम दर्शकों के बीच अपनी विशेष छाप छोड़ने में सफल रहा. कला दर्पण की पूरी टीम को साधुवाद जो अपने स्तर से रंगमंच की अन्य संस्थाओं की तरह समाज से दूर होती जा रही रंगमंच विधा को आज के कठिन समय में भी जीवंत रखने का प्रयास कर रही है.

































